The Ancient History Behind Mahapurush Kalkacharyaji Changing Samvatsari’s Tithi

संवत्सरी की तिथि पंचमी से चौथ क्यों बदली?

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By Jain Media 70 Views 13 Min Read

संवत्सरी की तिथि बदलने का इतिहास 

हर साल हम बहुत ही भावपूर्वक एवं उत्साह एवं उल्लास के साथ पर्युषण महापर्व मनाते हैं और भादरवा सुदि चौथ के दिन यानी संवत्सरी के दिन साल भर का गुस्सा आदि भुलाकर एक दुसरे से क्षमायाचना करते हैं। 

“मिच्छामी दुक्कडम्” कहते हैं। 

लेकिन क्या हमें पता है कि आज से कई साल पहले संवत्सरी महापर्व को भादरवा सुदि चौथ नहीं, पांचम के दिन मनाया जाता था। 

आइए अब हम 4th कालकाचार्यजी की वह कथा देखेंगे जिसमें उन्होंने कुछ संयोग बनने से संवत्सरी पांचम को नहीं बल्कि चौथ को मनाने की व्यवस्था स्थापित की जो आज भी हम Follow कर रहे हैं। 

लेकिन आखिर ऐसा क्या कारण था जिसके कारण संवत्सरी की तिथि बदलनी पड़ी? आखिर क्यों संवत्सरी के आराधना के दिन को बदला गया?

जानने के लिए बने रहिए इस Article के अंत तक। 

एक बार कालकाचार्यजी अपने विशाल परिवार के साथ भृगुकच्छ यानी आज के भरूच में पधारे। वहां के राजा और कालकाचार्यजी के भांजे बलमित्र और भानुमित्र राज्य करते थे और खूब धूमधाम से पूज्यश्री का नगर-प्रवेश कराया। 

राजा के अति आग्रह से पूज्यश्री ने अपने विशाल परिवार के साथ भरूच में ही चातुर्मास किया। पूज्यश्री के प्रति राजा के दिल में बढ़ती हुई श्रद्धा व आस्था को देखकर उस राज्य का एक नामी व्यक्ति ईर्ष्या से जलने लगा। 

कालकाचार्यजी ने वैसे भी उसे कुछ समय पहले ही Debate में हराया था और इस कारण उसके दिल में पूज्य आचार्य भगवंत के प्रति वैर की गाँठ बँध चुकी थी। वह एक ऐसे मौके की तलाश में था जब वह अपने वैर का बदला ले सके। 

थोड़े दिन बाद अवसर देखकर राजा के कान फूंकते हुए उस नामी व्यक्ति ने कहा ‘राजन्‌। इस धरती पर कालकाचार्यजी से बढ़कर पवित्र पुरुष और कौन हो सकता है? कैसा निर्मल उनका संयम है।’ 

राजा ने सहमती प्रदान की और वह फिर से कहने लगा ‘राजन्‌। ऐसे महापुरुष के चरणकमल जिस धरती पर हों, वह धरती भी कितनी पवित्र कहलाती है। 

मुझे तो यही एक चिंता सता रही है कि नगर की समस्त भूमि उनके चरण-कमलों से पवित्र बन चुकी है तो फिर उस धरती पर हम पैर रखेंगे तो क्या हम पाप के भागीदार नहीं होंगे?’ 

राजा तो वैसे भी कान के कच्चे होते हैं और उस नामी व्यक्ति की ये बात सुनकर राजा सोचने लगा 

यह तो बड़ी विकट समस्या आ खड़ी हुई है। शास्त्रों में तो लिखा है ‘अपनी शक्ति हो तो गुरु की भक्ति करनी चाहिए, किंतु आशातना तो कभी नहीं।

राजा ने इस समस्या का समाधान पूछा। उसने तो मौका मिलते ही चौका मारा और कह दिया

एक उपाय है। पूज्यश्री अगर यहाँ से विहार कर जाए तो आप और प्रजाजन गुरु की घोर आशातना के पाप से बच सकते हैं और पूज्यश्री यहाँ से किस प्रकार विहार करेंगे उसका भी उपाय है मेरे पास।

जैन साधु स्वयं के लिए बनाई हुई गोचरी ग्रहण नहीं करते हैं, उस गोचरी को वे आधाकर्मी दोष वाली मानते हैं।

आपकी आज्ञा हो तो समस्त नगरवासियों को सूचना दी जाए कि साधुओं की भक्ति के लिए सभी के घर में विशेष मिठाई आदि बनाई जाए।

यह बात राजा के दिमाग में बैठ गई और उसने वैसा ही करने के लिए आदेश दे दिया। 

दूसरे दिन जब साधु भगवंत गोचरी के लिए निकले तो उन्हें कहीं से भी निर्दोष गोचरी नहीं मिली और हर जगह निर्दोष गोचरी की दुर्लभता को देखकर पूज्यश्री ने चालू चातुर्मास में वहाँ से विहार करने का Decision लिया। 

राजा ने भी पूज्यश्री के फैसले में सहमति प्रदान कर दी और पूज्यश्री अपने विशाल परिवार के साथ प्रतिष्ठानपुर नगर की ओर विहार करने लगे। प्रतिष्ठानपुर में सतावाहन राजा राज्य करता था। 

पूज्यश्री के अपने मुनि मंडल के साथ नगर में पधारने के समाचार मिलते ही राजा ने अत्यंत ही आदर सम्मान के साथ पूज्यश्री का नगरप्रवेश कराया। नगरप्रवेश के दिन से ही पूज्यश्री के रोज़ ज़बरदस्त प्रवचन होने लगे और ऐसे ही कई दिन बीत गए। 

एक दिन आचार्य भगवंत ने कुछ ही समय बाद पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व आनेवाले हैं यह सोचकर सभी को पर्युषण की महत्ता बताई। राजा भी प्रवचन में मौजूद था। 

आचार्य भगवंत ने कहा ‘पर्युषण यह जैनों का महापर्व है, इस पर्व की आराधना कर सभी जीवों को आत्मशुद्धि करनी चाहिए।’ 

प्रभु महावीर के समय से लेकर कालकाचार्यजी तक पर्युषण महापर्व यानी संवत्सरी की आराधना भादो सुदी पंचमी को होती थी। संवत्सरी के पहले आत्मशुद्धि की तैयारी के लिए सात दिन जोड़कर आठ दिन की आराधना की जाती है। 

कालकाचार्यजी जब प्रतिष्ठानपुर में बिराजमान थे उस वर्ष, पर्युषण पर्व जब नजदीक आया तब राजा ने आचार्य भगवंत को विनति की, 

हे भगवन! भाद्रपद महीने के शुक्ल पंचमी के दिन इस देश में इंद्रध्वज महोत्सव होनेवाला है। इसलिए श्री पर्युषण पर्व अगले दिन, यानी, छट्ठ को करे-करवाइए, क्योंकि लौकिक पर्व के आने से लोगों का मन धर्म की आराधना में उत्साही नहीं होगा।

तब आचार्य भगवंत ने कहा कि 

पूर्व में तीर्थंकर और गणधरों ने भी संवत्सरी की आराधना के लिए पंचमी की रात्री का उल्लंघन नहीं किया। ‘पर्व तो उसी दिन हो सकता है’ ऐसा हमारे गुरु भगवंत ने भी कहा था।

मेरु शिखर शायद कम्पित हो सकता है, सूर्योदय पश्चिम से हो सकता है, लेकिन पंचमी की रात्री का उल्लंघन करके इस पर्व की आराधना नहीं की जा सकती।

यह सुनकर राजा ने कहा, ‘हे प्रभो! तो पर्युषणा पर्व चतुर्थी के दिन कीजीए।’ गुरु ने कहा, ‘ऐसा हो सकता है क्योंकि यह वचन पूर्वाचार्यों को भी मान्य है। और तो और, ऐसा भी शास्त्रवचन है कि पांचम के पहले भी पर्युषण पर्व की आराधना कर सकते हैं।’ 

यही शास्त्रवचन हम भी श्री बारसा सूत्र यानी कल्पसूत्र के अंतर्गत सुनते हैं। तब से लेकर आज तक सकल संघ संवत्सरी महापर्व की आराधना चौथ के दिन करता आया है। 

(आधार: श्री प्रभावक चरित्र)

उस समय के युगप्रधान संविग्न गीतार्थ गुरु भगवंत द्वारा जब संवत्सरी की आराधना पाँचम से लेकर चौथ में तय की गई, तब तत्कालीन सर्व गीतार्थ आचार्य भगवंतों ने इस वचन को मान्य किया। 

यही बात को श्रमण भगवन महावीर स्वामी परमात्मा ने खुद अपनी अंतिम देशना में अपने शासन का भविष्य बताते हुए कहा था। 

प्रभु ने कहा था कि 

मेरे निर्वाण के यानी प्रभु महावीर स्वामी के मोक्ष जाने के 993 वर्ष के बाद, इंद्र स्वयं जिनको वंदन करते हैं ऐसे कालिक नाम के आचार्य होंगे और वे कारणवश, उस समय के सभी आचार्यों के स्वीकार पूर्वक, संवत्सरी के दिन को पंचमी से चौथ में लाएंगे।

यह तथ्य कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा कृत दीपालिका कल्प की गाथा 103-104 में एवं विक्रम संवत 1483 में श्री जिनसुंदरसूरिजी महाराज साहेब कृत् दीपालिका कल्प की 436वीं गाथा में बताई गई है।  

इस बात का विशेष वर्णन श्री कल्पसूत्रजी की कल्पकिरणावली टीका के 2nd सूत्र में आज से 400-500 वर्ष पहले श्री धर्मसागरजी महाराज साहेब ने भी किया है।

कालकाचार्यजी सम्पूर्ण गीतार्थ यानी शास्त्रों के जानकार थे और जब आचार्य भगवंतो को बड़ा लाभ दिखे, तब वे अपने Decisions और सभी लोगों की विशेष आराधना एवं उत्साह को ध्यान में रखकर बहुत कुछ Change कर सकते हैं।

इसका एक छोटासा नमूना हमें Lockdown के दौरान देखने को मिला। पूजा पद्धति, पर्युषण आराधनाएं, राज्य के नियमों को देखकर Change हुए और सबको Follow करने ही पड़े। 

भरहेसर की सज्झाय में आनेवाले महापुरुष कालकाचार्यजी को हम वंदन करते हैं। 

यहाँ पर और भी ऐसी अलग अलग कथाएं मिलती है, जिसका संकलन अलग अलग ग्रंथों में आता है। 

4th कालकाचार्यजी की कथा से बहुत सी चीजें समझने जैसी है।

Moral Of The Story

1. लोग किस तरह माया कर-करके साधु भगवंतों को भी ठगते हैं, उसका एक Example भरूच के उस एक जैन धर्म के विद्रोही मंत्री का है। 

अगर हमें साधु भगवंत की सेवा आदि नहीं करनी हो तो उन्हें प्रेम से बिना माया करे ना कह देनी चाहिए। माया करनेवालों की हालत बहुत ही ख़राब होती है। 

अनंत भवों तक उन्हें तिर्यंच यानी पशुओं और नरक की दुनिया में भटकना पड़ता है। ऐसे मायावियों से बहुत सावधान रहना चाहिए। 

2. जो युगप्रधान आचार्य यानी विशिष्ट शक्ति और पुण्य से युक्त आचार्य होते हैं, उन्हें शास्त्रीय मर्यादा अनुसार ऐसे Changes करने का अधिकार होता है और सभी लोग और साधु भगवंत भी उन Changes को मान्य रखते हैं। 

जो संविग्न-गीतार्थों को बहुमान्य नहीं होते, उन्हें युगप्रधान आचार्य मानने की भूल नहीं करनी है और इसलिए ऐसी चीजों पर कि जो द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावाधीन हो, उन पर फोगट विवाद करना और जैन धर्म का बंटवारा बिलकुल नहीं करना चाहिए। 

जैन धर्म को तोड़नेवाले तत्वों से हमेशा सावधान रहना चाहिए। 

3. जैन शासन में मोक्षमार्ग के दो पहलू है: 

  • आगम और आगम अनुसार बनाए गए शास्त्र, एवं
  • संविग्न गीतार्थ आचार्य भगवंतों की शास्त्रानुसारी आचरणा। 

(आधार:  श्री धर्मरत्न प्रकरण, श्री मार्गद्वात्रिंशिका) 

जैसे शास्त्र हमारे लिए पूज्य और शिरोधार्य है, वैसे ही गीतार्थ गुरु भगवंतों की आचरणा भी हमारे लिए मार्ग स्वरूप ही है। 

जो लोग केवल आगम को ही मानने का दावा करते है परन्तु सुविहित परंपरा की उपेक्षा करते हैं, उन्हें मार्ग को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। 

कई बार लोग कहते हैं-“जी ऐसा आगम में कहाँ लिखा है? हम तो सिर्फ आगम की ही बात मानेंगे”

अब उदाहरण के तौर पर: आगमों में वर्णित विधि के अनुसार तो साधु भगवंत के कालधर्म के बाद अन्य साधु भगवंत ही उनके शव को वन में जाकर रख देते है, जबकि वर्तमान में श्रावक वर्ग द्वारा उनके पुण्यदेह को अग्निसंस्कार दिया जाता है। 

यह आचरणा गीतार्थ गुरु भगवंत द्वारा Approved है, इसलिए आज भी वह मार्गस्वरूप है और जो लोग केवल आगम को मानने का दावा करते हैं वे भी इसी प्रकार अपने गुरु भगवंत के पुण्यदेह का अग्निसंस्कार करते हैं।

अब इस पर अगर प्रश्न पूछा जाए तो उनके पास शायद उत्तर नहीं होगा आज के काल के लिए प्रभु ने भी आगम व्यवहार यानी कि शास्त्रानुसारी व्यवहार के आगे जीत व्यवहार यानी गीतार्थ गुरु भगवंतों के द्वारा प्रवर्तित व्यवहार को स्थान दिया है। 

यह बात निशितसूत्र, व्यवहारसूत्र आगमों में सविस्तार बताई गई है।

4. जैन धर्म का यदि बड़ा-छोटा Loss ना हो, उलटा फायदा होता हो, वैसे राजा यानी Government के Decisions को हमें Accept करना चाहिए। 

उसमें शास्त्रों को Follow कर कुछ नियम Change भी हो तो वो शास्त्रीय ही कहा जाता है, पर उस Change को करने की पूरी सत्ता सिर्फ गीतार्थ आचार्यों के पास ही होती है, रस्ते पर चलनेवाले ऐरे-गैरों के पास नहीं। 

कोई कह दे और हम मान लें तो हम मुर्ख कहे जाएंगे। 

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