प्रस्तुत है U-Turn Series का Episode 05
भाविन भाई ने विजयवाडा के अरिहंतधाम में हुए उपधान से जुड़कर अपनी जो कहानी बताई थी वह हमने अभी तक Episode 04 तक देखी। इनकी पूरी Life Story आप U-Turn पुस्तक प्राप्त कर पढ़ सकते हैं।
माता-पिता की खोज
पूज्य गुणहंस विजयजी महाराज साहेब ने भाविन भाई की पूरी कहानी जान ली। पूज्य गुरु भगवंत ने भाविन भाई से पूछा कि ‘भाविन भाई, क्या आपके कोई परिचित है जिनको आपके माता-पिता का ख्याल हो?’
तो भाविन भाई ने उत्तर दिया कि ‘गुरुदेव मेरे काले कारनामों के बाद मेरे कोई सग्गे सग्गे नहीं रहे हैं, इसलिए तो दक्षिण से वापस मुंबई गए तब भी हमने किसी से मदद नहीं मांगी।’ जिन फूफाजी ने दक्षिण में Set किया था उनका Contact किया गया तो पता चला कि उन्हें भी भाविन भाई के माता-पिता की कोई जानकारी नहीं थी।
फिर भाविन भाई ने कहा कि ‘माता-पिता सौराष्ट्र के वीरपुर जाने का कह रहे थे, वहां एक वृद्धाश्रम है। जलारामबापा की महिमा बहुत है। वहां रोज़ हजारों लोगों को मुफ्त में भोजन दिया जाता है तो शायद मम्मी-पापा को यह बात मन में आई होगी कि कम से कम पेट भरने का तो उधर मिल ही जाएगा।
क्योंकि पास में पैसे तो है नहीं अगर दूसरी जगह जाएंगे तो पैसे के बिना खाएंगे क्या? तो उस हिसाब से माता-पिता उसी Area के आस पास होने चाहिए।’ इतना कहकर भाविन भाई रो पड़े। महात्मा ने आश्वासन दिया कि ‘शांत हो जाओ। अब इस तरह रोने से कुछ होनेवाला नहीं है।’
महात्मा ने सोचा कि वीरपुर से नज़दीक एक शहर है राजकोट। 10-12 साल पहले पूज्य आचार्य भगवंत श्री हंसकीर्ति सूरीश्वरजी महाराज साहेब की निश्रा में चातुर्मास हुआ था इसलिए वहां के एक श्रावक प्रीतेशभाई का परिचय था।
उनका संपर्क किया और सब बात बताई और एक काम सौंपा कि वहां के वृद्धाश्रम में आप Check करवाओं कि 10th November के बाद कोई वृद्ध Couple आया है क्या। वे तुरंत इस काम में लग गए। भाविन भाई के फ़ोन से फोटो भी उनको भेजा गया।
प्रीतेश भाई ने बहुत प्रयास किए लेकिन उनका पता नहीं चला। मोक्षमाला नज़दीक आ रही थी और सब आराधक बहुत खुश थे क्योंकि उपधान तप बहुत कठिन होता है कई लोग बीच में छोड़ भी देते हैं। जो पूरा करता है उसकी ख़ुशी का कोई पार नहीं होता है।
सब खुश थे कि अब कुछ ही दिन है और हमें मोक्षमाला मिलेगी। इस ख़ुशी के माहौल को देखकर महात्मा बहुत प्रसन्न थे लेकिन भाविन भाई का चेहरा सामने आया।
आराधकों के भाव
पूज्य गुणहंस महाराज साहेब को विचार आया कि ‘मेरे जिनशासन के श्रावक-श्राविका कोई वृद्धाश्रम में गए होंगे। गरीबी के कारण मुफ्त का खाना खाने के लिए चुपचाप बेसाहारा बनकर लाइन में खड़े होंगे।
शायद वहां पर सुनना भी पड़ा होगा कि अरे थोडा Wait करो भोजन बनने में अभी टाइम लगेगा, उन्हें भूख भी लगी होगी लेकिन बोले किसको, बूढ़े हैं तो हो सकता है चाय की आदत होगी लेकिन अब तो एक टाइम की चाय के लिए भी शायद हाथ फैलाने पड़ेंगे।’
110 आराधकों की ख़ुशी के साथ साथ भाविन भाई की पीड़ा महात्मा को सताने लगी। आँखों से आंसू बहने लगे।
महात्मा ने सभी को सावधान करते हुए कहा कि ‘सुनो आराधकों, आज आप सभी बहुत खुश है लेकिन आपको बता दूँ कि आपके साथ ही जिसने उपधान की आराधना की है, जो आपके साथ ही मोक्षमाला पहननेवाले हैं ऐसा एक व्यक्ति हमारे बीच है लेकिन बहुत दुखी है।
वह आपका-मेरा हम सभी का भाई है, हम सभी खुश और वह अत्यंत दुखी यह बात मुझे बहुत दुखी करती है। वह कौन है अभी आपको नहीं बताएँगे लेकिन सिर्फ इतना कहना है कि आप सभी की मोक्षमाला में तो बहुत लोग आएंगे, आपको शाता पूछेंगे।
लेकिन उस आराधक की मोक्षमाला में कोई नहीं आएगा, उसके सग्गे माता-पिता जीवित होने के बावजूद भी शायद नहीं पहुँच पाएंगे। हमारे आराधक भाई के दुःख में हम सहभागी नहीं बनेंगे?’
आराधकों में एक भाई थे कुनालभाई जो पूज्य हेमगुण विजयजी महाराज साहेब के सांसारिक भाई है। वे रो पड़े थे। उन्होंने पूरे उपधान अट्ठम् + नीवी, अट्ठम् + नीवी इस तरह से किए थे।
उस दिन उनको नया अट्ठम् शुरू करना था तो उन्होंने उसी समय खड़े होकर कहा कि ‘मेरा यह अट्ठम् अपने उस आराधक भाई को संपूर्ण शाता मिले, समाधि मिले, उसके लिए रखता हूँ।’ सब बहुत खुश हुए। कई लोगों की आँखों में आंसू थे।
उस समय दोपहर का समय था तो वापरने का समय हो चुका था। तो महात्मा ने आगे कहा कि ‘देखो आज शाम को मंदिर में हम सब प्रभु को हमारे उस एक आराधक के लिए प्रार्थना करेंगे, सच्चे भाव से प्रार्थना करेंगे।
अभी पूरी बात आपको नहीं बता पाऊंगा लेकिन जब जब जो जो उचित लगेगा तब तब बताऊंगा। आज आप सभी को बहुत भाव से प्रार्थना करनी है याद रखना।’
एक अनकही प्रार्थना
प्रवचन पूर्ण करके हॉल से महात्मा नीचे उतरे और उपाश्रय की तरफ जाने लगे और उपाश्रय पहुँचते ही पूज्य हेमगुण विजयजी महाराज साहेब बोले ‘गुरुजी, भाविन भाई के माता-पिता मिल गए हैं।’
पूज्य गुणहंस विजयजी महाराज साहेब ने आनंद से कहा। ‘क्या..!’ उनके आश्चर्य और आनंद का पार नहीं रहा। सब मिलकर शाम में प्रार्थना करनेवाले थे लेकिन परमात्मा तो करुणासागर है प्रार्थना करें उससे पहले ही, प्रार्थना करने का सिर्फ संकल्प लिया और परमात्मा ने प्रार्थना सुन भी ली।
सब कुछ एक चमत्कार जैसा लग रहा था।
दरअसल प्रीतेश भाई फोटो के साथ एक वृद्धाश्रम में पहुंचे तो वहां के मेनेजर ने फोटो देखकर कहा कि ‘हाँ, एक Couple आया तो है लेकिन आप उनके कौन लगते हो?’ प्रीतेश भाई ने हकीकत बता दी कि ‘मैं उनका कोई नहीं लगता हूँ लेकिन उनका बेटा उन्हें ढूंढ रहा है इसलिए उनका बेटा उनके साथ बात करना चाहता है।’
मेनेजर को विश्वास बैठ गया तो वहां से Video Calling की गई और भाविन भाई ने लगभग 57 Days के बाद अपने माता-पिता को देखा। लेकिन 57 Years के बाद देखा हो ऐसा एहसास उनके चेहरे पर झलक रहा था।
भाविन भाई रो रहे थे। माता-पिता भी रो रहे थे। मोबाइल पकडे श्रावक भी रो रहे थे।
माँ की आवाज़ आई ‘भाविन तू कैसा है?’ भाविन भाई ने उत्तर दिया ‘माँ.. मैं ठीक हूँ। माँ मैंने उपधान किया है और अच्छी तरह से पूरा होने को आया है। माँ मेरी मोक्षमाला है, आप दोनों मज़े में हो?’
इतना कहकर भाविन भाई अटक गए और सोचने लगे कि ‘मम्मी-पापा वृद्धाश्रम में हैं तो मज़े में कैसे हो सकते हैं?’ फिर भी वहां से उत्तर आया कि ‘हाँ, भाविन हम यहाँ पर अच्छी तरह से जीवन पसार कर रहे हैं, हमें कोई तकलीफ नहीं है बेटा, यह संस्था भी बहुत अच्छी है।’
पुज्य गुणहंस विजयजी महाराज साहेब वापस गए भोजनशाला की तरफ और सभी आराधकों को जो वापरने बैठ गए थे उन्हें शांत किया और बड़ी आवाज़ में घोषणा की कि
जिस कार्य के लिए हम शाम में प्रार्थना करनेवाले थे वह प्रार्थना करने से पहले ही भगवान ने प्रार्थना सुनकर पूरी कर ली है, विस्तार से बाद में बताऊंगा। अब हमें प्रभु को प्रार्थना नहीं करनी है बल्कि उपकार मानना है। शाम में प्रभु भक्ति में धन्यवाद कहना है।
वैसे अभी तक किसी भी आराधक को यह पता ही नहीं था कि यह सब कुछ क्या हो रहा है और किस आराधक के लिए हो रहा है।
अरिहंतधाम तक का सफ़र
प्रीतेश भाई को तुरंत संदेश भेजा गया कि ‘माता-पिता को अब वृद्धाश्रम में नहीं रखना है, आपके साथ ही आपके घर लेकर जाओ, आगे क्या करना वह बाद में बताएँगे।’ वहां के मेनेजर भाविन भाई के माता-पिता से बहुत खुश थे क्योंकि दोनों एकदम शांत थे। कोई शिकायत नहीं, कोई मांग नहीं।
मेनेजर का कहना था कि ‘यह बहन यानी भाविन भाई की माँ तो बहुत Active है। खुद रसोईघर में, भोजनशाला में भोजन के समय सभी को परोसने का काम भी करती है।’
वहां से निकलते वक्त मेनेजर ने कहा कि ‘आप दोनों को वापस आना पड़े ऐसी इच्छा रखता नहीं हूँ, आप अपने बेटे के साथ एकदम ख़ुशी से रहना लेकिन मानो भविष्य में वापस यहाँ आने की ज़रूरत पड़े तो हमारे दरवाज़े आपके लिए हमेशा खुले रहेंगे।’
प्रीतेश भाई को संदेश भेजा गया कि ‘24 घंटे में भाविन भाई के माता-पिता विजयवाडा के पास अरिहंतधाम तीर्थ पहुँच सकेंगे क्या?’ प्रीतेश भाई ने अपनी मेहनत शुरू की और राजकोट से हैदराबाद फ्लाइट में और हैदराबाद से 300 KM Car के द्वारा अरिहंतधाम तीर्थ लाने का प्लान बनाया गया।
उस समय पूज्य गुरु भगवंत के पास नितिन भाई नामक श्रावक उपस्थित थे, उन्होंने अपने हैदराबाद के मित्र केतन भाई को फ़ोन किया और Car से तीर्थ पर लाने का कार्य सौंपा।
केतनभाई Airport पर गए, उन्हें वहां से अपने घर ले जाकर अच्छी तरह से नाश्ता कराया और फिर वहां से Driver के साथ अरिहंतधाम तीर्थ के लिए रवाना किया।
हैदराबाद से कार निकल चुकी थी और 2-3 घंटे में माता-पिता पहुँच जाएंगे यह जानकारी मिलते ही महात्मा ने कहने जैसी बातें सभी को बता दी और भाविन भाई को सभी के समक्ष प्रगट किया। सब कुछ नहीं बताया था जितना योग्य था उतना ही बताया था।
महात्मा और आराधक तो कल्पना भी नहीं कर सके ऐसी घटना हो रही थी। ड्राईवर को कह दिया गया कि Car तीर्थ के बाहर ही खड़ी रखे। सभी आराधक दो ढाई बजे देरासर से बराबर नीचे उतरे और भाई और बहनें दो लाइन में खड़े होकर उनका स्वागत करने के लिए तैयार थे।
माता-पिता का बेटे से मिलन
भाविन भाई के माता-पिता गाडी से नीचे उतरे और महात्मा के दर्शन करते ही उन्हें हाथ जोड़े और अचानक 24 घंटों में उनके जीवन में जो इतना बड़ा U Turn आया उसकी चमक उनके चेहरे पर साफ़ साफ़ दिख रही थी।
महात्मा के संसारी Cousin तुषार भाई वही पर मौजूद थे उन्होंने दोनों बूढ़े माता-पिता का हाथ पकड़ा और तीर्थ के गेट की तरफ चलने लगे। सभी लोगों ने भगवान की जय बोली और पीछे जो प्रभु भक्ति के लिए Speakers थे उसमें प्रभु भक्ति के गीत शुरू हो गए।
सभी के चेहरों पर एक अलग प्रकार की ख़ुशी दिख रही थी। सभी ने अक्षत से माता-पिता को वधाया और अद्भुत सम्मान के साथ स्वागत किया। लेकिन माता-पिता की आँखें तो उनके पुत्र भाविन को देखने के लिए तरस रही थी।
आखरी में भाविन भाई अपने माता-पिता को देखने के लिए तरस रहे थे। सबसे आखरी में वे खड़े थे। कल तक सट्टे में लिप्त उनका बेटा आज पौषध में था। पिता बेटे की आँखों में अनराधार आंसू थे लेकिन इस बार हर्ष के।
पिता के चरणों में झुककर भाविन भाई ने आशीष लिए। पौषध में थे तो माँ के गले तो नहीं लग सके लेकिन दूर से ही ज़मीन पर ही झुककर खमासमण जैसी मुद्रा में अपनी माता को वंदन किया। यह दृश्य देखकर सभी भावुक हो गए। लगभग सब लोग रोने लग गए।
वहां से सभी आराधक और माता-पिता अभी भगवान के दर्शन करने के लिए देरासर में चढ़े। भाविन भाई और उनके माता-पिता ने परमात्मा की तीन प्रदक्षिणा दी। वहां से सब लोग प्रवचन हॉल में पहुंचे। थोड़ी बहुत बातें हुई और सब अपनी अपनी आराधना में लग गए।
कुछ समय के बाद माता पिता पूज्य गुणहंस विजयजी महाराज साहेब को मिलने आए। तो महात्मा ने पूछा कि ‘आपकी अनुकूलता हो तो क्या आप बता पाएंगे कि मुंबई से सौराष्ट्र के वीरपुर गए उसके बाद क्या हुआ?’
इसके बाद वह माता-पिता ने जो कुछ बताया वह जानकर शायद हम अंदर से हिल जाएंगे।
इसके लिए Episode 06 का इंतज़ार करना पड़ेगा।
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