महासती ऋषिदत्ता की अद्भुत कथा।
एक राजकुमार… शादी करने निकला था लेकिन रास्ते में उसे एक ऐसी कन्या मिली, जो कभी दिखती है, कभी हवा में गायब हो जाती है और जिस जंगल में वो रहती है, वहाँ पर एक जिनमंदिर है, पर कोई शहर नहीं है, कोई आबादी नहीं है। सवाल यह है कि ये कन्या ‘अप्सरा’ है… या “कर्मों का सबसे बड़ा जाल?”
प्रस्तुत है दिल दहला देने वाली महासती ऋषिदत्ता की अद्भुत कथा का Episode 01
राजकुमार कनकरथ का परिचय
भरत क्षेत्र के मध्य खंड में रथमर्दन नगर के राजा का नाम था हेमरथ। राजा की शीलवान मुख्य रानी का नाम था सुयशा। एक दिन सुयशा ने एक पुत्र को जन्म दिया। उस राजपुत्र का नाम रखा गया कनकरथ।
समय बीतने लगा, कनकरथ ने यौवन अवस्था में प्रवेश किया। उसके देह का सौंदर्य खिल उठा आर सिर्फ Physically नहीं बल्कि Character में भी दया, दान, परोपकार, विनय, विवेक, नम्रता आदि गुणों का भी विकास हुआ। उसने पुरुषों की समस्त 72 कलाएं भी सीख ली थी। धर्म क्रियाओं में भी वह आगे था।
ये तीन नाम याद रखने हैं हेमरथ राजा, इनका पुत्र राजकुमार कनकरथ और इनके नगर का नाम रथमर्दन।
अब चलते हैं दूसरी तरफ..
विवाह का प्रस्ताव
कोबेरी नगरी में सुंदरपाणि नाम के महाराजा थे। उस राजा की वरसुधा नाम की महारानी थी। इनकी इकलौती बेटी थी जिसका नाम था रुक्मिणी। यह स्त्री के योग्य 64 कलाओं में Expert थी।
इसने भी जैसे ही यौवन के प्रांगण में प्रवेश किया तो उसकी Beauty खिल उठी थी। अब ये तीन नाम भी याद रखने हैं.. सुंदरपाणि राजा, इनकी बेटी राजकुमारी रुक्मिणी। इनके नगर का नाम कोबेरी।
ये दोनों Royal Families के नाम और नगर के नाम आगे की Story समझने के लिए बहुत ज़रूरी है। इसलिए इन्हें याद रखिएगा।
इधर कोबेरी में राजकुमारी रुक्मिणी की विवाह की उम्र हो गई थी तो राजा सुंदरपाणि को उसके योग्य वर की चिंता सताने लगी। तो राजा ने अपने मंत्रियों से सलाह ही।
एक वृद्ध मंत्री ने कहा कि रथमर्दन नगर के महाराजा हेमरथ का पुत्र कनकरथ राजकुमार रूप संपन्न होने के साथ साथ गुणसंपन्न भी है, तो राजकुमारी के लिए अच्छा पति सिद्ध हो सकता है।
राजा को यह सलाह पसंद आ गई। तो उसने दूत को यानी एक Messenger को तैयार किया और शादी की Request रथमर्दन नगर भेज दी।
राजा अरिदमन के साथ युद्ध
उधर हेमरथ राजा ने इस Request को Accept की और पिता हेमरथ की आज्ञा से कनकरथ राजकुमार अपने मित्र परिवार एवं सेना के साथ विवाह के लिए कोबेरी की तरफ निकल गए। बीच में एक नगर के बाहर उन्होंने अपना पड़ाव डाला।
वहां पर किसी दूत ने आकर राजकुमार कनकरथ को कहा कि ‘आपने हमारे राज्य की सीमा में प्रवेश करने से पहले आज्ञा क्यों नहीं ली, यह अपराध है, या तो हमारे महाराजा अरिदमन के पास जाकर माफ़ी मांगो या फिर युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’
उधर भीषण युद्ध हुआ और राजा अरिदमन हार गया और कनकरथ ने उसे बंदी बना लिया। फिर दया आई तो उसे मुक्त भी कर दिया। युद्धभूमि में हजारों सैनिकों की मौत देखकर अरिदमन के दिल में संसार के प्रति वैराग्य भाव उत्पन्न हो गया था।
उसने अपने पुत्र को राजगद्दी पर बिठाकर खुद दीक्षा ले ली और केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त किया।
अदृश्य होने वाली कन्या
इधर कनकरथ ने अपना रथ आगे बढ़ाया। एक जंगल में पड़ाव डाला। शाम का समय था। उसके साथ उसके मित्र भी थे जो उस समय में जंगल का Beautiful Environment देखने के लिए गए हुए थे।
काफी लंबे समय के बाद आए तो कनकरथ ने पूछा कि क्यों भाई इतनी देरी कैसे हुई? तो उन्होंने कहा कि हम जंगल की Beauty को देख रहे थे तभी थोड़ी दूरी पर एक Garden में एक अप्सरा जैसी कन्या को झूले में झूलती हुई देखा।
ऐसा लगा जैसे स्वर्ग से कोई देवांगना आई हो। और फिर अचानक वह कन्या अदृश्य हो गई यानी Invisible हो गई। उसको फिर से ढूँढने की कोशिश की लेकिन फिर से उसे देख नहीं सके। इसलिए देरी हुई।
राजकुमार कनकरथ सोचने लगा कि इस भयंकर जंगल में कन्या कहाँ से आई और वह कन्या कौन होगी? और फिर सब सो गए। अगले दिन सब आगे बढे और कनकरथ एक सरोवर के तट पर आया और अचानक वहां पर उसने एक Extremely Beautiful लड़की को देखा।
उसकी Beauty देखकर कनकरथ के आश्चर्य का पार नहीं रहा। वह तो सोच में पड़ गया कि ‘इतनी Beautiful लड़की पृथ्वी पर आई कैसे, नहीं नहीं ये स्वर्ग की कोई अप्सरा लगती है।’
अचानक कनकरथ की आँखें पास में रहे एक विशाल जिनमंदिर पर गई। फिर से अपनी आँखें उस लड़की को देखने के लिए घुमाई तो ये क्या.. गायब।
पहली मुलाकात
कनकरथ ने सोचा शायद वह कन्या जिनमंदिर में चली गई होगी। ऐसा सोचकर कनकरथ ने जिनमंदिर में प्रवेश किया। वहां पर श्री आदिनाथ भगवान की मनमोहक प्रतिमा दिखाई दी।
उसने निर्मलजल से प्रभु का प्रक्षालन किया और फिर सुगंधित पुष्पों से प्रभु की पूजा की और भावपूर्वक प्रभि की स्तुति करने लगा “हे प्रभु आज आपके दर्शन से मैं और मेरी आँखें धन्य बन गई”।
वह स्तुति कर ही रहा था कि वह कन्या हाथ में पुष्प लेकर उसी जिनमंदिर में आई और भावपूर्वक परमात्मा की पूजा करने लगी और मधुर कंठ से प्रभु की स्तुति की।
प्रभु की पूजा एवं भक्ति करके वे दोनों साथ-साथ मंदिर में से बाहर आए। उस कन्या ने कनकरथ को देखा और सोचा कि अहो! क्या यह इंद्र है, चंद्र है या साक्षात सूर्य है.. अरे ये कौन है?
ऋषिदत्ता का रहस्य
इधर कनकरथ ने एक वृद्ध यानी बड़ी उम्र वाले जटाधारी साधु को देखा। वह साधु ने पूछा कि तुम कौन हो कहाँ से आए हो और कहाँ जा रहे हो?
कनकरथ ने अपना पूरा परिचय दिया फिर पूछा कि महात्मन्! यह मंदिर किसने बनवाया है और यह कन्या कौन है?
वह वृद्ध संन्यासी कनकरथ को अपनी झोपडी में ले गया और नाश्ता वगैरह कराया। फिर दोनों एक पलंग पर बैठ गए और फिर वृद्ध संन्यासी ने उस जिनमंदिर का रोचक इतिहास सुनाया।
दरअसल उस स्थान के पास ही मित्रावती नामक नगरी थी, वहां के राजा का नाम था हरिषेण। एक बार राजा हरिषेण जंगल में भ्रमण के लिए घोड़े पर निकला था लेकिन भटक गया था तो एक तापस आश्रम में जा पहुंचा और वहां पर उसका तापस संन्यासियों से संपर्क हुआ था।
उसे वह तापस आश्रम पसंद आ गया था तो एक महीने के लिए राजा उन संन्यासियों के पास रुका। उसी राजा हरिषेण ने यह मंदिर बनवाया था।
राजा और रानी का संन्यास
राजा हरिषेण ने एक बार प्रीतिमती नामक राजकुमारी की जान बचाई थी और फिर उसके साथ उसका विवाह हो गया था। एक शुभ दिन प्रीतिमती रानी से तेजस्वी पुत्ररत्न का जन्म हुआ जिसका नाम धार रखा गया। धीरे धीरे वह बड़ा होने लगा।
एक दिन किसी की अचानक मौत की घटना को देखकर हरिषेण राजा को वैराग्य भाव उत्पन्न हो गया तो उसने अपने राजकुमार का राज्याभिषेक किया और संसार त्याग की घोषणा करा दी।
अब इस दौरान उसकी रानी प्रीतिमती फिर से Pregnant हो चुकी थी लेकिन प्रीतिमती ने यह बात किसी को नहीं कही, खुद अपने पति को भी नहीं और खुद रानी प्रीतिमती ने भी तापसी दीक्षा लेने का निर्णय कर लिया। फिर राजा और रानी ने आश्रम में प्रवेश किया और तापस आश्रम के कुलपति विश्वभूति ने उन दोनों को तापसी दीक्षा प्रदान की।
दोनों राजा रानी तापस वेश में कुलपति की सेवा करने लगे। समय बीतने लगा और तापसी प्रीतिमती के देह पर Pregnancy के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देने लगे तब हरिषेण तापस ने पूछा कि अरे यह क्या? यह गर्भ किससे रहा? प्रीतिमती तापसी भी लज्जित हो गई और कहा कि गृहस्थ जीवन में आपसे ही यह गर्भ रहा हुआ है।
हरिषेण ने पूछा कि तो फिर संन्यास जीवन को स्वीकार करने से पहले यह बात क्यों नहीं कही? तो उसने कहा कि संन्यास में कहीं अटकाव ना आ जाए इस भय से यह बात नहीं कहीं।
ऋषिदत्ता का जन्म
अब हरिषेण ने सोचा कि तापस जीवन का स्वीकार तो ब्रह्मचर्यव्रत के स्वीकार का प्रतीक है, अगर यह सब पता चला तो यह लज्जा की बात हो जाएगी। अब क्या किया जाए.. यहाँ पर रहना ठीक नहीं है, इस घटना से तापस आश्रम भी कलंकित हो जाएगा।
दोनों हरिषेण और प्रीतिमती उस आश्रम वन को छोड़कर शून्य वन की ओर आगे बढ़ने लगे। वहां पर उन्हें पुष्प नामक तापस मिले। उनको सब बातें बताई तो उन्होंने कहा कि इसमें तुम्हारा दोष नहीं है इसलिए चिंता मत करो।
अंत में राजा और रानी वसुभूति नामक वृद्ध संन्यासी की सेवा करने लगे और बारबार अपनी भूल का प्रायश्चित्त करने लगे। 9 महीने पूर्ण हुए और प्रीतिमती ने एक पुत्री को जन्म दिया।
जन्म के समय प्रीतिमती को बहुत भयानक पीड़ा हुई और उस वेदना से अचानक उसकी मृत्यु हो गई। ऋषि के आश्रम में पैदा होने से उस पुत्री का नाम ऋषिदत्ता रखा गया।
इस तरह से उस वृद्ध संन्यासी ने यह पूरी घटना कनकरथ को बताई और कहा कि ‘वह राजा हरिषेण मैं ही हूँ और यह कन्या ऋषिदत्ता मेरी पुत्री ही है। धीरे धीरे ऋषिदत्ता बड़ी होने लगी। मैंने ही इसका पालन-पोषण किया है।’
अदृश्य होने का राज
इसके बाद हरिषेण संन्यासी ने ऋषिदत्ता के अदृश्य होने का यानी Invisible होने का राज़ खोला। उसके कहा कि इसके अद्भुत रूप को देखकर कोई इसका अपहरण ना कर ले यानी कि Kidnap ना कर ले इसलिए मैंने अदृश्यकारी अंजन तैयार करके दिया था, जिसके प्रभाव से कभी यह दिखाई पड़ती है और कभी अदृश्य हो जाती है।
अदृश्य होकर यह जंगल में शांति से घूम सकती है।
हरिषेण संन्यासी, कनकरथ के व्यवहार से बहुत खुश हुआ तो उसने अपनी बेटी का हाथ कनकरथ के हाथों में सौंपकर वहीँ पर लग्न-मंडप तैयार करके दोनों का विवाह करा दिया और कहा कि
हे कुमार! तुम्हारे ऊपर पूरा विश्वास रखकर मैंने मेरी बेटी की शादी तुमसे कराई है, इसलिए अच्छी तरह से इसकी रक्षा करना, जंगल में पली हुई होने के कारण यह बहुत ही भोली-भाली है, इसलिए इसके कोमल दिल को किसी भी प्रकार का आघात ना लगे, इसके लिए पूरी सावधानी रखना, तुम गुणवान हो, इसलिए तुम्हारे साथ रहने से मेरी पुत्री भी गुणवती बनेगी।
उस समय में एक पिता गुणवान व्यक्ति देखता था ताकि उसकी बेटी भी गुणवती बने.. सोचने जैसा है।
कुछ दिनों तक कनकरथ ऋषिदत्ता के साथ उसी आश्रम में रहा। उस समय हरिषेण संन्यासी के जीवन का अंत हुआ तो ऋषिदत्ता बहुत जोर जोर से रोने लगी कि आप मुझे छोड़कर कहाँ चले गए? आप ही मेरे आधार थे.. मैंने जन्म के बाद माता का मुख भी नहीं देखा था.. आप ही मेरी माता थे। अब आप भी चले गए..
भव्य स्वागत
कनकरथ को भी बहुत आघात लगा था। फिर उसने ऋषिदत्ता को खूब आश्वासन दिया और उसे शांत किया और सोचा कि अब यहाँ पर रहेंगे तो ऋषिदत्ता को अपने पिता की याद ज्यादा सताएगी इसलिए यहाँ से प्रयाण करना ही उचित है।
कुछ दिनों के बाद वह कनकरथ जो Actual में कोबेरी की तरफ राजकुमारी रुक्मिणी से शादी करने के लिए निकला था वह वहां पर नहीं बल्कि अपने खुद के नगर, रथमर्दन नगर लौट गया।
महाराजा हेमरथ ने अपने नवविवाहित पुत्र एवं पुत्रवधू का भव्य प्रवेश महोत्सव कराया। दोनों ने राजा और रानी के चरणों में प्रणाम किया। ऋषिदत्ता के रूप, विनय, नम्रता, सरलता आदि गुणों से पूरा परिवार बहुत खुश हो गया।
Moral Of The Story
यहाँ पर जानने जैसी बात यह है कि
1. पहले के राजा-रानियों के पास इतनी समृद्धि होने पर भी साथ ही साथ उस समृद्धि पर अनासक्ति भी उस Level की ही होती थी.. सिर्फ किसी की मौत को देखकर राजा को प्रतिबोध हो गया.. हम तो हररोज़ कितने ही हादसे सुनते हैं, लेकिन वैराग्य?
2. इस दुनिया में जिस व्यक्ति का पुण्य होता है, उसे अपने आप पत्नी वगैरह समृद्धियाँ जंगलों में भी मिल जाती है। जंगल भी उसके लिए मंगलरूप बन जाता है। संसार में टिकने और बढ़ने के लिए पुण्य का सबसे Major Role है और पुण्य, धर्म से मिलता है।
3. अपने पति के वैराग्य को देखकर पत्नी रानी को भी वैराग्य की कैसी तलप लगी और साथ ही अपने पति पर कैसा समर्पण आया कि वह भी जंगल में रहने के लिए तैयार हो गई। पति-पत्नी के बीच का निर्मल प्रेम कैसा होता है, उसका ये अद्भुत Example है।
4. एक पिता का Role अपनी बेटी के लिए कैसा होता है, वह भी हमें इससे पता चलता है। लड़की का कोई अपहरण ना कर ले इसलिए पिता ने उसे अंजन बनाकर स्वतंत्रता भी दी और सुरक्षा भी.. आज के पिता अंजन के रूप में क्या देते हैं? बहुत बहुत बहुत ज्यादा चिंतन करने जैसा विषय है.. सच्चे पिता कितने?
इतना सब कुछ सुनकर हमें लग रहा होगा कि Wow क्या मस्त Beautiful Love Story है लेकिन Life कभी भी एक जैसे नहीं चलती है।
क्या कनकरथ के साथ शादी करने के बाद ऋषिदत्ता शांति से जी पाएगी या फिर भिवष्य उसके लिए कुछ और ही भयानक तैयार करके बैठा है.. जानेंगे अगले Episode में।


