हम शेर जैसे हैं या कुत्ते जैसे?
एक ऐसी Reality जिसे जानने के बाद कईयों की Life Change हुई है.
प्रस्तुत है Friend or Foe Book का Episode 21
वास्तविक शत्रु : कर्म
2 Scenes Imagine करने होंगे.
पहला Scene
बड़ा जंगल, घनी झाड़ियाँ और केसरी सिंह-Lion, जिसे शेर भी कहते हैं. जंगल का King, यह शेर-बिना कोई डर के बिंदास बैठा था कि तेज़ रफ़्तार से एक तीर आया और घुसा शेर की कमर में और जंगल के इस King को भयानक गुस्सा आ गया.
गर्जना करके ठीक उसी दिशा में छलांग लगाई जिस ओर से तीर आया था, यह है सिंहदृष्टि. तीर की परवाह न करके तीर मारनेवाले को पकड़ना.
दूसरा Scene
अंधेर रात, रोड पर कुछ कुत्ते मिलकर भौंक रहे थे. एक आदमी परेशान हुआ और थोड़ी दूर जाकर उसने पत्थर मारा. पत्थर से मारनेवाला कोई व्यक्ति था, यह विचार करने जैसा था. लेकिन कुत्ता उस पत्थर को अपने पाँव में पकड़कर अपने जबड़ों में चबाता है.
उसके जबड़ों से खून निकलता है पर वह सोचता है ‘हाश. मार ली बाजी, शत्रुरूप जो पत्थर है उसका यह खून निकल रहा है.’ वह उसे आनंद से चूसता जाता है. यह देखकर हँसना या रोना पता नहीं लेकिन यह है श्वानवृत्ति.
सिंह Smart है, वह समझता है कि तीर का क्या गुनाह? गुनाह तो तीर फेंकनेवाले का है. तीर बेचारा क्या कष्ट देगा, कष्ट देनेवाला कोई और है और उसी को सजा मिलनी चाहिए. अब तीर को काटना या नाख़ून से मारना, यह तो खुद को दुखी करने की बात हुई.
कुत्ता Smart नहीं है इसलिए वह तो पत्थर को अपराधी मान लेता है, और पत्थर से लड़ने की कोशिश करता है और खुद परेशान होता है. कुत्ते की मूर्खता पर तो दया आ जाए. ऐसा कह सकते हैं कि शेर Root Cause पर, मूल पर, जड़ पर Focus करता है, लेकिन कुत्ता ऐसा नहीं करता.
विचक्षण (Clever) जीव कौन?
हम जीवों में भी वही जीव विचक्षण है जो अपने दुखों के Root Cause को खोजे. तिरस्कार, अपमान आदि करना हो तो उसका करें लेकिन जो बिचौलिया है, निमित्त है उसका नहीं करना है.
किसी ने गाली दी, किसी ने अपमान किया, किसी ने चोरी की, नुकसान किया आदि हर एक प्रकार की तकलीफ देनेवाला तो बिचारा सिर्फ निमित्त है, बिचौलिया है, Middlemen है. Root Cause तो जीव के कर्म ही है.
तिरस्कार करना हो तो उसका करे परंतु जो बिचौलिया हो, निमित्त हो, माध्यम हो, Middleman हो उसका नहीं. किसीने गाली दी, किसीने मान भंग किया, किसी ने चोरी की या बलजबरन् हमारी चीज़ हथिया ली इत्यादि हरेक प्रकार के कष्ट-त्रास में त्रास-तकलीफ देनेवाला तो बिचारा मात्र हाथा ही बना है.
मूल त्रास देनेवाला तो कर्म ही है. Tree को काटने में Axe का Handle तो निमित्त है, काटने वाली तो लोहे की Sharp Object होती है. जो जीव Smart बनकर Root Cause पर यानी अपने ही कर्मों पर Focus करता है, और उस पर लाल आँख करके उसे Solve करता है, वह अपनी परेशानियों से, तकलीफों से दूर हो सकता है.
लेकिन जो जीव मूढ़ बनकर, श्वानवृत्ति को अपनाता है अर्थात् तकलीफ देनेवाले व्यक्ति की ओर लाल आँख करता है, उसी को पीड़ा देनेवाला मानकर सामने गाली देता है, या तकलीफ देनेवाले के खिलाफ जाकर लड़ने की कोशश करता है तो यह सब उस कुत्ते के द्वारा मार पड़ने के बाद पत्थर को मुँह में चबाने जैसा कार्य है, जिससे तकलीफ तो दूर नहीं होती लेकिन तकलीफ बढ़ने ज़रूर लगती है.
जो तकलीफ देता है वह व्यक्ति के खिलाफ क्रोध, द्वेष, संकेल्श आदि के कारण Mental Peace Disturb होता है, और Anger, द्वेष के कारण शरीर भी Disturb होता है, यह सब Bonus अलग. सिंहवृत्तिवाला जीव इस द्वेष, संक्लेश आदि Problems से दूर ही रहता है इसलिए Mental Peace आदि Disturb नहीं होता है.
राम और सीता
रामचंद्रजी ने आज्ञा दी. आज्ञाकारी सेनाधिपति कृतांतवदन अपना फ़र्ज़ पूरा करने के लिए महासती सीताजी के चरणों में पहुंचा और तीर्थयात्रा का बहाना दिया. महासती सीता गर्भवती थी परंतु तीर्थयात्रा के लालच और पतिदेव श्री राम की आज्ञा से वह रथारूढ हुई.
भीषण जंगल आया, बब्बर शेरों की गर्जनाएं सुनाई देने लगी. ऐसे वन में सीताजी को अकेली छोड़ आने का रामचंद्रजी का आदेश था. कृतांतवदन सारथि नीचे उतरा लेकिन वह बोल नहीं पा रहा था, आँखों से ज़ोरदार आंसू बह रहे थे.
आखिर सब कुछ कहना पड़ा मगर उसका रोना रुका नहीं. तब भी सीताजी स्वस्थ थी ‘अरे भाई. तुम क्यों दुःखी हो रहे हो? तुम थोड़े ही मुझे इस जंगल में छोड़ रहे हो. तुम तो चिट्ठी के चाकर हो. इसमें तुम्हारा थोडा सा भी दोष नहीं है.
तुम्हें तो अपने स्वामी की आज्ञा पालनी ही चाहिए और तुम्हारे स्वामी का भी इसमें क्या दोष? उन्हें लोगों पर राज्य करना है. अतः लोगों को संतोष हो वैसा करना चाहिए और लोगों का भी क्या दोष? मेरे पूर्वभव के कर्म ही कोई ऐसे होंगे जो उदय में आए हैं.’
Get The Real Culprit.
सही गुनेहगार को पकड़ने की महासतीजी की यह चिंतनधारा कितनी उत्तम है.
यह तत्त्वज्ञता है. सीताजी ने Root Cause का, मूल बात का पता लगाया तो Problems आने पर भी Disturb नहीं हुई, वे स्वस्थ थी. सेनापति जो जंगल में छोड़ने आया उसके ऊपर मन में भी गुस्सा या अप्रीति भाव नहीं आया. उल्टा सेनापति को आश्वासन दे रही थी.
रामचंद्रजी के प्रति भी जैसा पहले था वैसे ही अभी भी प्रेम भाव हैं. द्वेष, क्रोध, आक्रोश या तीखी बात नहीं बल्कि शुभसंदेश भिजवाती है कि स्वामी, लोगों की बातों से आपने भले मेरा त्याग किया, मुझसे भी सवाई स्त्री आपको मिल जाएगी, मेरे त्याग से आपके आत्महित में कोई Problem आएगी ऐसा कोई नियम नहीं है लेकिन पतिदेव, मेरी आप से हाथ जोड़कर नम्र विनंती है कि या कल उठकर लोग सम्यग् धर्म की भी निंदा करने लगेंगे तो लोगों के कहने से जिस तरह आपने मेरा त्याग किया वैसे धर्म का त्याग नहीं करना, क्योंकि ऐसा किया तो महा नुकसान हो जाएगा. इतना आप इस दासी की ओर से याद रखना.
मूल को देखो
महासती सीताजी ऐसा कह सकती थी कि ‘यह कैसा न्याय? सिर्फ एक Side की बात को सुनकर सजा सुना दी. मुझे भी पूछ लेते. मेरी भी बात सुन लेते. अरे! एक सामान्य इंसान भी गर्भवती स्त्री को नहीं छोड़ता. अरे, छोड़ भी दे तो उसके पीहर में छोड़ता है, भयानक जंगल में नहीं.
परंतु आप तो बड़े राजा रहे न. अतः जो मन में आया वैसा सब कुछ कर सकते हैं.’ ऐसी कोई भी तीखी बात सीताजी ने नहीं कही. उल्टा दिया शुभ संदेश. इस Calmness पर सीताजी कैसे टिक सकी? जो ‘अन्याय’ के बारे में सोचता है, जो ऐसा सोचता है कि मेरे साथ अन्याय हो रहा है, वह व्यक्ति का दुर्भाव और द्वेष से बचना बहुत मुश्किल है.
Root Cause में, मूल में देखनेवाले के लिए कैसी भी Situation में Calm रहना Possible है.
सीताजी की विचारधरा यह थी कि ‘मात्र सेनापति या रामचंद्रजी ही नहीं. ये लोग जिन्होंने मेरे बारे में बातें की वे भी दुःख देने में सिर्फ माध्यम है. मूल तो मेरे कर्म ही हैं.’ इस सोच के कारण ही सीता जी द्वेष से, क्रोध से, क्लेश से बच पाई.
जो सामने अपराधी लग रहा है, वह तो अपराधी है ही नहीं वह तो बेचारा कर्मसत्ता की अदालत के आदेशों को पालन करनेवाला सिर्फ एक कर्मचारी है. इस Concept को और सरलता से समझना हो तो Jailer Series ज़रूर देखिएगा बहुत कुछ Clear हो जाएगा.
कोई Citizen जब कोई Crime करता है तो Court उसे सजा देती है. जो भी सजा होती है उसके अनुसार उस Jail के Jailer, सिपाही आदि अपना फ़र्ज़, Duty मानकर उसे निभाते हैं. कैदी को Jail में डाल देते हैं. सजा के अनुसार सख्त मजदूरी करवाते हैं.
Hunter के सौ-पचास फटके लगाते हैं. सजा के अनुसार फांसी पर भी चढ़ा देते हैं. उस वक्त कैदी यह नहीं सोचता कि कमाल है, मैंने इस Jailer का क्या बिगाड़ा है जो मुझे इतनी तकलीफ दे रहा है, मैं तो अब कोई मेहनत नहीं करूँगा, मार नहीं खाऊंगा, वह मुझे मारेगा, तो मैं भी उसे मारूंगा’ ऐसा कैदी नहीं सोचता है.
क्योंकि कैदी को Jailer वैरी अथवा शत्रु नहीं दिखता है, क्योंकि वह जानता है कि यह तो Court का कर्मचारी है, चिट्ठी का चाकर है, Court ने जो उसे आज्ञा दी है वह ही तो Jailer करवा रहा है इसलिए इसके साथ मुझे शत्रुता क्यों बांधनी?
Catch The Real One.
हमें ऐसा ही सोचना है कि हमारे आस पास रह रहे लोग, परेशान करनेवाले लोग भी कर्मसत्ता के कर्मचारी है. कर्मसत्ता ने हमारे लिए जो सजा तय की है, वैसी वैसी सजा यह जीव मुझे देते रहते हैं.
कर्मसत्ता नमक Court ने किसी कर्मचारी को, यानी हमारे आस-पास के जीव को कहा कि जा X को गाली दे क्योंकि X के कर्मों की यह सजा है” इस आज्ञा का पालन कर वह X को गाली देता है. यही बात अपमान, निंदा आदि सब में समझना है.
किसी को आलाहाईकमान कर्मसत्ता हुक्म करती है कि ‘उस जीव पर चोरी का झूठा आरोप लगाओ.’ Order is Order. वह जीव मेरे ऊपर चोरी का इल्जाम लगा जाता है. किसी को कहा ‘लकड़ी से प्रहार करो.’ तो वह लकड़ी उठा लाता है.
इसी तरह धन की चोरी, काम का बिगड़ना, व्यापार में विश्वासघात, ईर्ष्या आदि जो भी परेशानियाँ आती हैं, वह सब कुछ कर्मसत्ता की अदालत की ही सज़ा है. देनेवाला व्यक्ति आदि तो सिर्फ माध्यम है.
एक नियम हमें अपने दिल और दिमाग की Diary में लिखकर रख लेना चाहिए कि ‘जिस सजा को कर्मसत्ता की अदालत नहीं फटकारती है ऐसी कोई भी सजा इस दुनिया का Powerful से Powerful व्यक्ति हो या Champion कहलानेवाला Heavyweight Boxer भी हो, कोई भी हो वह हमें सजा या तकलीफ नहीं दे सकता है.
उसकी संपूर्ण शक्ति कर्मसत्ता के ईशारे पर ही नाच सकती है.’ अरे, जान से खत्म करने की बात तो दूर, एक चांटा भी कोई लगा नहीं सकता. अर्थात् छोटी से छोटी हो या बड़ी से बड़ी, कर्मसत्ता ने जो सज़ा फरमाई वह पत्थर की लकीर हो गई, हमें मिलेगी ही.
इतना ही नहीं, जिस सज़ा को कर्म ने फटकार दी, उसे Change करने की ताकत भी किसी में नहीं है. लाख भागने की कोशिश हम करें, बचने का जीतोड़ उपाय करे, लेकिन सफलता नहीं मिलनेवाली. सजा होकर ही रहेगी.
अगर वो बच जाए तो ऐसा समझना है कि सजा फटकारी ही नहीं थी और कितनी भी Safety के बाद भी तकलीफ आई, परेशानी आई तो Clear है कि सजा फटकारी थी और इसलिए तकलीफ आई है.
भविष्य में क्या लिखा है?
जनकपुत्री के कारण दशरथनंदन के हाथों से रावण की मृत्यु होगी.
इस भविष्यवाणी को सुनकर भाई के प्रति प्रेम होने से विभीषण क्रोधित हुआ और जनक एवं दशरथ को मौत की नींद सुलाने के संकल्प से निकल पड़ा. त्रिखंडाधिपति प्रतिवासुदेव रावण के पीठबलवाले विभीषण को Defend करने की ताकत दशरथ या जनक, दोनों में से किसी में भी नहीं थी.
उन दोनों की विभीषण की ताकत के सामने कोई औकात ही नहीं थी? फिर भी इतिहास इस बात की साक्षी है कि विभीषण दोनों को मौत के घाट सुला नहीं सका.
कारण क्या? अरे! जब तक कर्मसत्ता उस सज़ा को नहीं फटकारती तब तक मजाल है किसीकी कि वह सजा दे दे. ग्रन्थों में ऐसे तो सैंकड़ों दृष्टांत मिल जाएँगे.
हमने तो काफी समय पहले Jailer Series देखी थी उसमें भी अनेकों ऐसे दृष्टांत मिल जाएंगे. हम Recommend करेंगे एक बार वो Series Family के साथ बैठकर देखने जैसी है.
‘फलाना-फलाना लड़का मुझे मारनेवाला है या मेरे बाद मेरे राज सिंहासन पर बैठनेवाला है.’ इस सत्य को जानकर राजा जैसे राजा भी जिस बालक को मारने की काफी Try करता है. फिर भी वह बालक जो एक छोटे से पत्थर को भी Defend नहीं कर सकता, वह भी सही सलामत बच निकलता है.
अरे. जिस व्यक्ति ने 100-200 क्रूर हत्याएँ कर डाली हो, मानव को मारना जिसके लिए बाए हाथ का खेल हो, वैसे निर्दयी व्यक्ति जल्लाद को यह बालक सौंप दिया जाए और राजा द्वारा Order भी दे दिया जाए कि इसे ख़त्म कर दो लेकिन कर्मसत्ता की अदालत ने उस मासूम बच्चे को मौत की सज़ा फटकारी नही तो मज़ाल है कि कोई उसका बाल बाँका कर सके.
जल्लाद के दिल में सामान्य तौर पर दया भाव नहीं होते, वह तो भक्षक कहा जाता है, वह खुद अपनी खुद की जान की भी परवाह न करके इस बालक का रक्षक बन जाता है. यह Story है अघट कुमार की जो हमने Jailer Series के 9th Episode में देखी थी. इस Episode को देखकर कई लोगों को मन की शांति मिली है एक बार यह Episode देखने जैसा है.
कर्मसत्ता की आज्ञा नहीं हो तो भक्षक भी रक्षक बन जाता है और कर्मसत्ता ने सजा दी हो तो रक्षक भी भक्षक बन सकता है.
अपने नीजी अंगरक्षकों ने ही तो श्रीमती इंदिरा गाँधी को आवास स्थान पर गोली से दागा था. जबकि राजीव गांधी पर राजघाट जैसे Public Place पर लगभग 2 October 1986 के दिन ढेर सारी गोलियां छोड़ी गई, फिर भी उनका बाल भी बांका नहीं हुआ. क्योंकि राजीव गाँधी को वहां मारने की इच्छा आतंकवादी की थी, कर्मसत्ता की नहीं.
बात एक दम Clear है.
कर्म नाराज़ तो दुनिया नाराज़
कर्म खुश तो दुनिया खुश.
दुःख सहन करना चाहिए लेकिन कब तक?
सामनेवाला परेशान करता ही रहे तो क्या करना?
जानेंगे अगले Episode में.