महासती दमयंती की दिल दहला देनेवाली कथा…
कभी राजमहल की रानी, तो कभी जंगल की तपस्विनी। एक राजकुमारी जिसने वैभव भी देखा और 12 वर्षों का कठोर तप भी सहा.. आखिर क्यों दुनिया उन्हें कहती है ‘महासती’?
आइए जानते हैं, भरहेसर सज्झाय की महासती दमयंती की अद्भुत और रोचक कथा का Episode 01.. बने रहिए इस Article के अंत तक।
स्वयंवर
भारत देश के कोशला नगर में निषध नामक राजा न्याय और नीति से राज करते थे। उनकी रानी का नाम सुंदरा था, जो बहुत ही गुणवान और शीलवती स्त्री थी। दूसरी ओर, कुंडिनपुर नगर में महाराजा भीम का राज था। उनकी रानी का नाम पुष्पदंती था।
एक शुभ दिन, एक ही देवलोक से दो देवताओं का एक साथ च्यवन हुआ यानी एक साथ एक-एक गर्भ में आना हुआ। एक देव रानी सुंदरा के गर्भ में आए और दुसरे देव रानी पुष्पदंती के गर्भ में आए।
कर्म की गति अजीब होती है ना.. एक जन्म में जो देव मित्र होते हैं, अगले जन्म में वही पति-पत्नी भी हो सकते हैं और एक जन्म में जो आत्मा-पुरुष के रूप में जन्मी हो, वह अगले जन्म में स्त्री के रूप में भी जन्म ले सकती है।
रानी सुंदरा के गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम ‘नल’ रखा गया और रानी पुष्पदंती के गर्भ से एक पुत्री का जन्म हुआ, जिसका नाम ‘दमयंती’ रखा गया। ये दोनों हमारी कथा के मुख्य पात्र हैं..
धीरे-धीरे नल और दमयंती बड़े होने लगे। नल ने पुरुषों के योग्य 72 कलाएँ सीख लीं, और दमयंती ने स्त्रियों के योग्य 64 कलाओं में Expertise हासिल की। जैसे-जैसे दमयंती की उम्र बढ़ी, उसका रूप-सौंदर्य भी बढ़ता गया।
दमयंती के इस अद्भुत रूप और गुणों को देखकर महाराजा भीम को अपनी पुत्री के लिए योग्य जीवनसाथी की चिंता होने लगी। राजकुमारी दमयंती को अपना जीवनसाथी चुनने का हक़ देते हुए महाराजा भीम ने दमयंती के स्वयंवर की योजना बनाई।
यह खबर दूर-दूर के राजा-महाराजा और राजकुमारों तक पहुँच गई। दमयंती की सुंदरता और गुणों की चर्चा सुनकर अनेक राजकुमार उसे पाने के लिए उत्सुक हो गए.. स्वयंवर का दिन तय हो गया और चारों ओर से राजा, महाराजा और राजकुमार आने लगे।
कोशला देश के महाराजा को जब यह समाचार मिले तो उन्होंने अपने पुत्र राजकुमार नल और कुबेर को स्वयंवर में जाने की अनुमति दी। राजकुमार नल और कुबेर स्वयंवर से एक दिन पहले ही कुंडिनपुर पहुँच गए।
स्वयंवर के दिन भव्य मंडप सजा, चारों ओर से राजा और राजकुमार आए। दासी एक-एक करके परिचय देती रही, पर दमयंती आगे बढ़ती रही। जैसे ही वह नल के पास पहुँची, मन में अद्भुत आकर्षण हुआ और तुरंत ही उसने नल के गले में वरमाला डाल दी।
सभी ने हर्षोल्लास से विवाह का उत्सव मनाया…
तेजस्वी तिलक का राज
कुछ समय बाद, राजकुमार नल ने अपनी पत्नी दमयंती के साथ कुंडिनपुर से अपने नगर जाने का निर्णय लिया। विदाई के समय राजा भीम ने अपनी बेटी को हीतशिक्षा दी कि
बेटी! अपने पति के प्रति पूरी तरह समर्पित रहना। सास-ससुर का आदर करना। घर के काम में कभी लापरवाही मत करना। अपने पति के घर को अपना घर ही समझना। हर काम निष्ठा (Dedication) से करना। किसी से झगड़ा मत करना। अगर तू ये गुण अपनाएगी तो दोनों कुलों का मान और गर्व बढेगा।
दमयंती ने अपने पिता की इन बातों को दिल से माना और अपने पति के साथ अपने ससुराल की ओर चल पड़ी। नल, दमयंती को लेकर अपने नगर की ओर जा रहा था, रास्ते में एक जंगल आया। Sunset हो गया था और अंधेरा बढ़ने लगा।
अंधेरे में रास्ता साफ दिखाई नहीं दे रहा था जिसके कारण सब परेशान हो रहे थे।
सभी की परेशानी को दूर करने के लिए दमयंती ने अपने Special Power को Use करने का सोचा और एक कपड़े से अपना माथा पोंछा और अंगराग यानी Makeup से ढके हुए अपने स्वाभाविक यानी जो दमयंती के सर पर Naturally बना हुआ था उस तिलक को चमकाया।
तिलक की रोशनी ने Torch की तरह काम किया और सभी को आगे का रास्ता साफ दिखाई देने लगा।उस रोशनी में नल और दमयंती ने देखा कि पास ही एक साधु भगवंत कायोत्सर्ग मुद्रा में स्थिर खड़े थे।
एक मदमस्त हाथी आकर साधु भगवंत के शरीर से अपनी सूंड रगड़ रहा था और हाथी के मद की गंध से भंवरें साधु भगवंत के शरीर पर बैठकर डंक मार रहे थे लेकिन साधु भगवंत बिना हिले-डुले, शांत भाव से दर्द सहन कर रहे थे।
यह दृश्य देखकर नल और दमयंती वाहन से उतरे और उन्होंने साधु भगवंत को वंदन किया और साधु भगवंत के शरीर से भौंरों को हटाकर उन्हें पीड़ा से मुक्त किया। कायोत्सर्ग पूर्ण करके साधु भगवंत ने राजकुमार नल और महासती दमयंती को धर्मोपदेश दिया।
उस समय नल ने महात्मा से पूछा ‘हे भगवंत! दमयंती ने पिछले जन्म में कौनसा पुण्य किया था, जिससे इसके माथे पर यह अद्भुत प्रकाश वाला तिलक है?’
महात्मा ने बताया कि ‘पिछले एक जन्म में दमयंती ने 500 आयंबिल किए थे और भविष्य में होने वाले श्री शांतिनाथ प्रभु की अद्भुत पूजा की थी। उसी के फल स्वरुप यह तेजस्वी तिलक दमयंती के मस्तक पर है।’
आयंबिल के महत्व पर एक अलग Article हम Already बना चुके हैं, वह पढना न भूलें।
नल और दमयंती ने महात्मा को वापस वंदन किया और कोशला नगरी पहुंचे।
वनवास
कुछ समय के बाद निषध राजा ने नल का राज्याभिषेक किया और कुबेर को युवराज बनाया और राज्य के कार्य से मुक्त होकर निषध राजा ने दीक्षा जीवन स्वीकार किया और उत्तम संयम जीवन का पालन करने लगे।
इस तरफ नल राजा की बढ़ती लोकप्रियता और सफलता देखकर कुबेर के मन में ईर्ष्या भर गई। वह दिन-रात नल की गलतियाँ खोजने लगा।
एक दिन कुबेर ने नल को जुए का निमंत्रण दिया। दमयंती और मंत्रियों ने नल राजा को जुआ खेलने से रोका पर नल ने सोचा ‘यह तो केवल खेल है।’
लेकिन जुआ खेलते-खेलते दाँव लगने लगे.. भाग्य पलट गया और नल सब कुछ हारता गया। अंत में उसने अपना पूरा राज्य, राजमुकुट, राजमहल और यहाँ तक कि दमयंती को भी दाँव पर लगा दिया और सब कुछ हार गया।
दमयंती को खोने से महल में हाहाकार मच गया।
उस समय अवसर देखकर कुबेर ने नल राजा से कहा ‘पिताजी ने आपको राज्य दिया था लेकिन मैंने बुद्धि से आपको हरा दिया है और इसलिए अब इस राज्य का मालिक मैं हूँ। आपकी उपस्थिति में राजमुकुट धारण करना सही नहीं होने से मैं आपको राज्य की सीमा छोड़ देने का आदेश देता हूँ।’
कुबेर के इन अपमानजनक शब्दों को सुनकर नल राजा ने कहा ‘कुबेर! तुम इतना घमंड मत करो। मैं इस राज्य को हार चुका हूँ, तो मैं भी अपना कर्तव्य समझता हूँ, मुझे आदेश देने की जरूरत नहीं है, मैं खुद ही अपनी इच्छा से राज्य की सीमा को छोड़कर वनवास में रहने के लिए तैयार हूँ।’
इतना कहकर नल महल छोड़कर जाने लगा।
महासती दमयंती का निर्णय
दमयंती को जैसे ही ये खबर मिली तो उसे बहुत दुःख हुआ लेकिन अपनी सुरक्षा का विचार करते हुए दमयंती भी अपने पति के साथ जंगल जाने के लिए तैयार हो गई।
दमयंती को जाते देख कुबेर ने तुरंत ही उसे रोक लिया और उसका हाथ पकड़कर बोला ‘दमयंती! नल सब कुछ हार चुका है। इस राज्य पर अब मेरा अधिकार हो चुका है, तुझ पर भी मेरा अधिकार हो गया है, इसलिए तुझे मेरी आज्ञा माननी चाहिए।’
कुबेर की यह बातें सुनकर राज्य के मंत्री आगे आए और कठोर शब्दों में बोले ‘युवराज! आप अपनी मर्यादा के बाहर जा रहें हैं। परस्त्री तो माँ के जैसी होती है और रानी दमयंती तो आपके बड़े भाई की पत्नी हैं, इनके प्रति तो आपको अत्यंत आदर होना चाहिए।
जुएँ में आप राज्य को जीत गए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आप कुछ भी अनुचित व्यवहार करने के अधिकारी बन गए हो। अगर आप रानी दमयंती को रोकेंगे तो आपकी सत्ता खतरे में आ सकती है।’
मंत्रीयों की ये बातें सुनकर कुबेर ने सोचा ‘राज्य और प्रजा के खिलाफ चलने में मजा नहीं है।’ इस प्रकार सोचकर उसने दमयंती को नल के साथ जाने की अनुमति दे दी। प्रजा के प्रिय राजा-रानी नगर छोड़कर जा रहे थे, यह देखकर सभी प्रजाजन की आँखों में आँसू थे।
युवराज नल का निर्णय
जंगल में तेज धूप, गर्म धरती और काँटे थे, रात में केवल पेड़ की छाया ही सहारा थी। महलों के सुख-साधन नल और दमयंती के लिए अब सिर्फ सपना बन गए थे।
एक दिन दमयंती ने नल से कहा ‘हे स्वामी, कुंडिनपुर चलें, मेरे पिताजी हमारी ज़रूर मदद करेंगे।’ यह सुनकर नल ने तुरंत मना कर दिया और कहा कि ‘मुश्किल हालातों में ससुराल जाना ठीक नहीं होगा।’
दो-तीन दिन बाद नल ने सोचा ‘मैं तो जंगल की इन कठोर परिस्थितयों को सहन कर लूँगा, लेकिन दमयंती तो राजकुमारी हैं और मेरी पत्नी भी। उसे जंगल के कष्ट नहीं सहने चाहिए।’
दमयंती नल की गोद में सर रखकर सो रही थी। नल ने उसका सर धीरे से जमीन पर रखा और अपनी जाँघ में काँटा चुभाकर खून निकाला और उसी खून से दमयंती के आँचल के कोने पर एक संदेश लिखा
प्रिये! जंगल के कष्ट तू नहीं सहन कर पाएगी और तेरे मायके यानी कुंडिनपुर जाना मेरे लिए ठीक नहीं है, इसलिए तुझे भाग्य के भरोसे छोड़ रहा हूँ। अगर तुझे अपने ससुराल यानी कोशला जाना हो तो केसुड़े के फूल वाले रास्ते से जाना और कुंडिनपुर जाना हो तो वटवृक्ष के नीचे वाले रास्ते से जाना। मेरा दिल हमेशा तेरे साथ है।
फिर नल वहाँ से चला गया, लेकिन बार-बार पीछे मुड़कर देखता रहा कि दमयंती जागी या नहीं। जंगल की झाड़ियों को पार करने के बाद, एक पेड़ के नीचे बैठकर नल को चिंता सताती रही कि ‘क्या मैंने अपनी पत्नी को छोड़कर पाप किया है? क्या इसका दंड मुझे मिलेगा? क्या कर्म मुझे माफ कर देंगे?’
आगे क्या होता है वह हम अगले Episode में जानेंगे लेकिन यहाँ पर Episode 01 पूरा होता है…
Moral Of The Story
1. दमयंती के माता-पिता ने उसे ससुराल जाने के पहले कितनी अच्छी सीख दी। ‘कुछ हो जाए, तो घर पर आ जाना..’ ऐसा नहीं कहा पर ‘ससुराल को ही अपना घर बना देना..’ ऐसा कहा।
आज के माता-पिता को यह बात समझनी चाहिए, अगर सब कुछ अच्छा करना हो तो। दोनों नल और दमयंती राजघराने से थे, फिर भी एक साधु भगवंत को कोई पीड़ा दे रहा है.. यह जाना तो खुद वाहन से उतरे और उन्हें पीड़ा से मुक्त किया।
लंबे विहार रूट में हम कहीं जा रहे हो और बीच में महात्मा पैदल विहार करते हुए दिखे तो हमें भी कम से कम रूककर शाता पूछकर, उन्हें कोई आवश्यकता है, खप है तो वह पूछकर फिर आशीर्वाद लेकर आगे निकल सकते हैं ऐसा संदेश यहाँ पर हमें मिलता है।
2. हम कई बार दुःख में कहते हैं मैंने इतना धर्म किया, इतना तप किया.. फल क्यों नहीं मिलता?
ऐसा ज़रूरी नहीं है कि हम जिस जन्म में धर्म कर रहे हैं उसी जन्म में धर्म का, तप आदि का फल मिलेगा। दमयंती ने पिछले एक जन्म में 500 आयंबिल किए थे और परिणाम स्वरुप तेजस्वी तिलक मस्तक पर मिला।
अर्थात् किए हुए धर्म का फल मिलता ही है अगले किसी न किसी जन्म में मिलता ही है और इसलिए आज भी हमें जो मिला है वह पूर्व में किए गए धर्म के कारण ही मिला है.. लेकिन सिर्फ भौतिक फल की कामना के साथ धर्म नहीं करना है वह भी ध्यान रखना है।
3. जब व्यक्ति ऊँचे पद पर पहुँचता है तब उसे बहुत ही ज्यादा सावधान होना पड़ता है। एक गलत कदम और सब कुछ बिगड़ जाता है। जुआ कितना भयानक व्यसन है वह इस कथा से पता चलता है। जब दमयंती और मंत्रियों ने खेलने से रोका तो नल राजा ने कहा कि सिर्फ मन बहलाने का खेल है, शर्त नहीं है।
शुरुआत इसी तरह से होती है। जुआ हो, शराब हो, व्यभिचार हो, परस्त्रीगमन हो, Smoking हो, चोरी आदि पाप हो, व्यसन हो..
यह पाप की, व्यसनों की दुनिया में डुबाने के लिए व्यक्ति को शुरू-शुरू में यही कहा जाता है कि एक बार में कुछ नहीं होगा.. एक बार कर लेना चाहिए, कुछ नहीं होता है.. मन बहलाते बहलाते कब तन, मन, धन और सब कुछ बह जाता है पता ही नहीं चलता है।
जो पहली बार में फिसलता है, वह बार-बार फिसलता है और ऐसा फिसलता है कि पहाड़ से सीधा खाई में गिरता है। ऐसे व्यसनों को पहली बार में ही No Means No बोलने की खुमारी हम में होनी ही चाहिए।
Share Bazaar वालों को भी ऐसी हालत कई बार देखने को मिलती है।
4. हम सोचेंगे कि नल राजा इतना बेवकूफ है क्या कि दमयंती जैसी रूपवान, कलाओं में Expert, शीलवान ऐसी पत्नी मिली है और जुआ खेलते खेलते दमयंती को भी दांव पर लगा दिया।
सच्चाई यह है कि व्यसन में पड़ने के बाद व्यक्ति अपने परिवार को ही नहीं बल्कि अपने आप को भी भूल जाता है। इसलिए Partner Choose करने से पहले Check कर लेना चाहिए कि वह कोई व्यसन में तो डूबा हुआ नहीं है ना वरना क्या भरोसा वह कब दांव पर लगा दे।
कड़क शब्दों के लिए क्षमा चाहते हैं लेकिन Reality is Reality! व्यसनी व्यसनी होता है.. उसका व्यसन के अलावा कोई सगा नहीं होता है.. उसका खुद का परिवार भी नहीं.. उसकी खुद की आत्मा भी नहीं..
5. महाभारत के द्रौपदी जैसा ही दृश्य यहाँ पर भी बन ही रहा था, लेकिन अच्छी बात यह थी कि राज्य के मंत्री आगे आते हैं और राजा का विरोध करते हैं और Indirectly धमकी देते हैं कि दमयंती को रोका तो सत्ता से उखाड़कर फेंक देंगे।
अगर ऐसा ही विरोध दुर्योधन का भी हुआ होता तो महाभारत का जन्म ही नहीं होता। शील रक्षा से ऊपर कुछ भी नहीं है, राजा भी नहीं, दिया हुआ वचन भी नहीं।
6. शील पर खतरा महासतियों को बिलकुल भी मंज़ूर नहीं। जंगल में जान का खतरा और महल में शील का खतरा, फिर भी दमयंती ने जंगल को चुना। दमयंती ने नल से विवाह किया था नल के महल से नहीं और इसलिए नल के साथ वनवास में जाने के लिए भी वह तैयार हो गई।
जुआ कितना भयानक है न, महल से सीधा जंगल में लाकर छोड़ दिया। अपने परिवार से सच्चा प्रेम करनेवाला व्यक्ति जुआ खेलने से और जुआ खेलने वालों से बहुत दूरे रहना पसंद करेगा।
7. नल अपनी पत्नी के भले के लिए उसे छोड़ने का निर्णय करता है। उसका मन बहुत साफ है कि इसका भला हो.. ये मेरे साथ इतनी कठिनाइयाँ सहन नहीं कर पाएगी।
अब यह सही है या गलत है वह अगले Episode में समझ में आ जाएगा लेकिन क्या आज के समय में ऐसा प्रेमभाव पति-पत्नी के बीच होता है? है ?
8. पहले के जमाने में लड़कियों की कितनी Respect थी, वह हमें दमयंती के स्वयंवर से पता चलता है और जब नल और दमयंती राज्य से निकलते हैं तब भी वह जो घटना घटती है उसमें भी पता चलता है।
लड़कियां पहले एक Commodity के रूप में नहीं देखी जाती थी, बल्कि एक सम्माननीय व्यक्ति के रूप में देखी जाती थी.. परस्त्री को माँ, बहन, बेटी के रूप में देखा जाता था।
आज क्या हो रहा है हम सब जानते हैं!
आज.. माफ़ करना.. लेकिन कुछ लड़कियां भी खुद को Commodity के रूप में Portray कर रही है और बेशर्म लड़के भी उन्हें Commodity के रूप में देख रहे हैं यह पतन नहीं है तो क्या है आप खुद सोचिए!
क्या महासती दमयंती अपने शील की रक्षा कर पाएगी?
क्या नल राजा को उसके कर्मों का फल मिलेगा?
क्या जंगल की गहराइयों में दमयंती के सामने नए खतरे आएंगे?
क्या यह जंगल दमयंती के लिए मुक्ति का मार्ग बनेगा या विनाश का कारण?
जानेंगे अगले Episode में !


