Gajpad Kund: The Mysterious Treasure of Girnar Jain Tirth | Episode 06

गिरनार का रहस्यमय गजपद कुंड

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By Jain Media 31 Views 8 Min Read

गुणवंत गजपद कुंड की रोचक कथा

इस Episode में हम जानेंगे गिरनार के प्रसिद्ध गजपद कुंड की पवित्रता और उसका महत्व। 

प्रस्तुत है, Girnar History का Episode 06. बने रहिए इस Video के अंत तक।

दुर्गंधा की विनती 

बहुत समय पहले की बात है। श्रीपुर नामक एक नगर में पृथु नामक एक बहुत ही बहादुर क्षत्रिय रहता था और उसकी पत्नी का नाम चंद्रमुखी था। 

पृथु के घर एक दुर्भाग्यशाली बेटी का जन्म हुआ जिसका नाम था दुर्गंधा क्योंकि उसके शरीर से बहुत तेज़ और अजीब सी दुर्गंध यानी Smell आती थी और इसी कारण से कोई भी उससे शादी करने को तैयार नहीं था। 

आख़िरकार, एक युवक सोमदेव से दुर्गंधा की शादी हुई लेकिन पहली ही रात को सोमदेव दुर्गंधा में से आ रही Smell से परेशान होकर भाग गया। पति, माता-पिता और परिवार के छोड़ देने पर दुर्गंधा अकेली रह गई। 

नगर में सभी ने उसकी बहुत Insult की, उसे धिक्कारा, जिससे वह बहुत दुखी हो गई और एक दिन उसने निर्णय लिया कि अब उसे उस नगर में नहीं रहना है और वह तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ी। 

वह कई बड़े-बड़े अन्य धर्म के स्थानों पर गई लेकिन उसके मन को शांति नहीं मिली। End में आत्महत्या यानी Suicide करने का Decision लेकर वह समुद्र की ओर चल पड़ी। 

उसी समय दुर्गंधा को रास्ते में एक तापस दिखे। दुर्गंधा ने भावपूर्वक तापस मुनि को वंदन किया लेकिन तापस मुनि ने भी उसके शरीर की दुर्गंध से परेशान होकर मुँह मोड़ लिया।

यह देख दुखी मन से दुर्गंधा कहती है कि ‘हे तापस मुनिवर। आप जैसे वैरागी भी मुझसे दूर हो रहे हैं, तो अब मैं किसके पास जाऊँ? मेरे पाप कैसे दूर होंगे?’ 

तापस मुनि दुर्गंधा को कहते हैं कि ‘हे वत्सा, इस जंगल में मेरे गुरुदेव कुलपति का आश्रम है। वहां जाकर उन्हें अपने दुख की बात बताओ, वे तुम्हें इस परेशानी का उपाय बताएँगे।’ 

यह सुनकर दुर्गंधा तापस मुनि के पीछे पीछे आश्रम में पहुँच जाती है। दुर्गंधा को दूर से ही श्री ऋषभदेव भगवान (आदिनाथ भगवान) के ध्यान में लीन जटारूपी मुकुट के धारक कुलपति के दर्शन होते हैं। 

उनके पास जाकर दुर्गंधा उन्हें वंदन करती है लेकिन तब ही कुलपति भी उसके शरीर की दुर्गंध से परेशान होकर उससे पूछते हैं कि ‘हे वत्सा। तेरे शरीर से इतनी दुर्गंध क्यों आ रही है? तू इतनी परेशान क्यों है?’ 

दुर्गंधा ने रोते हुए अपनी पूरी कहानी सुनाई और कुलपति से विनंती यानी Request की कि ‘गुरुदेव, कृपया मेरी इस परेशानी को ख़त्म करने का और मेरे पाप कर्मों को ख़त्म करने का कोई उपाय बताइए।’ 

गजपद कुंड का जल 

कुलपति ने कहा ‘मैं केवलज्ञानी तो नहीं हूँ, लेकिन एक उपाय बता सकता हूँ। आप शत्रुंजय महातीर्थ की यात्रा करते हुए गिरनारजी महातीर्थ पर जाना और वहां के गजपद कुंड के जल से स्नान करना। इस कुंड के जल से स्नान करने से तुम्हारे अशुभ कर्म ख़त्म हो सकते हैं।’

कुलपति की यह बात सुनकर दुर्गंधा की आँखों में उम्मीद की चमक आ गई और वह तुरंत ही तीर्थ यात्रा के लिए निकल गई। 

पहले वह श्री शत्रुंजय गिरिराज पर पहुंची और वहां श्री ऋषभदेव परमात्मा की बहुत भावों से भक्ति की। फिर वह गिरनार की और बढ़ी और गिरनार पहुँचकर, वहां के पवित्र गजपद कुंड में स्नान करने जानी लगी। 

लेकिन वहाँ भी उसे कुंड में स्नान की अनुमति नहीं मिली क्योंकि दुर्गंधा के अंदर से अभी भी बहुत तेज Smell आ रही थी। 

लेकिन उसने हार नहीं मानी और वह कुंड का जल जो बाहर लाया जाता था, उस जल से लगातार 7 दिनों तक स्नान करने से उसके शरीर की दुर्गंध पूरी तरह ख़त्म हो गई और अब तो उसका शरीर सुगंध से भर गया। 

उसकी सुंदरता भी और बढ़ गई और उसके चेहरे पर अलग ही तेज दिखने लगा। 

दुर्गन्ध ख़त्म होने के बाद उसे गजपद कुंड में स्नान करने की Permission मिल गई और गजपद कुंड के पवित्र, शुद्ध और रोग निवारक जल से स्नान करके उसने जिनमंदिर में जाकर अत्यंत भावपूर्वक श्री नेमिनाथ भगवान की पूजा की। 

जब दुर्गंधा पूजा आदि करके जिनालय से बाहर आई तब उसे एक केवली भगवंत मिले। दुर्गंधा ने तुरंत उन्हें वंदन किया और अपने पूर्व जन्म के बारे में जानने की इच्छा जताई। 

दुर्गंधा का पूर्व भव

केवली भगवंत ने कहा ‘हे भद्रे। तुमने पिछले जन्म में अपने कुल का बहुत अहंकार था। एक बार तुमने जैन साधुओं का मज़ाक उड़ाया था और कहा था कि “ये साधु तो स्नान भी नहीं करते हैं, कितने गंदे रहते हैं। इनमें से कितनी दुर्गन्ध आती होगी।”

बस, इसी पाप के कारण तुम्हें नरक और अनेक नीच कुल में जन्म लेना पड़ा। अब इन शत्रुंजय, गिरनार आदि तीर्थों की भक्ति से तुम्हारे पुराने पापों का अंत हुआ है और तुम्हें सम्यक्त्व की प्राप्ति हुई है।’ 

Please Note : सम्यक्त्व यानी सही की पहचान, Reality को स्वीकारना, सही को सही और गलत को गलत मानना, ऐसी Strong श्रद्धा को सम्यक्त्व कहते हैं।

फिर केवली भगवंत ने आगे कहा ‘हे वत्सा, जो वैरागी, संयमी मुनि होते हैं, उनकी निंदा बहुत बड़ा पाप है। वे बिना किसी स्वार्थ के सब जीवों की भलाई के लिए धर्म का प्रचार करते हैं। 

उनकी निंदा करने से अनंत भवों का भ्रमण बढ़ जाता है यानी अनंत भवों तक संसार में भटकना पड़ता है। लेकिन अब तुमने जो तीर्थभक्ति की है, उससे तुम्हारे कर्म कुछ कम पड़े हैं और मोक्ष का रास्ता तुम्हारे लिए खुला है।’ 

यह सुनकर दुर्गंधा की आँखों से आँसू निकलने लगे लेकिन इस बार दुर्गंधा के आंसूं उसके दुःख के या दुर्गन्ध के कारण नहीं बल्कि धन्यता और आनंद के कारण बह रहे थे। 

दुर्गंधा केवली भगवंत के चरणों में सर झुकाकर कृतज्ञता से भर उठी। 

तो यह थी गिरनारजी तीर्थ के गजपद कुंड की Importance और महिमा बताती हुई एक छोटी सी कथा। 

Girnar History की इस Series के सारे Episodes पढ़ने जैसे हैं। 

और हाँ, गिरनार महातीर्थ की यात्रा वर्ष में एक बार तो कम से कम करने जैसी है, ज्यादा करो तो अच्छा ही है। यात्रा में जाने से पहले इतिहास जानकर जाएंगे तो भावों में वृद्धि होगी।

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