कुरगडु मुनि की सोचने पर मजबूर कर देनेवाली कथा.
इस कथा से सभी छोटे बड़े तपस्वियों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है, और उन्हें भी जिनसे तपस्या नहीं होती. तो बने रहिए इस Article के अंत तक.
आजकल तो 30 उपवास, सिद्धितप, अट्ठाई, वर्षीतप, बड़ी बड़ी वर्धमान तप की ओलियाँ आदि बड़ी तपस्या कुछ लोग करते हैं तो उन सबके आगे कुछ लोग नवकारसी मुश्किल से कर पाते हैं तो नवकारसी करनेवालों को ऐसा लगता है कि भाई हमारा क्या होगा?
उसका जवाब इस कथा से ज़रूर मिलेगा.
क्षुधावेदनीय कर्म का उदय
एक नगर में एक बार जैन आचार्य भगवंत पधारे और उनके प्रवचन से, धर्मदेशना से ललितांग नामक एक राजकुमार को वैराग्य आ गया. उसे संसार असार लगने लगा. एक शुभ दिन यह राजकुमार ने दीक्षा ले ली.
ललितांग मुनि बहुत ही शुभ भाव से दीक्षा जीवन का पालन करने लगे, उनका उत्साह बढ़ता जा रहा था लेकिन दीक्षा लेने के बाद ‘क्षुधावेदनीय’ कर्म उदय में आया. यह ‘क्षुधावेदनीय’ कर्म जब उदय में आता है तब बार बार भूख लगती है.
यह ललितांग मुनि के दीक्षा लेने से पहले ऐसी इच्छा थी कि ‘दीक्षा लेने के बाद विशेष तपस्या करूँगा जिससे कर्मों का नाश होगा.’ लेकिन दीक्षा के बाद तप का अंतराय उदय में आया, यानी कि तप करने में ऐसा Hurdle आया, Obstacle आया कि अब Situation ही बदल गई.
उनको तो Special बड़े तप करने की इच्छा थी लेकिन अब पोरसी का पच्चक्खाण करना भी मुश्किल हो गया था.
Note : जिस तरह नवकारसी Sunrise के 48 Minutes के बाद आती है, उसी तरह Sunrise के एक प्रहर के बाद पोरसी आती है. लगभग ढाई से साढ़े तीन घंटे मानकर चल सकते हैं.
अर्थात् ललितांग मुनि को पोरसी तक भी भूख सहन करना मुश्किल हो रहा था. स्वाध्याय यानी पढ़ाई तो साधु जीवन में लगातार होती रहती है तो ललितांग मुनि को उनके गुरुदेव ने एक सूत्र दिया था ‘उवसम सारं खु सामण्णं’ अर्थात् साधुता का सार उपशम है, उपशम यानी क्षमा भाव, शांति.
इस सूत्र को ललितांग मुनि ने अपने जीवन में पूरी तरह से Apply भी किया था.
हमारे शास्त्रों में 12 प्रकार के तप बताएं हैं, 6 बाह्य और 6 आभ्यंतर यानी आतंरिक. 6 External और 6 Internal. Detail में किसी दिन देखेंगे. लेकिन अभी के लिए इतना समझ सकते हैं कि जो हम नवकारसी, पोरसी, आयम्बिल, उपवास आदि करते हैं यह बाह्य तप है.
गुरु भगवंत ऐसा कहते हैं कि बाह्य तप यानी शरीर द्वारा की जानेवाली तपस्या से कर्मों की निर्जरा यानी कर्मों का नाश तो होता ही है साथ ही हमारे कषाय भी धीरे धीरे कम होते हैं. कषाय यानी क्रोध मान माया लोभ आदि दोष. कषाय कम होते हैं तो समता भाव बढ़ते हैं.
समता यानी Neutral-ना राग ना द्वेष. तो तपस्या का फल कर्म का नाश है और कषाय का मंद होना है यानी Decrease in Anger, Greed Etc. तो गुरु भगवंत यह भी बताते हैं कि अगर कोई व्यक्ति कठोर बाह्य तप करे लेकिन अगर उसके दिल में समता भाव ना हो तो उस तप की कोई विशेष कीमत नहीं है.
ऐसा समझ सकते हैं कि Business में Turnover हो रहा है लेकिन Profit नहीं हो रहा.
अब ललितांग मुनि की बात करें तो तीव्र क्षुधावेदनीय कर्म के उदय के कारण यह मुनि शरीर द्वारा किए जानेवाले बाह्य तप यानी उपवास आदि नहीं नहीं कर पा रहे थे क्योंकि भूख बहुत लग रही थी लेकिन तप का फल यानी समता भाव वो उन्होंने अपने जीवन में प्राप्त कर लिया था.
कुरगडू नाम का रहस्य
समय बीता और चातुर्मास के दिन आए. ललितंग मुनि के साथ तीन और मुनि भगवंत थे. तो कुल 4 मुनि भगवंत चातुर्मास के लिए एक गाँव में रहे. उन तीन मुनियों ने तो चार-चार महीने के उपवास की तपस्या शुरू कर दी लेकिन ललितांग मुनि को भूख बहुत लगती थी तो तप करना उनके लिए Possible नहीं था.
नवकारसी आते ही वे गोचरी के लिए, यानी भिक्षा के लिए निकल पड़ते. उनकी क्षुधा यानी भूख भी इतनी ज्यादा थी कि खाने के लिए घड़ा भरकर चावल चाहिए होते थे.
यहाँ पर एक Important बात समझने जैसी है कि ललितांग मुनि गोचरी इसलिए वापरते थे यानी भोजन इसलिए करते थे क्योंकि उनसे तपस्या नहीं हो पाती थी, उपवास नहीं कर पा रहे थे इसलिए नहीं कि उन्हें भोजन में Interest था या Tasty खाना चाहिए था.
भोजन करते थे लेकिन भोजन में आसक्ति नहीं थी, Attachment नहीं था.
यह ललितांग मुनि का नाम कुरगडु मुनि पड़ गया. कैसे?
तो ललितांग मुनि को भयानक भूख लगती थी और इस कारण से वे घड़ा भरकर भात यानी चावल वहोरते थे, तो इस कारण से लोगों में उनका नाम पड़ गया-कुरगडु मुनि. कुर अर्थात् चावल, गडु अर्थात् घड़े जैसा पात्र.
इसी तरह समय बीतने लगा और कुरगडु मुनि रोज़ भिक्षा के लिए जाते थे, रोज़ घड़ा भरकर चावल लाना, यह Routine चल रहा था. साथ में जो तीन मुनि थे, जो उपवास कर रहे थे उन्हें कुरगडु मुनि के प्रति धिक्कार भाव उत्पन्न होता गया.
वे तीनों मुनि सोचते कि ‘ये कैसे साधु हैं. सुबह होते ही गोचरी के लिए निकल पड़ते हैं? कितने भुक्कड़ हैं? तप का तो बिलकुल नाम ही नहीं लेते हैं.’ घर पर ज़रूर कोई न कोई तो खादोकडा होता ही है, या शायद हम खुद ही होंगे. कितना कुछ सुनना पड़ता है दूसरों का तो कुरगडु मुनि की भी यही हालत हो रही थी.
जो तीन तपस्वी मुनि थी, उनके दिल में कुरगडु मुनि के प्रति तिरस्कार भाव था जबकि कुरगडु मुनि के मन में किसी प्रकार की बुरी भावना नहीं थी. उनके मन में तो उन तपस्वियों के प्रति भी आदर भाव ही था.
ऐसा कहा गया है कि ज्ञान का अजीर्ण अहंकार है, उसी प्रकार तप का अजीर्ण क्रोध है, ज्ञान यदि Digest ना हो तो अहंकार आता है और तप यदि Digest ना हो तो क्रोध आता है इसलिए ज्ञानी को नम्र बनना चाहिए और तपस्वी को शांत बनना चाहिए.
समताभाव की मिसाल
चातुर्मास में समय बीतने लगा और पर्युषण के दिन आ गए. तपस्वी मुनि अपनी तप साधना कर रहे थे, जब कि कुरगडु मुनि पर्युषण में भी हर दिन गोचरी के लिए जाते थे. इस प्रकार संवत्सरी का दिन आ गया. कुरगडु मुनि ने सोचा ‘आज उपवास कर लेता हूँ.’
लेकिन क्षुधा वेदनीय का इतना तीव्र उदय था कि भूख सहन करना Impossible बन गया. आखिर वे गोचरी लेने के लिए गए और लूखे सूखे चावल लेकर वे वापस अपने उपाश्रय पधारे.
साधु भगवंतों की Lifestyle का एक Principle है कि ‘गोचरी कोई भी लाए लेकिन उस पर अधिकार तो बड़ों का ही होता है. गोचरी लानेवाले मुनि का यह कर्तव्य होता है कि वह बड़ों को लाइ हुई गोचरी बताएं और आहार ग्रहण करने के लिए विनती करे.’
कुरगडु मुनि गोचरी लेकर आए और यह देखकर तपस्वी मुनि मन-ही-मन आवेश में आ गए, Hyper हो गए ‘कैसा भुक्कड़ है यह. संवत्सरी महापर्व के दिन भी आहार नहीं छोड़ता है?’
Extreme समता भाव रखते हुए कुरगडु मुनि अन्य तीन मुनियों में सबसे बड़े तपस्वी मुनि के पास आए और उन्हें अपना पात्र बताया जिसमें वे चावल लेकर आए थे और उसके बाद ‘आहार का लाभ’ देने के लिए विनंति की.
कुरगडु मुनि की प्रार्थना को सुनकर तपस्वी मुनि उन पर बरस पड़े ‘अरे ! तुझे बोलते हुए शर्म नहीं आती है, हमें कितने दिनों से उपवास चल रहे है? निर्लज्ज कहीं का. चला जा यहाँ से.’ इतना ही नहीं, आवेश में आकर उन तपस्वी मुनि ने उस पात्र में थूक भी दिया. इतना ही नहीं, दूसरे व तीसरे तपस्वी मुनि ने भी वैसा ही किया.
वो ही धिक्कार और तिरस्कार भाव. इतना घोर अपमान और तिरस्कार होने पर भी कुरगडु मुनि ने उन तपस्वी मुनियों का कोई प्रतिकार नहीं किया और वे एकदम शांत रहे और अपना गोचरी का पात्र लेकर एकांत में जाकर गोचरी वापरने की यानी खाने की तैयारी करने लगे.
केवलज्ञान की प्राप्ति
गोचरी वापरने से पहले कुरगडु मुनि विचारधारा में बहते हुए यह सोचते हैं कि ‘धन्य है उन तपस्वी मुनियों को. अहो! कितने दिनों से वे उपवास कर रहे हैं. धिक्कार है मेरी आत्मा को, संवत्सरी जैसे महान दिन में भी मैं आहार छोड़ नहीं पाया. कैसी मेरी आसक्ति है.
धन्य है उन सिद्ध भगवतों को जो आहार की झंझट से पूरी तरह से मुक्त हो गए हैं. अहो! मैंने पूर्व जन्म में कैसे पाप कर्म किए होंगे, जिस कारण संवत्सरी जैसे पवित्र दिन में भी मुझे आहार लेना पड़ रहा है?’
इस प्रकार कुरगडु मुनि की भावना में अभिवृद्धि होती गई और कुछ ही क्षणों में घाती कर्म का पूरी तरह ख़त्म हो जाने से उन्हें तुरंत केवलज्ञान हो गया. कुरगडु मुनि को केवलज्ञान होते ही शासन देवी उन्हें वंदन करने के लिए उस बस्ती में आई.
अद्भुत रूप और लावण्य से युक्त स्त्री को देख वे तीन तपस्वी मुनि सोचने लगे ‘अहो. यह तो शासनदेवी लगती है. अपने तप का कैसा प्रभाव. शासनदेवी भी खींचकर चली आई.’ लेकिन यह क्या? शासनदेवी तो उन तपस्वी मुनियों को वंदन किए बिना ही आगे बढ़ने लगी.
यह विचित्र दृश्य देख तपस्वी मुनि चिल्ला उठे ‘ओ देवी! कहाँ जा रही हो? तपस्वी तो हम हैं, वह तो भुक्कड़ है.’ उसी समय कुछ कठोर शब्दों में शासनदेवी ने कहा ‘ओ तपस्वियों! आप तप के अहंकार में भान भूले हो. अरे, आप कुरगडु मुनि को धिक्कार रहे हो, लेकिन आपको कहाँ पता है कि उन्हें केवलज्ञान हो गया है इसलिए केवली की आशातना मत करो.’
शासनदेवी के इन शब्दों को सुनकर तपस्वी मुनि एकदम घबरा गए ‘अहो! यह क्या? कुरगडु मुनि को केवलज्ञान हो गया है. यानी अपने हाथों से केवली मुनि की आशातना हो गई. अब अपनी क्या गति होगी?
एक सामान्य साधु की आशातना आत्मा को दुर्गति में भटका देती है तो केवली की आशातना का क्या भयंकर परिणाम हमें मिलेगा?’
उन तपस्वी मुनियों के दिल पश्चात्ताप से भर आए और वे उसी क्षण कुरगडु मुनि के पास पहुँच गए और अपने अपराध की क्षमायाचना करने लगे ‘हे भगवंत! हमारी भूल हो गई. सच्चे तपस्वी आप ही थे, हमारे पास तो सिर्फ बाह्य तप था लेकिन आप तो समता के सागर थे. हमें क्षमा करें.’
इस प्रकार अपने पाप का तीव्र पश्चात्ताप करनेवाले, उन तीन मुनियों को भी उसी समय केवलज्ञान हो गया.
Moral Of The Story
आइए देखते हैं इस कथा की Learnings.
1. तपस्वियों को अगर अभिमान आ जाए, तो उनकी तपस्या जलकर राख हो जाती है. बड़ी तपस्या शरीर की नहीं बल्कि मन की है. उपवास करना सरल है लेकिन उपशम करना यानी शांत रहना बहुत बहुत कठिन है. यह बात 3 अन्य मुनि भगवंतों के जीवन से पता चलता है.
2. तपस्या आदि में हमसे छोटा व्यक्ति भी मन के स्तर पर हमसे बहुत बड़ा हो सकता है. यह बात भी कुरगडु मुनि के जीवन से पता चलती है. Weak को Weak मानना वह बहुत बड़ी Weakness है. वह हमारा Overconfidence है.
3. हमारे अरमान ललितांग राजकुमार की तरह कितने भी ऊँचे क्यों ना हो, पर कर्म हमें छोड़ेंगे नहीं और इसलिए कर्मों को सहन करने की शक्ति भी कुरगडु मुनि की तरह हम Develop कर सकते हैं.
4. हमारी अगर कोई Weakness हो तो उसे Accept करना आना चाहिए और अगर कोई उस चीज़ को लेकर हमारा अपमान करे, तो उसे स्वीकारना भी आना चाहिए. वहां सामनेवाले का नहीं बल्कि खुद के कर्मों का दोष सोचना चाहिए.
5. कुदरत ने कुरगडु मुनि की सहनशीलता को नमन किया और सीधा केवलज्ञान की प्राप्ति हुई. उन्होंने वहां पर ऐसे तर्क नहीं लड़ाएं कि मेरी क्या गलती है, मेरा अपमान क्यों करते हो, क्रोध तो दूर की बात, उफ़ तक नहीं किया.
दूसरी तरफ आज तो घर घर में विद्रोह की बू आती ही रहती है. कोई भी व्यक्ति सहन करना नहीं चाहता. पिता ने डांट लगाईं तो बेटा पिता को उल्टा जवाब देता है, सास ने कुछ कह दिया तो सीधा परिवार से अलग होने के विचार, स्कूल में Teacher ने कुछ कह दिया तो Teacher से नफरत.
सबकी Situations अलग होती है No Doubt लेकिन वास्तविकता यह है कि सहनशीलता धीरे धीरे ख़त्म होती जा रही है. आज कुरगडु मुनि की कथा से हम सहनशीलता के गुण को Develop कर सकते हैं.
6. उपवास करना सरल है लेकिन उपवास करने का अहंकार नहीं करना, बहुत कठिन है. उपवास करना सरल है लेकिन उपवास में क्रोध नहीं करना बहुत कठिन है. भोजन का उपवास सरल लेकिन क्रोध का, अहंकार आदि का उपवास बहुत कठिन.