क्या कोई व्यक्ति भगवान की 9-9 घंटों तक पूजा कर सकता है?
अगर हम कहे कि एक दो दिन के लिए किसी ने ऐसा किया है तो शायद हमें आश्चर्य नहीं होगा लेकिन अगर ऐसा कहा जाए कि पिछले 10 साल से बिना रुके बिना थके कोई ऐसा कर रहा है तो?
धर्म प्रेमी संदेश Magazine में परम पूज्य पंन्यास प्रवर श्री धैर्यसुंदर विजयजी महाराज साहेब द्वारा ये जानकारी हमें प्राप्त हुई है.
पूरी जानकारी के लिए बने रहिए इस Article के अंत तक.
सूरत शहर में रहा हुआ गोपीपुरा विस्तार प्राचीन तीर्थ स्थलियों से पावन है. इस गोपीपुरा विस्तार में 60 से भी अधिक प्राचीन जिनालय हैं और दूसरी ओर यहाँ जैनों की आबादी कम होती चली जा रही है.
अभी वर्त्तमान में हालत ऐसी है कि जैसे जैसे लोगों के पास पैसे बढ़ने लगे, लोगों ने नए सूरत की ओर रुख किया. जिनालय में प्रभु रह गए और भक्त गैरहाजिर हो गए और ये सिर्फ सूरत नहीं बल्कि भारत के लगभग हर उस शहर की बात है जहाँ ये चलन देखने को मिल रहा है.
बात करे गोपीपुरा सूरत की तो जहाँ रोजाना सुबह होते ही भक्तों की भक्ति एवं घंटनाद की ध्वनि से गोपीपुरा गूंज उठता था वहां सन्नाटा सा छा गया.
पाषाण के बड़े बड़े भव्य प्रभुजी की पूजा पुजारियों के द्वारा ही संपन्न होने लगी थी, तब धातु के छोटे छोटे प्रभुजी की पूजा कौन श्रावक करता होगा? ये एक बहुत बड़ा प्रश्न है.
करीबन 10 साल पूर्व एक युवा श्रावक ने इस परिस्थिति को देखकर मनो मंथन किया. रोजाना एक जिनालाय में वह अष्टप्रकारी पूजा कर रहा था लेकिन अन्य जिनालयों में प्रभु पूजा की होनेवाली उपेक्षा इन्हें चुभने लगी.
इनका किया हुआ मनो मंथन सिर्फ विचार तक सीमित नहीं रहते हुए सम्यग् परिवर्तन का कारण बना.
वह युवा श्रावक भाई का नाम है अल्पेश भाई. गोपीपुरा में एक Flat में बरसों से उनका परिवार रहता है. धीरे धीरे उनके भाई वगैरह वहां से नए सूरत में बस गए. उन्हें भी कई बार कहा कि ‘अब अपने समाज के घर इस विस्तार में ना के बराबर हैं तो तू भी यहाँ पर आ जा.’
लेकिन अल्पेश भाई ने सोचा कि ‘यहाँ प्रभु भक्ति की समस्या का समाधान क्या है? मैं उपेक्षा नहीं कर सकता.’ समाज से पहले भगवान को रखा, प्रभु भक्ति को रखा. 10 साल पूर्व किसी धन्य पल में उन्होंने रोजाना सुबह 7 बजे से अलग अलग जिनालयों में जाकर परमात्मा की अष्टप्रकारी पूजा करना शुरू किया.
रोजाना शाम 4 बजे तक उनका यह पूजा का कार्यक्रम जारी रहता था. बिना किसी भी प्रकार के वेतन या बहुमान, अल्पेश भाई 9-9 घंटे तक लगातार प्रभु की पूजा करते हैं. इस पूजा के दौरान शरीर के आवश्यक कार्य यानी पानी, Bathroom जाना, भोजन करना इत्यादि पर पूर्ण रूप से उनका Stay Order रहता है.
मतलब वे रोजाना बिना व्यवधान पूजा हो पाए इसलिए शाम 4 बजे के बाद ठाम चौविहार एकाशना करते हैं. मतलब शाम 4 बजे के बाद जब पूजा के वस्त्र बदलकर सादे वस्त्र पहनते हैं तब वे एक ही जगह बैठकर एक ही समय आहार और पानी लेकर शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति कर लेते हैं.
इसके बाद सीधे अगले दिन बैठेंगे तब मुंह में पानी या अन्न का दाना जाएगा. लगातार 10 साल से वे इसी तरह रोजाना ठाम चौविहार एकाशना करके प्रभु भक्ति करते हैं.
एक बार उनसे गुरु भगवंत ने पूछा कि ‘कितने जिनालयों में भक्ति हो जाती है?’ उन्होंने कहा कि ‘साहेबजी 13 जिनालयों में और उसमें भी अष्ट धातु की प्रतिमा बड़ी संख्या में होने से उसकी पूजा में करीबन करीबन उपेक्षा होती देखी है, इसलिए उन सभी प्रभुजी की भक्ति प्राथमिकता से करता हूँ.
शुरू शुरू में तो दोपहर 12 बजे के बाद सभी जिनालय मंगल (बंद) हो जाने से दिक्कत आ रही थी लेकिन ट्रस्टीयों से बातचीत करके उन्हें समझाकर उन जिनालयों की चाबी प्राप्त करली ताकि एक भी प्रभुजी बिना पूजा के ना रह जाएं.’
गुरु भगवंत ने पूछा कि ‘कभी शारीरिक प्रतिकूलता हो तब क्या करते हो?’ उन्होंने बताया कि ‘प्रभु की कृपा से 10 साल में कभी ऐसी समस्या नहीं आई है.’
अब सबसे बड़ा प्रश्न गुरु भगवंत ने पूछा कि ‘पूरा दिन पूजा में पूर्ण हो जाता है तो आर्थिक व्यवस्था किस तरह चलती है?’
उन्होंने कहा कि ‘मेरे सेठ जैन है. शाम को एकाशना करने के बाद मैं Accounts का काम कर लेता हूँ. कभी कभी महीने में एक दो दिन ज्यादा काम हो तो मेरा बेटा 2-3 घंटे पूजा का काम संभाल लेता है. आज भी मेरे इस कार्य में रोजाना बेटा 2-3 घंटा हाथ बंटाता है.
पत्नी भी सभी तरह की अनुकूलता कर देती है, श्राविका ने मुझे इस कार्य में हमेशा साथ दिया है. जो आय होती है उससे हमारे परिवार की जरुरत बहुत अच्छे से पूर्ण हो जाती है और परमात्मा की करुणा से मुझे कभी कम पडा नहीं और कम लगा भी नहीं.’
अल्पेश भाई के पास शायद कोई बड़ी गाडी, बंगला आदि सुख सुविधा नहीं होगी, Normal जीवन जी रहे होंगे, कोई बड़ा Bank Balance नहीं होगा, आम आदमी की तरह का ही जीवन होगा लेकिन फिर भी इनसे पूछेंगे कि क्या आप खुश है तो वे कहेंगे अत्यंत खुश है, अत्यंत सुखी है.
क्योंकि जीवन में Satisfaction है, परिवारजनों में भी संतुष्टि का गुण है.
कहते हैं न जो प्राप्त है वही पर्याप्त है.
पूज्य धैर्यसुंदर विजयजी महाराज साहेब और अल्पेश भाई बचपन में तपोवन संस्कारधाम, नवसारी में दोनों एक ही कमरे में रहते थे, एक ही कक्षा में साथ साथ पढ़ते थे. गुरु भगवंत ने उन्हें पूछा कि ‘क्या यह प्रभु भक्ति आगे भी जारी रखने का विचार है?’ उनका जवाब था कि
यह प्रभु भक्ति मैं कहाँ कर रहा हूँ? यह तो प्रभु करवा रहे हैं और जब तक करवाएंगे तब तक करता रहूँगा.
10-10 साल से ऐसे भीष्म कार्य को करना और अपने भावों को बढाते रहना, उसका श्रय भी परमात्मा की कृपा को देना यह इस युग में, पंचम आरे में चमत्कार से कम नहीं है.
जिनशासन के इस गहरे समंदर में अल्पेश भाई जैसे कई ऐसे कीमती हीरे हैं, जिनके बारे में शायद हम में से बहुत कम लोग जानते होंगे लेकिन जिनशासन के ऐसे Heroes पर हमें गर्व है.
कभी सूरत जाना हो तो गोपीपुरा विस्तार में एक से एक तीर्थों के दर्शन पूजा भक्ति का लाभ अवश्य लीजिएगा. कोई न कोई जिनालय में अल्पेश भाई मिल ही जाएंगे.
गुरु भगवंत कहते हैं कि Competition और Comparison के इस युग में लोगों के बंगले-गाडी और तरक्की देखने पर भी मन में किसी भी प्रकार की दीनता या चिंता की बात तो दूर, उल्टा चेहरे पर उत्साह, उल्लास और आनंद भर भर के दिखता है वह काबिल-ए-तारीफ़ है.
धन्य प्रभु भक्त..
धन्य प्रभु भक्ति..
धन्य जिनशासन..
Source : Dharma Premi Sandesh Magazine
Writer : P.Pu. Panyas Pravar Dhairyasundar Vijayji M.Sa.