प्रस्तुत है U-Turn Series का Episode 06
भाविन भाई और माता-पिता का मिलन किस तरह हुआ यह हमने अभी तक Episode 05 में देखा। इनकी पूरी Life Story आप U-Turn पुस्तक प्राप्त कर पढ़ सकते हैं।
लोगों द्वारा दान
पूज्य गुणहंसविजयजी महाराज साहेब से बात करते समय माता-पिता ने कहा कि ‘पहले तो हमने तलाश करके 2-3 वृद्धाश्रमों में काफी पूछताछ की, हमें वहां पर रखने के लिए विनंती भी की, हाथ भी जोड़े लेकिन कोई न कोई कारण से हमें वहां पर नहीं रखा।
कहाँ जाना पता नहीं चल रहा था। पैसे हमारे पास थे नहीं। अंत में जलाराम बाप के अन्नक्षेत्र में मुफ्त में भोजन का सोचा था अगर उधर नहीं मिलता तो भीख मांगने की पूरी तैयारी कर ली थी।’
दरअसल इस दौरान एक भला रिक्शावाला उन्हें मिला और उनसे कहा कि ‘एक नया वृद्धाश्रम है आप वहां पर जाइए।’ माता-पिता ने सोचा कि मरना है वह तो पता था लेकिन आत्महत्या की हिम्मत नहीं थी। उस रिक्शेवाले की बात सच हो गई।
दोनों को उस वृद्धाश्रम में आदरपूर्वक स्थान मिल गया। वहां के मालिक और मेनेजर दोनों ही भले इंसान थे। वहां रहने के लिए एक रूम, तीनों समय का भोजन, सब कुछ फ्री था लेकिन कपडे तेल साबुन आदि का खर्च हर एक को खुद ही करना होता था।
बाकियों को तो शायद उनके लड़कों से मिलता होगा लेकिन भाविन भाई के माता-पिता को कहाँ से मिलता। कपडे तो खरीदने नहीं थे लेकिन छोटे बड़े खर्च के लिए थोड़े पैसे तो चाहिए ही होते हैं।
उस वृद्धाश्रम में कुछ कुछ दिनों में कुछ लोग Visit करते रहते थे। उनके मन में करुणा जगती तो सभी वृद्धों को 10-20-50 रुपये के नोट देते। भाविन भाई के माता-पिता को उस समय पैसों की ज़रूरत थी लेकिन शर्म भी आ रही थी।
‘आज तक हाथ किसी के आगे फैलाए नहीं थे। लेकिन अब अगर शर्म रखे तो जीवन कैसे जीयेंगे?’ यह प्रश्न था। इसलिए मन मारकर भी, अपने स्वाभिमान को कुचलकर भी, आंसुओं को अंदर दबाकर भी वे चुपचाप उस नोट को ले लेते थे।
एक समय में खुद के दो घर, फिर किराए का घर 500-1000 रुपये आराम से खर्च कर सके उस स्थिति से आज ऐसी स्थिति थी की 10 रुपये भी किसी से दान में लेने पड़ रहे थे।
माता पिता ने कहा कि ‘साहेबजी, यहाँ पर आने से 2-3 दिन पहले ही कुछ उदार दिलवाले गृहस्थ आश्रम में आए थे उन्होंने सभी को 500-500 रुपये दिए थे तो हमारे पास वे 1000 रुपये हैं। आज तो वे 1000 रुपये भी बहुत कीमती लगते हैं।’
साधर्मिक क्षेत्र
महात्मा को यह सुनकर बहुत आघात लग रहा था। उन्हें ऐसा लगा कि ‘मेरे जिनशासन के श्रावक श्राविका को 10 रुपये के लिए हाथ फैलाने पड़े, भीख लेनी पडे।’ यह तो एक घटना सामने आई है। लेकिन ना जाने इस तरह से कितने ही श्रावक श्राविका कठिन परिस्थिति में जी रहे होंगे।
माना कि भाविन भाई की गलती के कारण यह सब हुआ लेकिन सभी श्रावक श्राविका के साथ ऐसा थोड़े ही होता है। कुछ लोग तो इमानदारी से काम करते हैं लेकिन कई बार नसीब साथ नहीं देता।
फिर भी हमारे जिनशासन के श्रावक-श्राविका हाथ फैलाए सोचकर ही महात्मा का ह्रदय कांप रहा था। एक तरफ दिखावे के नाम पर शासन में हो रहे ज़रूरत से ज्यादा खर्चे, फिर चाहे वह भोजन का विषय हो, मंडपों का विषय हो, पत्रिकाओं का विषय हो, अब तो बहुत सी चीज़ें और भी जुड़ गई है।
और दूसरी तरफ हमारे श्रावक श्राविका बाहर किसी के सामने हाथ फैलाए। हम ऐसा नहीं कह रहे हैं कि कुछ भी नहीं होना चाहिए लेकिन इस विषय में विवेक की बहुत आवश्यकता है। किस क्षेत्र में कितना खर्च करना इस पर ठोस निर्णय ठोस एक्शन आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य भी है।
आज के समय में साधर्मिक क्षेत्र में बहुत लोग ध्यान दे तो रहे हैं लेकिन ज़रूरत और भी ज्यादा लगती है।
माँ का विश्वास
महात्मा ने प्रश्न पूछा कि ‘क्या आपको आशा थी कि आपका बेटा आपको वापस मिलेगा? आप उसे वापस देख सकोगे।’
तो पिता ने उत्तर दिया कि ‘नहीं महाराज साहेब, मुझे तो आशा नहीं थी और डर भी था कि जिनके पैसे बाकी है उन्होंने इसको पकड़ लिया तो कहीं मार ना दे। पुलिस में शिकायत कर पकडवा भी सकते हैं, जेल में भी डलवा सकते हैं।’
लेकिन माँ ने कहा कि ‘मुझे तो पूरा विश्वास था, मैं रोज़ सुबह-शाम प्रभु को प्रार्थना करती थी कि मेरा बेटा जहाँ भी हो, तू उसकी रक्षा करना और उसे रास्ते पर लगाना और प्रभु ने मेरी प्रार्थना सुनी और साधु भगवंतों के साथ ही उसका मिलन करवा दिया।
उपधान जैसे श्रेष्ठ धर्ममार्ग पर उसे लगा दिया। साथ में यह प्रार्थना भी करती कि मुझे इस भव में एकबार तो मेरे बेटे को वापस मिलन करवाना ही।’ महात्मा ने पूछा कि ‘वृद्धाश्रम में भोजन वगैरह की व्यवस्था कैसी थी?’
तो उन्होंने कहा कि ‘भोजन वगैरह का अच्छा ध्यान रखते हैं फिर भी साहेबजी घर तो घर ही होता है।’ अब मोक्षमाला तक माता-पिता वहीँ पर रुकनेवाले थे। आगे क्या होगा वह तो प्रभु के ऊपर छोड़ दिया था।
लेकिन इस दौरान कुछ रोंगटे खड़े कर देनेवाली घटनाएं घटी।
आराधकों ने लिया अद्भुत लाभ
अगले दिन महात्मा के संसारी भाभी ने महात्मा से कहा कि ‘साहेबजी, उस बहन के पास मंगलसूत्र नहीं है, मेरे पास एक Extra मंगलसूत्र है अगर आप अनुमति दे तो मुझे इतना लाभ चाहिए।’
थोड़ी ही देर में चेन्नई के कविताबहन आए, उनकी छोटी बेटी जिनिषा ने कहा कि ‘महाराज साहेब, मुझे मम्मी ने अभी ही कान में पहनने की Earrings Gift में दी है, वो सोने की है मुझे भाविन भाई के मम्मी को यह पहनानी है, मुझे इतना लाभ लेने दो।’
थोड़ी देर में उपधान में आराधना करनेवाले एक रिंकूबहन नमक श्राविका आए और कहा कि ‘साहेबजी, मेरे पास सोने की एक वस्तु है, उसकी कीमत लगभग 5 लाख की है, वह मुझे इस परिवार को देनी है, यह लाभ मुझे दो।’
थोड़ी देर में निधिबहन जो उपधान के लाभार्थी परिवार की बेटी थी, वो आए, दरअसल उनका जन्मदिन था तो उन्होंने भाविन भाई की माता के चरणों को स्पर्श करके आशीर्वाद माँगा कि ‘आज मेरा जन्मदिन है, आप मुझे आशीर्वाद दीजिए।’
तो माता दक्षाबहन ने 100 रुपये दिए कि खाली हाथ आशीर्वाद नहीं दिए जाते। निधिबहन तो पौषध में थे तो रुपयों को स्पर्श नहीं किया लेकिन यह घटना उन्होंने जब बताई तो आश्चर्य हुआ कि उनके पास देने के लिए ज्यादा कुछ भी नहीं है फिर भी 100 रुपये निकालकर देने के लिए हाथ आगे बढाए।
कितना उनके अंदर की सरलता।
यह सब कुछ सुनने में, देखने में भले सामान्य लगे। लेकिन आज के समय में यही साधर्मिक भक्ति की आवश्यकता लगती है।
दीपिकाबहन का अद्भुत निर्णय
अब प्रश्न यह था कि भाविन भाई जब तक Settle ना हो तब तक क्या करना? उनके माता-पिता तब तक कहाँ रहेंगे? यह एक बड़ा प्रश्न था।
वृद्धाश्रम में रखने की तो बिलकुल भावना नहीं थी लेकिन दूसरी कोई व्यवस्था नहीं हो तब तक यही एक उपाय था-वृद्धाश्रम। यह बात महात्मा ने उपधान में सभी के सामने कह दी।
क्योंकि महात्मा का Vision इस विषय में एकदम Clear है कि साधार्मिकों को मदद नहीं बल्कि मेहनत दो। ताकि वे खुद के पैरों पर खड़े हो जाए। यही Practical और Long Term Solution है और कमाल हो गया।
पूज्य गुणहंस विजयजी महाराज साहेब के एक शिष्य महात्मा है जिनका नाम है पूज्य वासक्षेपविजयजी महाराज साहेब, उनके संसारी माता दीपिकाबहन वो वही पर थे उन्होंने कहा कि ‘यदि आपकी अनुमति हो तो भाविन भाई के माता-पिता को मैं अपने घर में रखना चाहती हूँ।
पूरी ज़िन्दगी रखूंगी। मेरे माता-पिता की तरह रखूंगी। आप मुझे यह लाभ दो।’ इनकी खुद की उम्र 50 के आस पास होगी और भाविन भाई के माता-पिता की उम्र अधिक थी तो Practically बात करें तो वे ज्यादा कुछ काम कर भी नहीं पाएंगे।
लेकिन ऐसी Situation में भी उन्होंने यह भावना व्यक्त की। आज के समय में लोग खुद के माता-पिता को भी नहीं रखना चाहते ऐसे में किसी और के माता-पिता को रखकर उनकी सेवा करने की इच्छा व्यक्ति करनी। Salute है ऐसी श्राविका को। ये हैं हमारा जिनशासन।
इसी बीच एक और घटना घटी।
भाविन भाई की दीक्षा?
उपधान में भाविन भाई के भाव चढ़ते ही जा रहे थे। उन्होंने महात्मा के चरणों में गिरकर कहा कि ‘महाराज साहेब, क्या आप मुझे दीक्षा देंगे? मुझे अब इस संसार का त्याग करके प्रभु के मार्ग पर चलना है। मुझे अब संयम की इच्छा है।’
पास में बैठे माता-पिता की तरफ गुरु भगवंत की नज़र गई तो उन्होंने तुरंत कहा कि ‘हमारी पूरी सहमति है, ऐसे भी हम तो इसके बिना ही पूरी ज़िन्दगी जीने के लिए तैयार हो गए थे और कदम रख भी दिया था।
भाविन अगर मुनि बन जाए तो हमें बहुत ख़ुशी होगी, हम तो वापस वृद्धाश्रम चले जाएंगे, उन्होंने वैसे भी कहा ही था कि आप कभी भी वापस आ सकते हो दरवाज़े खुले ही है, इसलिए हमारे कारण इसकी दीक्षा रोकने की ज़रूरत नहीं है।’
महात्मा ने कहा कि ‘देखिए, आपकी बात सही है, भाव भी बहुत अच्छे हैं लेकिन अभी भाविन भाई के सर पर कर्ज है, हालांकि वह चुका पाएगा या नहीं वह भी एक बहुत बड़ा प्रश्न है।
कर्ज की रकम भी बहुत बड़ी है इसलिए किसी को प्रेरणा भी करनी अनुचित ही लगता है, इसलिए फिलहाल तो हम दीक्षा नहीं दे पाएंगे, भविष्य में वडील गुरु भगवंतों को पूछकर इस विषय में मार्गदर्शन लेंगे।’
सोचिए। एक व्यक्ति जो सट्टेबाजी में लिप्त था, ना जाने कितने लोगों को धोखा दिया, जिसने मदद की उनका भी विश्वास तोडा, हमारी नज़र में हम यही कहेंगे एक नंबर का बेकार आदमी, पापी, थू है ऐसे इंसान पर। ऐसा शायद हम सोच सकते हैं।
लेकिन यही व्यक्ति पर जब प्रभु की कृपा बरसी, सुगुरु भगवंतों का सत्संग हुआ तो लोहा भी सोना बन गया। अब यही आत्मा जिसको शायद हम अभी तक शैतान समझ रहे होंगे वह साधु बनना चाहता था। क्या किसी को Judge करना का अधिकार हमें हैं। सोचने जैसा है।
Chennai में हुए Settle
अब Practically बात करें तो भले भाविन भाई के प्रति सबको Positive भाव आए लेकिन Reality is Reality। ऐसे व्यक्ति पर अब कौन विश्वास करें। असत्य बोलनेवाले पर जल्दी से कोई इंसान विश्वास नहीं करता।
लेकिन जिनशासन में रत्नों की कहाँ कमी है। चेन्नई के नितिन भाई ने पहल की और कहा कि इस पूरे परिवार को मैं चेन्नई लेकर जाऊँगा, मेरे वहां ही भाविन भाई को नौकरी पर रखूँगा। सब Set हो जाएगा।
नितिन भाई को चेन्नई में 1BHK का घर मिल गया, और भाविन भाई को अपने यहाँ ही नौकरी पर रख दिया। लेकिन जिसका जीवन इतनी सारी बुरी आदतों से गुज़रा हो वो क्या अब रुक जाएगा।
क्या भाविन भाई फिर से सट्टेबाजी की गलती करेंगे या इमानदारी से मेहनत करके जीयेंगे?
क्या उनके जीवन में ऐसा कोई चमत्कार होगा जिसका हम अंदाजा भी ना लगा सके?
आखिर क्या लिखा है उनके भविष्य में?
जानेंगे U-Turn Series के आखरी Episode.. Episode 07 में।
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