खुद को कैसे Judge करना?
प्रस्तुत है आगम ज्ञानी बनो Series के अंतर्गत उपदेशमाला ग्रंथ का Episode 15.
पिछले Episode में 22वीं गाथा का रहस्य हमने देखा था, इस Episode में फिर से उसी गाथा का एक और सुंदर रहस्य देखते हैं क्योंकि इस एक गाथा को अच्छे से अगर हम समझते हैं और Apply करते हैं तो बेडा पार हो सकता है। अप्पा जाणइ अप्पा,
जहट्ठिओ अप्पसक्खिओ धम्मो।
अप्पा करेइ तं तह,
जह अप्पसुहावओ होइ।। (22)Updeshmala Granth
मेरी आत्मा अच्छे भाव वाली है या बुरे भाव वाली है? वह मेरी आत्मा ही जानती है। इसलिए धर्म में आत्मा की ही साक्षी चलती है। उस कारण से आत्मा को उस प्रकार धर्म करना चाहिए कि वह अनुष्ठान आत्मा के सुख को लाने वाला बने। यह गाथा का अर्थ है।
अब विस्तार से देखते हैं…
1. धर्म दो प्रकार से होता है-
A. क्रिया रूप धर्म और
B. भाव रूप धर्म।
जो क्रिया रूप धर्म है वह भाव रूप धर्म तक लेकर जा सकता है लेकिन भाव रूप धर्म तक लेकर जाएगा ही ऐसा कोई नियम नहीं है।
अगर क्रिया धर्म भाव धर्म को उत्पन्न ना करे तो वह क्रिया धर्म से सिर्फ पुण्य-स्वर्ग मिलेगा है, मोक्ष नहीं मिलेगा और स्वर्ग के बाद दुर्गतियों की परंपरा में जीव भटक सकता है।
2. जो भाव रूप धर्म है, वह कर्मों का क्षय करके अवश्य मोक्ष की प्राप्ति करवाता ही है।
3. अभी प्रश्न यह है कि क्रिया धर्म क्या है? और भाव धर्म क्या है? तो हम उसके लिए कुछ Simple Examples देखते हैं..
→ तीर्थंकर परमात्मा की पूजा करना-क्रिया धर्म है। उसमें प्रभु के प्रति अहोभाव-पूज्यभाव-गुणानुरागभाव-समर्पण भाव यह सब भाव धर्म है।
→ तपस्या जैसे कि उपवास, एकाशना, आयम्बिल, सिद्धितप, वर्षीतप वगैरह-क्रिया धर्म है। उसमें भोजन-पानी के प्रति अनासक्ति-Detachment-वैराग्य-Taste का पागलपन नहीं होना यह भाव धर्म है।
→ गरीबों को धन भोजन आदि का दान करना-क्रिया धर्म है। उसमें करुणा भाव जगना टिकना बढ़ना-अनुकंपा भाव वगैरह.. यह भाव धर्म है।
→ साधर्मिकों की भक्ति-क्रिया धर्म है। उसमें ‘यह मेरा जैन धर्मी बंधू है।’ ऐसा अत्यंत वात्सल्य भाव होना वह भाव धर्म है।
→ परपुरुष या परस्त्री के साथ मैथुन सेवन नहीं करना-यह क्रिया धर्म है। उसमें परपुरुष या परस्त्री के प्रति मन में विकारभाव-वात्सल्यभाव नहीं जगना, यह भाव धर्म है।
→ मेरे जैसा व्यक्ति दूसरों को इस तरह से प्रभु के वचनों का संदेश दे-वह क्रिया धर्म है। उसमें परोपकार की भावना होनी, अहंकार आदि नहीं होना, यह भाव धर्म है।
पूजा से प्रभु के प्रति समर्पण भाव आ सकता है लेकिन आएगा ही ऐसा ज़रूरी नहीं। तपस्या में Detachment आ सकता है लेकिन आएगा ही ऐसा ज़रूरी नहीं।
इसी तरह से बाकियों का भी समझ लेना है। ऐसे अनेक छोटे-बड़े क्रिया-भाव धर्म समझ लेने हैं।
4. अब यह प्रश्न है कि हमारे पास क्रिया धर्म हो या भाव धर्म हो, उसमें से कौन से धर्म को दूसरे लोग जान सकते हैं?
सीधी बात है कि हमारे पास जो क्रिया धर्म होगा उसको ही दूसरे लोग जान सकते हैं। हमारे पास जो भावधर्म होगा उसको दूसरे लोग नहीं जान सकते हैं क्योंकि हमारे मन में क्या भाव है वह दूसरों को पता चलनेवाले नहीं है।
मान लो एक व्यक्ति मंदिर में भगवान की पूजा कर रहा हैं, तो लोगों को यह पूजा नाम का क्रिया धर्म दिखेगा और लोग उस व्यक्ति को पूजा-धर्म करने वाला कहेंगे। लेकिन उस व्यक्ति के मन में पूजा करते वक्त प्रभु के प्रति बहुमान था या नहीं, वह तो उनको कैसे पता चलेगा?
उस व्यक्ति के मन में यह भाव चल रहे हैं कि ‘मुझे पूजा करने से Business में जोरदार Profit हो।’ तो भी उनको तो वह खराब भाव पता ही नहीं चलने वाला है।
ऐसे ही अगर कोई व्यक्ति एक गरीब को 100 रूपए दान में देता हैं तो वह दान लोगों को दिखेगा लेकिन उस वक्त उस व्यक्ति में करुणा है या सबके सामने दिखावा करने का भाव है, वह लोगों को दिखनेवाला नहीं है।
एक व्यक्ति किसी पराई स्त्री के साथ Contact आदि में नहीं है, तो वह लोगों को दिखेगा लेकिन उसके मन में परस्त्री के लिए विकार-वासना है या नहीं वह तो लोगों को नहीं दिखेगा।
व्यक्ति सिद्धितप-मासक्षमण आदि करें तो वह तो लोगों को दिखेगा लेकिन उस व्यक्ति के मन में खाने का भयंकर राग है या वैराग्य है, वह लोगों को नहीं दिखेगा।
5. अब हमारे में क्रिया धर्म होगा तो लोग तो वह देखकर हमको धार्मिक मानेंगे यानी कि प्रभुभक्त-दानवीर-वैरागी आदि अच्छे विशेषण हमारे लिए Use करेंगे लेकिन उन लोगों ने हमारे लिए साक्षी दे दी, गवाही दे दी, हमको धार्मिक बोल दिया..
इससे हम धार्मिक नहीं हो जाते हैं।
क्योंकि धार्मिक होने में और धार्मिक दिखने में ज़मीन आसमान का फर्क है। धार्मिक होना या नहीं होना यह तो भाव धर्म के आधार पर ही Fix होता है, क्रिया धर्म के आधार पर नहीं।
इसलिए लोगों की साक्षी के आधार पर हमे खुद को धार्मिक या धर्मी नहीं मानना है।
कोई हमें कितना भी अच्छा क्यों ना बोले, हमें उस Basis पर हमारी आत्मा को अच्छी मानने की भूल नहीं करनी है, Ego नहीं करना है। क्योंकि लोगों ने सिर्फ क्रिया को देखकर ही यह कहा है और क्रिया धर्म Destination नहीं है.. क्रिया धर्म तो भाव धर्म तक पहुँचने का माध्यम है।
किसी को Train के माध्यम से Chennai to Mumbai जाना है तो उस व्यक्ति के लिए Destination Mumbai है और Train माध्यम है।
उस व्यक्ति को मुंबई जाना है तो Train में बैठना ही पड़ेगा लेकिन सिर्फ Train में बैठने से वह ऐसा नहीं सोच सकता कि हाश मेरा काम हो गया मैं मुंबई पहुँच गया.. नहीं।
उसे यह ध्यान में रखना है कि Train में बैठना 1st Step है.. और मुंबई पहुंचना उसका Goal है मुंबई Destination है।
तो प्रभु पूजा वह Train है और प्रभु के प्रति समर्पण भाव वह Goal है..
प्रभु के प्रति समर्पण भाव वह Destination है। सिर्फ पूजा करके अगर व्यक्ति Satisfied हो जाएगा कि हाँ मेरा काम तो हो गया मैं Destination तक पहुँच गया और अगर भाव में बदलाव नहीं करेगा तो इसका मतलब Journey अभी पूरी नहीं हुई है।
6. तो हम कैसे Decide करें कि ‘मेरे पास सच्चा धर्म है या नहीं?’
उसका सीधा रास्ता यह है कि हमारे भाव कैसे हैं, वह तो हम जानते ही है। तो हमको हमारी आत्मा को पूछना है कि ‘हे आत्मा, तू बोल कि मेरे भाव कैसे हैं?’
अगर हमारी आत्मा हमको जवाब देगी ‘तेरा भाव अच्छा है..’ तो खुद की आत्मा की साक्षी से हम मान सकते हैं कि ‘मैं सच्चा धार्मिक हूँ।’ अगर हमारी आत्मा कहे कि ‘तेरा भाव तो खराब था..’ तो हमको समझ लेना कि ‘मैं सच्चा धार्मिक नहीं हूं, मुझे तो अभी भी बहुत मेहनत करनी है।’
मैं गरीबों को-साधर्मिक को दान देता हूं, लेकिन अंदर लोगों को दिखाने का भाव हो, यश-कीर्ति पाने का भाव हो, तो मुझे समझ जाना है कि ‘मैं सच्चा दानधर्मी नहीं हूं। भले दुनिया मुझे भामाशा क्यों ना कहे।
मैं परस्त्री के परिचय आदि में नहीं हूं लेकिन मेरे मन में विकार-वासना के गंदे गंदे विचार चलते ही रहते हैं, तो मुझे समझ जाना कि मेरे पास अभी तक सच्चा ब्रह्मचर्य नहीं है। भले दुनिया मुझे शीलवंत-सदाचारी स्थूलभद्रजी का अवतार क्यों ना कहे।
मैं आयंबिल की ओली आदि सब करता हूं लेकिन मेरे खाने की लालसा तीव्र हो पारणे का मैं Wait करूँ तो मुझे समझ जाना है कि मेरे पास सच्चा तप धर्म नहीं है। भले दुनिया मुझे बड़ा तपस्वी क्यों ना बोले..
बाहर क्या दिख रहा है उस आधार पर नहीं बल्कि भीतर क्या चल रहा है उस आधार पर हमें निर्णय करना है कि हमारे पास सच्चा धर्म है या नहीं।
लोग क्या कहते हैं That doesn’t matter.. खुद की आत्मा क्या कहती है.. That actually matters..
7. हम तो इतने Time से क्रिया ही करते आ रहे हैं भाव का तो ज्यादा सोचा ही नहीं अब क्या करें पूजा वगैरह छोड़ दे? क्योंकि इतने Time से पूजा वगैरह करते आ रहे हैं कोई भाव तो जगा नहीं है।
ना ना.. इसी को कहते हैं अर्थ का अनर्थ करना.. ऐसा बिलकुल नहीं करना है..
Train में बैठा हुआ व्यक्ति अगर सही दिशा में जा रहा है तो आज नहीं तो कल पहुंचेगा। सच्ची समझ और सही दिशा में जाएंगे तो Destination तक अवश्य पहुँच पाएंगे।
Train से उतर जाने की बात नादान व्यक्ति करता है, ऐसी गलती हमें नहीं करनी है। क्रिया धर्म का पालन तो करना ही है, पूजा वगैरह क्रिया धर्म का पालन तो करना ही है लेकिन प्रश्न है कि कैसे पालना है?
उसमें से हमारे मलिन भावों को निकालकर और अच्छे भावों को जोड़कर पालना है।
इसमें दो Benefits है :
A. लोग हमारा क्रियाधर्म देखकर अनुमोदना करेंगे तो लोगों में ‘अनुमोदना’ नाम का भाव धर्म आएगा तो उनका कल्याण होगा ही। लेकिन हाँ उस अनुमोदना का भूखा नहीं होना है।
B. हम हमारे भाव धर्म से हमारी आत्मा का हित कर पाएंगे।
कितना सुंदर रास्ता दिखाया है ना भगवान ने…
हम भगवान की पूजा करते हैं तो हमें हमारी आत्मा को समझाना है कि ‘तू धन की लालसा से ही जिनपूजा करेगा तो आत्मा का सुख तुझे नहीं मिलेगा। इसलिए तू लालसा को छोड़कर भगवान के प्रति अहोभाव-पूज्यभाव-समर्पणभाव को धारण कर तो ही आत्म सुख मिलेगा।’
हमें हमारी आत्मा को समझाना है कि ‘तू अंदर की वासना कम कर और ख़त्म कर एवं निर्विकार भाव को धारण कर तो ही तू शील पालन के द्वारा आत्म सुख पाएगा।’
मुझे खुद को समझाना है कि ‘तू खाने की आसक्ति खत्म कर, Taste का पागलपन छोड़.. तो ही तू तप के द्वारा आत्म सुख पायेगा।’
मुझे खुद को समझाना है कि ‘तू क्रोध निकाल दे, क्षमा भाव-समता भाव रख.. तो ही तू सामायिक के द्वारा आत्म सुख पायेगा।’
ये सारे उद्देश्य, संकल्प मन में रखकर, घोंटकर क्रिया धर्म का पालन करना है तो अवश्य भाव धर्म तक पहुंचेंगे।
मान लो जिनालय में 10 परमात्मा की प्रतिमा है और सबकी पूजा करनी है। सब अगर फटाफट करेंगे तो उद्देश्य एवं संकल्प दिमाग में आएगा ही नहीं और बस जैसे तैसे भागमभाग में पूजा होगी।
लेकिन इसी Situation में 9 भगवान की पूजा जैसे करते हैं वैसे कर ली लेकिन कोई भी एक भगवान की पूजा शांति से उद्देश्य संकल्प को मन में रखकर, मुख से मौन लेकिन मन से भगवान के साथ बात करते करते अपने दोष व्यक्त करते करते वह एक भगवान की पूजा करेंगे तो पक्का आत्मा में भाव धर्म जागेगा। एक बार Try करके देख सकते हैं।
Problem यह है कि हम भागमभाग में लगे हुए हैं और खुद की आत्मा से बात ही नहीं कर रहे हैं खुद के लिए Time ही नहीं है हम जो भी क्रिया धर्म करें उसमें से हमें खराब भावों को दूर करना है और भाव धर्म को जोड़ देना है, टिकाना है और बढ़ाना है। तो वह क्रिया धर्म आत्म सुख देगी ही।
संपूर्ण गाथा का सार
1. लोग क्रिया धर्म देखकर प्रशंसा करेंगे, धार्मिक कहेंगे। हमें उस चीज पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देना है।
2. आत्मा को पूछना है कि ‘तेरे भाव कैसे हैं?’ अगर आत्मा के भाव खराब है तो समझ लेना कि ‘अभी तक हम धार्मिक नहीं है।’ अगर आत्मा के भाव अच्छे हो तो समझ लेना कि ‘हम धार्मिक है।’
3. कोई भी क्रिया धर्म में खराब भाव को निकाल के शुभ भावों को जोड़ना है। इससे आत्म सुख और परंपरा से मोक्ष सुख अवश्य मिलेगा।
एक बात पर हम सभी को बराबर ध्यान देना चाहिए कि एक झटके में 100% अशुभभाव निकल जाए और 100% शुभभाव आ जाए, ऐसा Normally नहीं होता है।
पहले 100% अशुभभाव थे और 0% शुभभाव थे। फिर सुगुरु आदि के संपर्क के कारण से 95% अशुभभाव हुए और 5% शुभभाव आए। धीरे-धीरे आत्मा मेहनत करती है तो अशुभभाव 90-80-70-60-50-40-30-20-10% होते हैं और दूसरी ओर शुभभाव 10-20-30-40-50-60-70-80-90% हो जाते हैं।
यहां तक 100% भावधर्म नहीं है बल्कि धर्म + अधर्म Mix है। धर्म की मात्रा बढ़ती जाती है और अधर्म की मात्रा घटती जाती है। फिर एक ऐसा दिन आता है कि 100% भाव धर्म होता है और 0% अशुभभाव होता है। बस उसके बाद मोक्ष Fix है।
जब तक 100% अशुभभाव है तब तक मोक्ष की साधना भी Start नहीं हुई। जब 5% शुभभाव आए तब से मोक्ष की साधना Start हुई।
95% तक मोक्ष की साधना है और जब 100% शुभभाव आए तब मोक्ष की साधना संपूर्ण हुई। बस, उसके बाद आयुष्य पूरा होते ही मोक्ष मिलता है।
इसलिए हमारे पास अभी तो Mix धर्म ही रहेगा, बस हमारा कर्तव्य इतना है कि भाव धर्म की मात्रा बढाते-बढाते ही जाना है।
प्रश्न उठ सकता है कि कर्म का बंधन किस प्रकार से होता है? क्रिया धर्म के आधार पर या भाव धर्म के आधार पर?
जानेंगे अगले Episode में…


