94 Year Old Jain Acharya Shri Kulchandra Suriji Creates HISTORY!

94 की उम्र में जैन आचार्य श्री कुलचंद्रसूरीजी म.सा. ने रच दिया इतिहास!

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By Jain Media 14 Min Read

आज लोग 40-50 की उम्र में Retire होने का सोच रहे हैं और इधर एक जैन आचार्य ने 94 की उम्र में नया इतिहास रचने जा रहे हैं। 

आज मूर्तीपूजक श्वेतांबर, स्थानकवासी श्वेतांबर, तेरापंथी श्वेतांबर और दिगंबर सम्प्रदाय.. यह चार फिरको के सब मिलाकर लगभग 18-20 हज़ार साधु-साध्वीजी भगवंत हैं। 

सिद्धांतमहोदधि पूज्यपाद प्रेम सूरिजी महाराज साहेब के मुख्य दो शिष्य थे, पूज्य आचार्य श्री रामचंद्रसूरिजी महाराज साहेब और पूज्य आचार्य श्री भुवनभानुसूरिजी महाराज साहेब। आज यह दो महात्माओं के समुदाय के साधु-साध्वीजी भगवंत मिलाये तो कुल 3500 से भी अधिक साधु-साध्वीजी है।

ऐसे महान आचार्य नैष्ठिक ब्रह्मचारी पूज्यपाद प्रेमसूरिजी महाराज साहेब के अंतिमशिष्य बनने का सौभाग्य मिला था राजस्थान-पिंडवाडा के सुश्रावक श्रीकांति भाई को। जो 35 वर्ष की उम्र में मुनि श्री कुलचंद्र विजयजी महाराज साहेब बने थे और आज उनकी उम्र 94 है यानी तकरीबन 60 वर्ष का विराट दीक्षापर्याय हो गया है। 

At Present यानी Jan 2026 के तहत वे जैन आचार्य श्री कुलचंद्र सूरीश्वरजी महाराज साहेब के रूप में गुजरात के सूरत शहर में बिराजमान है। आज इस Article में हम इन आचार्य भगवंत के एक अतिमहान सुकृत की, एक Milestone की अनुमोदना करेंगे।

श्री निशिथसूत्र आगम

श्वे. मूर्तीपूजक संप्रदाय में कुल 45 आगम प्रचलित है। उसमें 6 छेदग्रन्थ सब से Top आगम है क्योंकि उसमें जैन साधु-साध्वीजी भगवंतों के आचारों का अति गहराई से निरूपण किया गया है। आचारों के विषय में जो जैन धर्म के अद्भुत रहस्य है, वो सब यह 6 आगमों में बताए गए हैं। 

इसलिए इन 6 आगमों की पढ़ाई की अनुमति अत्यंत गंभीर साधु भगवंतों को ही दी जाती है। 

पूज्य साध्वीजी भगवंतों को यह 6 आगम Directly पढने की अनुमति नहीं दी जाती है। ज्ञानी गुरु भगवंत साध्वीजी भगवंतों को इस आगमों के Useful और साध्वीजी भगवंतों को कह सके ऐसे पदार्थ बता देते हैं, लेकिन पूरा आगम कभी भी नहीं पढ़ाते हैं।

ऐसे यह 6 आगमों में भी सबसे Top आगम है श्री निशीथसूत्र। जिनकी रचना चौदपूर्वधर श्री भद्रबाहुस्वामीजी ने आज से तकरीबन 2200 वर्ष पहले की थी। यह श्री निशीथसूत्र लगभग 2000 गाथाप्रमाण है। 

उसके ऊपर विवेचन के रूप में जो भाष्य है, वो पूज्य श्री विशाखगणि ने बनाया है, उसके ऊपर प्राकृतभाषा में विवेचनरूप जो चूर्णि है, वह श्री जिनदासगणि महत्तर ने बनाई है। यह सूत्र+भाष्य+चूर्णि इतने कठिन है कि उसको समझना वो विद्वानों के लिए भी बहुत Difficult Task माना जाता है। 

सिर्फ भाषा का ज्ञान इसमें काम नहीं आ सकता। इसी कारण से इस ग्रन्थ पर संस्कृत टीका की आवश्यकता थी, लेकिन इस विराटकाय ग्रन्थ पर विराट संस्कृत टीका लिखना वह एक बहुत बड़ी चुनौती का काम था। प्रभु महावीर से लेकर आजतक किसी ने भी इस ग्रन्थ पर संस्कृत भाषा में विवेचन नहीं किया है।

94 की उम्र में ये कमाल

पूज्य गच्छाधिपति श्री जयघोष सूरीश्वरजी महाराज साहेब ने एक बार पूज्य आचार्य श्री कुलचंद्र सूरीश्वरजी महाराज साहेब को प्रेरणा की थी कि आज इस महानग्रन्थ पर संस्कृत टीका लिखना ताकि भविष्य के 18000 वर्ष तक जैन शासन में होनेवाले हज़ारों साधु-साध्वीजी भगवंतों को इस ग्रन्थ का रहस्य जानना आसान हो पाएगा।

पूज्य आचार्य श्री कुलचंद्र सूरीश्वरजी महाराज साहेब ने इस प्रेरणा को मन के अंदर Fit कर दी और 90 वर्ष की अत्यंत वयोवृद्ध अवस्था में उन्होंने यह संस्कृतटीका का प्रारंभ किया। 

90 वर्ष एक ऐसी वय है, कि आज के ज़माने के 90-95% लोग इस Age तक जिंदा रहेंगे भी या नहीं पता नहीं। यह भी एक बहुत बड़ा प्रश्न है, और मान लो कुछ जीवित रह भी गए तो उनमें से Max लोग Bed Rest पर रहेंगे, पराधीन हो जाएंगे। 

उनका Brain काम करना बंद हो जाएगा या फिर बहुत कम काम करेगा क्योंकि इस उम्र में छोटी-बड़ी चीज़ों को भी लोग भूलने लग जाते हैं और मन भी बहुत Weak हो जाता है, कम काम करता है। 

लेकिन ऐसी Age में भी पूज्य आचार्य श्री ने यह अतिविराट कार्य का प्रारंभ किया और पांच साल तक सतत इस कार्य में अपना तन-मन-समय सब कुछ लगाकर आखिरकार 94 वर्ष की Age में यह कार्य संपूर्ण किया।

32 अक्षर लिखे तो 1 गाथा गिनी जाती है, ऐसी 1 लाख से भी अधिक गाथा जितनी विराट टीका का उन्होंने निर्माण किया। 

Unbelievable…
Amazing… 

अब यहाँ पर 1 लाख श्लोक लिखना यानी ऐसा मत समझना कि ‘किसी किताब में लिखा है, और वो देख देखकर किसी कागज़ पर उतारना होगा।’ नहीं ये Copy Paste नहीं है..  

यहाँ तो पहले पदार्थ को समझना है बहुत Difficult पदार्थ होते हैं, वह समझना है और फिर अपने चिंतन से वह सब कुछ लिखना है, वो भी संस्कृत भाषा में।अब सोचिए यह उन्होंने 90 की Age में चालु किया और एक लाख से भी ज्यादा श्लोक लिखे हैं।

1st Feb 2026 को सूरत में इस महान ग्रन्थ का विमोचन होने जा रहा है। 

श्रावक-श्राविकाओं को यह ग्रन्थ पढना नहीं है, इसलिए उनको इसकी Actual कीमत शायद समझ में ना भी आए लेकिन आप यकीन करना कि 18000 साल तक जिनशासन के हज़ारों साधुओं के आचारमार्ग का रहस्य प्रगट करनेवाला यह ग्रन्थ विश्व के 7 अजूबों से भी कहीं कहीं गुना ज्यादा ऊपर है.. कोई Comparison ही नहीं है। 

दुनिया Taj Mahal की, Great Wall of China की, Statue of Liberty की, Statue of Peace की Value कर सकती है, लेकिन ऐसे कार्यों की शायद नहीं कर सकती है क्योंकि दुनिया के पास बाहर की आँख है, अंदर की आँख नहीं। 

इसलिए आम दुनिया इस महान ग्रन्थ की Value ना भी समझे तो इतने मात्र से इस ग्रन्थ की Value हम कम नहीं आंक सकते। 

पूज्यश्री का जीवन

पूज्य आचार्य श्री कुलचंद्रसूरीश्वरजी महाराज साहेब को बिरुद दिया गया है कि वे ‘वैराग्यवारिधि’ है यानी कि आचार्य श्री वैराग्य के सागर है। यह बिरुद उनका जीवन देखने के बाद तनिक भी गलत नहीं लगेगा।

1. राजस्थान पिंडवाडा के अतिश्रीमंत परिवार के यह सुपुत्र थे, कुल 5 भाई और 4 बहनें इतना बड़ा तो इनका परिवार था। उनको पूज्य प्रेम सूरिजी महाराज साहेब के संपर्क से दीक्षा के भाव जगे, दीक्षा की तालीम लेने के बाद उन्होंने घर पर सबको मनाया। 

उस वक्त पर उनकी पत्नी गर्भवती थी, फिर भी पूरा परिवार धार्मिक था, तो सबने अनुमति दे दी और पूज्य प्रेम सूरिजी महाराज साहेब खंभात में होने के कारण से पूज्य पंन्यास श्री भद्रंकर विजयजी महाराज साहेब ने इनको पिंडवाडा में दीक्षा दी। 

वे पूज्य प्रेम सूरिजी महाराज साहेब के अंतिम शिष्य बने।

परिवार इतना धनवान था कि उनकी दीक्षा के वक्त 8 दिनों का भव्य महोत्सव रखा था। ऐसे श्रीमंत परिवार को, गर्भवती सुशील पत्नी को, संसार को छोड़कर संयम लेनेवाले यह पूज्य श्री के अंदर वैराग्य का सागर भरा पड़ा हुआ होगा ही यह कहने की ज़रूरत ही नहीं है।

2. 60 वर्ष के दीक्षा पर्याय में कभी भी मिठाई, Fruits, Dry Fruits, नमकीन यानी फरसाण खाया नहीं है। मन को लुभाने वाली सैंकड़ों चीज़ें नज़र के सामने आए, फिर भी 35 की उम्र से लेकर 94 की उम्र तक इन चीज़ों के लिए मन में भी इच्छा नहीं होनी, यह वैराग्य का सागर नहीं तो क्या है।

3. जिस समय पूज्य श्री के सिर्फ एक ही शिष्य थे, मुनि श्री रश्मिराज विजयजी महाराज साहेब। उस वक्त पूज्य श्री का पास सूरत के एक मुमुक्षु दीपेन भाई ने भव-आलोचना की थी।

भव-आलोचना यानी सरल भाषा में कहे तो अपने पापों का Confession.. 

दीपेन भाई पूज्य श्री को अत्यंत उपकारी मानते थे, एक साल के बाद जब पूज्य श्री राजस्थान में थे, तब दीपेन भाई ने दूसरी भव-आलोचना के लिए पुछवाया तो पूज्य श्री ने उदारमन से कहा कि ‘सूरत में पंन्यास श्री चंद्रशेखर विजयजी महाराज साहेब बिराजमान है, आप वहां ही आलोचना करें।’ 

बस तब से दीपेन भाई। पंन्यास श्री चंद्रशेखर विजयजी महाराज साहेब के साथ जुड़े और उनके शिष्य पूज्य मुनि श्री गुणहंस विजयजी महाराज साहेब बने.. जो अभी गणिवर्य है। पूज्य श्री ने यानि मुमुक्षु दीपेन भाई को अपना खुद का शिष्य बनाने की कोई भी मेहनत नहीं की, कोई खींचातानी नहीं की। 

यह उनके अंदर का वैराग्य का सागर था। 

4. पूज्य श्री को एक बार किसी स्त्री ने आकर्षित होकर कुछ गलत बात Offer की थी, पूज्य श्री ने एकदम स्पष्ट शब्दों में और बहुत ही संख्ताई के साथ मना करके उस स्त्री को वहां से जाने को कह दिया था। 

एकांत के समय में ऐसी अनुकूलता मिलने पर भी उनको राग का अंश भी Touch नहीं कर पाया। यह है उनके अंदर का ब्रह्मचर्य, यह था उनके अंदर वैराग्य का सागर। 

ऐसे अनेक दृष्टांतों से 100% मानना ही पड़ेगा कि वे सच में वैराग्यवारिधि है। 

पूज्यश्री की साधना

जो भी पूज्य श्री को देखते हैं, हर वक्त उनका हँसता हुआ चेहरा ही दिखता है। कोई मायूसी नहीं, कोई खेद नहीं, कोई गुस्सा नहीं, किसी भी प्रकार की उम्र की चिंता वगैरह उनके चेहरे पर कभी भी देखने को नहीं मिलती है।

आज भी वो रोज़ दो ढाई घंटे मंदिर में प्रभुभक्ति करते हैं, रोज़ सूरि मंत्र का जाप करते हैं, रोज़ दोनों समय का प्रतिक्रमण खड़े खड़े करते हैं At the age of 94.. 

26 शिष्य-प्रशिष्यों का योगक्षेम करते हैं, अनेक साध्वीजी भगवंतों को मार्गदर्शन देते हैं। पूज्य श्री के हाथों से कुल 40 अंजनशालाका और 80 प्रतिष्ठा हुई है।

पूज्य श्री ने सिर्फ यह 1 लाख श्लोक का यह एक ही ग्रन्थ नहीं बनाया बल्कि 

  • पंचकल्पभाष्य छेदग्रन्थ के ऊपर 24000+ श्लोक की संस्कृत टीका
  • दशाश्रुतस्कंध छेदग्रन्थ के ऊपर 14000+ श्लोक की संस्कृत टीका
  • कल्पसूत्र पर Short टीका
  • आचारांग सूत्र पर Short टीका
  • सूत्रकृतांग सूत्र पर Short टीका
  • मार्गपरिशुद्धि प्रकरण की टीका
  • विंशतिविंशिका ग्रन्थ की टीका
  • विशेष-णवति ग्रन्थ की टीका 

This Totally is A Revolutionary Contribution To Jain Shasan… 

85 वर्ष तक वो 5 तिथि आयम्बिल करते थे। उसके बाद आज तक 5 तिथि बियाशना करते हैं। वो एकाशना या बियाशना सिर्फ 10 मिनट में भी कर लेते हैं। 89 वर्ष की Age तक वो चलकर ही विहार करते थे। 

पूज्य श्री की दीक्षा के बाद जो बच्चे का जन्म हुआ, उनका नाम कुमारपाल रखा गया था। वह ही बेटे ने बड़े होकर अपने पिता आचार्य श्री कुलचंद्र सूरीश्वरजी महाराज साहेब का पालिताना में सामूहिक चातुर्मास करवाया था। 

जैनशासन में सबसे पहले श्री शय्यंभव ब्राह्मण ने दीक्षा ली थी, फिर दूसरा प्रसंग आर्यधनगिरी का बना था, उनकी पत्नी नंदा जब गर्भवती थी उस वक्त पर उन्होंने दीक्षा ली थी और तीसरा प्रसंग यह पूज्य आचार्य श्री कुलचंद्र सूरिजी का है।

ऐतिहासिक ग्रंथ

1st Feb 2026 को सूरत की धर्मनगरी में यह ऐतिहासिक ग्रन्थ का विमोचन होगा, उसी दिन बेंगलुरु के V V Puram में भी इस ग्रन्थ का विमोचन होगा। सभी जैन तो सूरत में उपस्थित नहीं रह पाएंगे यह बात सही है। 

लेकिन जिन्हें इतिहास को रचते हुए अपनी आँखों से देखना है वे ज़रूर जा सकते हैं और जो नहीं जा पाए वे अंतर्मन से अनुमोदना तो कर ही सकते हैं।

यह ऐतिहासिक क्षण को देखना सुनना, यह हमारा सौभाग्य है और हाँ 94 वर्ष के यह महान जैन आचार्य भगवंत के दर्शन का सौभाग्य भविष्य में हमें कब मिलेगा? वैसे भी आचार्य श्री की Age 94 की है। 

तो हो सके तो At Present सूरत की धन्यधरा पर जाकर उनके दर्शन का लाभ ज़रूर ले सकते हैं। 

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