कौन साधु कौन धोबी?
प्रस्तुत है Friend or Foe Book का Episode 20
एक साधु पर देव बहुत खुश हुआ था. एक दिन की बात है, नदी के किनारे पर धोबी ने कपडे सूखा रखे थे और साधु का उन पर पाँव आ गया. यह धोबी थोडा विचित्र था, दो काम में Expert था, मुंह से गाली बोलने में और हाथ से मारपीट करने में, कपडे धोने की आदत जो थी.
धोबी ने वह साधु को गालियाँ बोलनी शुरू कर दी. साधु भी भूल गए कि वे तो साधु है, उन्हें भी गुस्सा आया और उन्होंने भी दे धना धन-डिशुम-डिशुम शुरू कर दिया और आखिरकार Match Draw हुआ. दोनों अलग हुए.
बेचारे साधु का भी बहुत बुरा हाल हुआ, खूब चोट आई. देव प्रगट हुआ और साधु ने Complaint की ‘अब तक कहाँ गायब थे? खास जरुरत थी तुम्हारी, तब तुमने सहाय नहीं की. कितना याद किया मैंने तुम्हें.’
तब देव ने कहा ‘अरे बाबाजी, मैं तो तुरंत आ गया था लेकिन क्रोध नाम का राक्षस एवं पागलपन आप दोनों पर सवार था, आप दोनों एक दूसरे से कैसे लड़ रहे थे वो तो देखने वाला ही जाने? आप दोनों में धोबी कौन और साधु कौन? मैं पहचान ही नहीं पाया, तो फिर मैं मदद किसकी करता आप ही बताइए?’
पूज्य श्री कहते हैं कि साधु ने Attack किया, प्रहार किया, प्रतिकार किया तो देव द्वारा जो Security था, संरक्षण था, वह खोया. तो फिर पतितपावन श्री जिनशासन का संरक्षण कैसे मिलेगा? क्या वह छूट नहीं जाएगा?
जिस व्यक्ति की सहन करने की तैयारी नहीं, उसका नंबर शासन में नहीं लगता. उसे वहाँ प्रवेश नहीं मिलता. प्रभु दरबार के बाहर ही उसे बैठे रहना पडता है.
एक काल्पनिक कहानी
एक श्रावक परमात्मा के मंदिर में प्रवेश कर ही रहे थे कि पीछे से किसी ने टेर लगाई ‘रुक जाओ.’ देखा पीछे कोई नहीं था. वापस अंदर प्रवेश करने गए वापिस आवाज़ आई ‘रुक जाओ, पहले मेरी फरियाद सुन लो.’
खूब गौर से इधर-उधर नजर घुमाई, कोई नहीं दिखा तो वापस पैर उठाए तब फिर से आवाज़ आई ‘अरे! खडे रहो भाई. मेरे साथ हो रहे भयंकर अन्याय को रोको.’ वह श्रावक हैरान हो गया था.
जरा ध्यान से देखा, कमर से झुककर ताका तब पता चला कि यह तो वे ही जूते बोल रहे थे, जिन्हें वह बाहर उतार आया था. श्रावक हक्का-बक्का रह गया ‘जूते बोल रहे थे? कमाल है, खैर, बोलो भाई! तुम्हें काहे का अन्याय हो रहा है?’
जूते बोल उठे-‘आप मुझे बाहर उतार देते हैं, प्रभु के दरबार में लेकर नहीं जाते और मेरे ही जाति भाई यानी ढोल-ढोलक-नगाड़े-खंजरी आदि जो Same Material से ही बने हुए हैं, उन्हें आप अंदर ले जाते हैं, कितना घोर अन्याय! आप ही कहो हमारा क्या कसूर?’
क्षण भर के लिए वह श्रावक उलझन में फँस गया. फिर उसने कहा ‘अच्छा चलो, तुम्हें मैं परमात्मा के मंदिर में ले चलता हूँ लेकिन एक शर्त पर कि तुम पहले द्वार पर खड़े रहकर अंदर झाँक कर अपना निर्णय ले लेना. सचमुच तुम्हें अंदर जाना हैं या नहीं?’
संजोगवशात् उसी वक्त मंदिर में संध्याकालीन आरती चल रही थी. इसलिए जैसे ही जूतों ने अपनी नजर डाली तुरंत ही निर्णय ले लिया कि ‘नहीं बाबा, हमें अंदर आना नहीं हैं.’
श्रावक ने Reason पूछा तो उन्होंने कहा कि ‘देखो न! हमारे ही जातिभाईयों को कितनी मार पड़ रही हैं. इन नगाड़ों पर लकड़ी से कितनी जोरदार चोट की जा रही है, इस ढोलक पर हथेली से प्रहार किया जा रहा है और खंजरी पर बेकसूर थपेटें पड़ रही हैं. हमें तो बाबा ऐसा कुछ सहना नहीं है.’
जूते सहन करने को तैयार नहीं थे इसलिए उन्हे परमात्मा के दरबार में प्रवेश नहीं मिला.
पूज्य श्री कहते हैं कि प्रभु के दरबार में प्रवेश करना है? टिकना है? टिककर आगे बढ़ना है? तो एक अटल-अड़िग निश्चय करो कि जब जहाँ, जिस किसी की भी ओर से जितना और जैसा भी सहन करने का आए, उसे सहन करो. बिलकुल आकुल-व्याकुलता नहीं, क्रोध नहीं, प्रहार नहीं.
‘उसकी दो कोडी की भी कीमत नहीं है और मुझे तंग करता है? मैं उसका क्यों सहन करूँ?’ ऐसा नहीं सोचना है. ऐसी प्रतिशोध की, Revenge की भावना मन में उठनी ही नहीं चाहिए और यदि उठती भी हो तो परमात्मा श्रमण भगवान महावीर को नजर में लाओ.
प्रभु के बल के विषय में श्री सूयगडांग सूत्र में कहा गया है कि इस संपूर्ण चौदह राजलोक को उठाकर अलोक में फूटबोल की तरह फेंक दे, इतनी ताकत होती है परमात्मा में. तो भी समता के समंदर ऐसे परमात्मा ने कैसे-कैसों का कितना-कितना कैसा कैसा सहन किया?
उन्हीं प्रभु के शासन में हमें बने रहना हैं तो परमात्मा के द्वारा दिया गया सूत्र अपनाना ही पडेगा- ‘अणुसोयो संसारो पडिसोयो तस्स उत्तारो.’
पूज्य श्री कहते हैं कि बस, सब कुछ हमारे मनमुताबिक ही यानी अनुकूल चाहिए, कोई भी प्रतिकूल नहीं. जिससे कुछ भी सहना नहीं पडे, ऐसा Mental State ही तो संसार है और उससे Opposite ही तो मोक्ष है. अतः जो कुछ भी प्रतिकूल आए, आने दो, उसका Welcome करो.
उसका भावपूर्ण हाँ मानो. बैंड बाजे के साथ स्वागत कर रहे हो, पूरा स्वागत करो क्योंकि प्रतिकूलताओं को गले लगाने की यही मनःस्थिति संसारसमुद्र से पार उतारनेवाली है, अमोघ उपाय है और यही जिनशासन है.
सहन करना वैसे भी बड़ा ही हिम्मत वाला कार्य है क्योंकि विश्वविजय से भी बड़ा कार्य आत्मविजय ‘जो अप्पाणं जिणई सो परमप्पा.’ जो अपने आप को जीतता है वह परमात्मा है.
फिर भी इस कार्य को सहज-सरल बनाया जा सकता है, जरुरत मात्र है सत्त्व-लगन-धैर्य और स्थैर्य (Stability) की. उसमें भी कभी हम परेशान होकर प्रहार कर बैठने के पाप से कहीं अटक न हो जाए इसलिए इस प्रकार की विचारधाराओं का सिलसिला मन में जगाना यह एक श्रेष्ठ उपाय है. यह विचारधरा मन में चलेगी तो हम खुद को Control कर पाएंगे.
मैं प्रहार करने बैठूंगा तो वह कर्मसत्ता की Court का अपराध गिना जाएगा क्योंकि उसके काम करने के Process में यह एक प्रकार का Interference है जिसे वह बिलकुल भी सहन नहीं करती और फिर वह कठोर में कठोर सजा दे सकती हैं.
बस, यह सज़ा की बात दिमाग में चलती रहेगी तो आदमी पाप से अटक सकता है, उसके लिए मोक्षमार्ग बिलकुल सरल बन जाता है.
कहा भी है ‘आयंकदंसी न करेइ पावं’ यानी जो आतंक को, अपाय को देखता है, वह पाप नहीं करता. बात भी ठीक है, आतंकवादियों की जहाँ Gun-Rifles आदि तनी हुई रहती है, Hand Grenades की हर पल थर्रा देनेवाली आवाजें सुनाई दे रही हो, वैसे समाचार सच्चे या झूठे, कैसे भी मिलें तो भी आदमी वहाँ पाँव रखने की हिम्मत नहीं करता.
आतंक-अपाय आँखों के सामने घूमता है न?
वैसे ही कर्मसत्ता की सजा आँखों के सामने रखने से प्रतिकार करने की हमारी आदत धीरे धीरे कम हो होकर रुक सकती है.
एक ऐसी Reality है जिसे जानने के बाद कई लोगों की Life Change हुई है.
वह Reality जाननी हो तो अगला Episode देखना होगा.