Is Our Dharma Becoming Camera-Centric? What Navsari Did Differently..

क्या हमारा धर्म Camera Centric होते जा रहा है?

Jain Media
By Jain Media 48 Views 11 Min Read

क्या हम धर्म जी रहे हैं या बस दिखा रहे हैं? 

आज कुछ कड़वी बातें होगी लेकिन जगाने के और चिंतन के उद्देश्य से। 

जैन धर्म में एक व्यक्ति 47 Days की Special आराधना करता है जिसे कहते हैं उपधान। सरल भाषा में कहे तो उपधान में एक व्यक्ति 47 Days तक जैन साधु-साध्वीजी भगवंत के जैसे ही रहता है। 

कई प्रकार के नियम होते हैं जैसे कि Minimum 21 उपवास, 8 आयम्बिल करने होते हैं, रोज़ 100 लोगस्स का काउसग्ग करना, 100 खमासमण देने आदि। यदि व्यक्ति 47 Days की यह साधना का Target Achieve करता है तो उसे पूज्य गुरु भगवंत के हाथों से मोक्षमाला प्राप्त होती है।

मोक्षमाला के दिन उस आराधक के परिवार वाले, Relatives, Friends वगैरह सब आते हैं और बहुत भाव से मोक्षमाला को देखते हैं। इस दौरान देखनेवाले के भी भावों में परिवर्तन आता है। 

बात करें आज की तो समय के साथ साथ बहुत Advancements हो रहे हैं। कुछ Advancements अच्छे भी हो सकते हैं लेकिन कुछ के बारे में सच में विचार करने जैसा लगता है।

मानो या ना मानो लेकिन अभी हमारे कई कार्यक्रम Camera Centric होते जा रहे हैं। दीक्षा की बात करें तो मान लो दीक्षा में 4000-5000 लोग अपना काम वगैरह छोड़कर आते हैं। उनकी साँसे थम जाती है कि आज आँखों से Live दीक्षा देखने को मिलेगी।

लेकिन उस समय में 4-5 Cameraman, 10-15 लोग उस दिक्षार्थी को घेर लेते हैं, Stage पर भी कई बार अनुशासन की कमी होने के कारण बेचारी जो Public आई होती है उन्हें कुछ दिखता ही नहीं

Cameraman या फिर ये लोग बुरे हैं ऐसा नहीं है, वे तो अपना काम कर रहे हैं। किसी का भी Intention गलत नहीं है। सबकी यही सोच होती है कि अच्छे से अच्छे Shots आए, Photos आए तो हम WhatsApp, Social Media में Circulate करेंगे।

ये सब एकांत से बुरा है या गलत हैं हम ऐसा नहीं कह रहे हैं लेकिन अगर हम इस तरह से आनेवाली Public को Ignore करके, Side में रखकर Camera Centric होकर आगे बढ़ते गए तो वह दिन दूर नहीं जब धीरे धीरे लोग आने ही बंद हो जाएंगे। 

और वे कह देंगे कि ‘अरे भाई, उधर कुछ दिखता ही नहीं है। एक काम करो आप Live Link भेज दो या Video भेज देना। हम बाद में शांति से पूरा कार्यक्रम Phone पर देख लेंगे।’ 

उपधान के बाद जो मोक्षमाला होती है उसमें भी ऐसा ही कुछ देखने को मिलता है। लेकिन एक जगह पर उपधान की मोक्षमाला का ऐसा कार्यक्रम हुआ है जहाँ सिर्फ First Row वालों ने नहीं बल्कि पूरी सभा ने कार्यक्रम अच्छे से और भाव से देखा। 

नवसारी की यह घटना है। राजप्रतिबोधक परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय रत्नसुंदरसूरीश्वरजी महाराज साहेब के शिष्यरत्न परम पूज्य पंन्यास श्री भव्यसुंदर विजयजी महाराज साहेब की निश्रा एवं श्री नवसारी आदिनाथ श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ के तत्त्वावधान में हुए उपधान की कुछ अद्भुत बातें जानने को मिली है। 

इन बातों को सुनने के बाद शायद हम कहेंगे कि मोक्ष मालारोपण का प्रसंग हो तो ऐसा हो क्योंकि इस पूरे प्रसंग में :  

1. जब नाम, लाभार्थी, Camera वगैरह सब Main मंच से हट गए तब धर्म सामने आया। Stage के ऊपर परमात्मा, गुरु भगवंत, आराधक और संचालक के अलावा कोई और नहीं था। 

ना कोई लाभार्थी, ना कोई आराधक के Relatives, Friends वगैरह और ना ही कोई Cameramen थे। इसका परिणाम यह आया कि जितने भी लोग उधर आए थे उन्हें मालारोपण की पूरी क्रिया अच्छे से, Live देखने को मिली। 

हर आराधक की माला के दर्शन हुए। उस घटना के भावुक क्षण सभी के ह्रदय में स्थिर हो गए। 

2. Normally ये होता है कि जिस जिस आराधक की माला हो जाती है वैसे वैसे उसके परिवारवाले या Relatives उधर से निकल जाते हैं लेकिन यहाँ पर जितने दर्शक 1st माला के वक्त सभा में उपस्थित थे, उतने ही दर्शक अंतिम माला के वक्त भी सभा में उपस्थित थे। 

वहां पर पूज्य गुरु भगवंत ने बहुत सुंदर बात कही कि “यदि आप अपने ‘स्वजन’ की माला के दर्शन करके चले जाएंगे तो सामान्य पुण्यबंध होगा, क्योंकि आपके ह्रदय में आराधना की Priority नहीं बल्कि आपका उस स्वजन के साथ जो Relation है, व्यवहार है उसकी Priority है। 

इसलिए अगर आप सभी आराधकों की माला के दर्शन करेंगे तो पुण्यानुबंधी पुण्य का बंध होगा जो शायद हमें मोक्ष तक लेकर जाएगा क्योंकि इस Situation में ह्रदय में आराधना की Priority होगी।”

लोगों के दिमाग में बहुत अच्छे से यह बात में बैठ गई जो की एकदम Logical भी थी।

3. सभा के दौरान पूज्य गुरु भगवंत ने आराधकों की विशिष्ट आराधनाओं की बातें सभी को कही जिससे उपस्थित सभी दर्शक अनुमोदना के भावों में एकदम खो गए।

ना तो कोई लाभार्थी का नामा लिया गया, ना ही कोई आराधक के परिवार का नाम लिया गया। ना यह कि कौनसे आराधक ने कितनी माल ली है अथवा कितने रुपये में ली है इत्यादि ऐसी कोई भी बात नहीं की गई।

इस माहौल में आराधक और उनका परिवार भी भूल गया कि उनकी माला कब है किस क्रम से हैं। इस कारण से 1st मोक्षमाला पहनने वाले को जितना आनंदउल्लास था, उतना ही आनंद आखरी मोक्षमाला पहनने वाले को था।

कुलमिलाकर आराधना की प्रधानता थी, माला के क्रम की या रुपयों की नहीं। 

पूज्य भव्यसुंदर विजयजी महाराज साहेब की निश्रा में इससे पहले हुए महसाणा और शाहपुर के उपधान में भी जो मोक्षमाला के प्रसंग हुए उसमें भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला था।

Personal Experience

आज से कुछ समय पहले एक उपधान के मोक्षमाला के कार्यक्रम में जाना हुआ था। वहां पर एक से एक अद्भुत प्रवचनकार गुरु भगवंत बिराजमान थे। उनकी निश्रा में उपधान हुआ था। अब मोक्षमाला के दिन कम से कम 3-4 हज़ार लोग आए होंगे।

माला के ठीक 2 घंटे पहले सब लोग सभा में बैठ गए थे। मैं भी वहां पर बैठ गया था.. यह समय एकदम Primetime होता है। ऐसा लगा कि अब महात्मा ज़रूर इस अवसर का उपयोग करके प्रभु के वचन लोगों तक पहुंचाएंगे यानी प्रवचन देंगे। 

लेकिन वहां पर बहुमान कार्यक्रम शरू हुआ और 2 घंटे तक Non-Stop सिर्फ लोगों का बहुमान हुआ और Public को उसमें कोई Interest नहीं था, कोई लेना देना नहीं था, सब अपने में मस्त थे उधर ऐसे ऐसे लोग आए हुए थे जो शायद ही कभी मंदिर या उपाश्रय चढ़ते भी है। 

तो यह अवसर था, एक Golden Chance था उन लोगों तक भी धर्म को पहुंचाने का लेकिन Unfortunately वहां पर यह Golden Chance को Utilize नहीं किया गया। हजारों लोग बैठे थे.. लेकिन दिल खाली थे और मंच व्यस्त। 

इस कार्यक्रम के बाद निश्रादाता पूज्य गुरु भगवंत से मिलना हुआ तो मैंने विनंती कि महाराज साहेबजी इस कार्यक्रम में तो ऐसे ऐसे लोग आते हैं जो Rarely प्रवचन वगैरह सुनते हैं तो इस Case में आपका अगर व्याख्यान यहाँ होता तो उन तक भी धर्म पहुँचता ऐसा लगा।

तो पूज्य गुरु भगवंत ने सुंदर उत्तर दिया।

उन्होंने कहा कि ‘मेरी भी बहुत भावना थी कि आए हुए सभी लोग प्रभु के धर्म को पाए लेकिन इतना समझ लो जब तक आप लोग अपने नाम की कामना से ऊपर नहीं उठेंगे तब तक आप लोग यह बहुमान, इसका नाम नहीं लिया, अरे उसका नाम नहीं लिया। 

इन सब से ऊपर नहीं उठ पाएंगे और जब तक इससे ऊपर नहीं उठेंगे तब तक प्रभु के वचन उन लोगों तक नहीं पहुँच पाएंगे।’ 

अब मान लो आगे भविष्य में ऐसे किसी कार्यक्रम में जाना हो जहाँ पर नवसारी जैसे भावों का माहौल देखने को ना मिले तो उधर आयोजकों की या गुरु भगवंतों की निंदा तो नहीं ही करनी है लेकिन हाँ अपनी अपनी कोशिश ज़रूर कर सकते हैं।

आज का वातावरण देखकर ऐसा लगता है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन लोग कार्यक्रम ने नहीं आएंगे बस Link मांगेंगे। कुलमिलकर हमें यह तय करना होगा कि हमें लोगों के दिलों तक पहुंचना है या सिर्फ Screens तक। 

अगर हम भावों को Priority देंगे तो शायद किसी दिन यह कहना ही ना पड़ेगा “भाई अब पहले जैसा माहौल नहीं रहा।” क्योंकि धर्म हमेशा शोर में नहीं मिलता वो अक्सर वहां मिलता है जहाँ पर विनम्रता, अनुशासन, आराधना और भाव साथ बैठे हो। 

अगर हम इन चीज़ों को बचा पाए तो आने वाली पीढियां भी धर्म देखेंगी वरना बस Videos देखती रह जाएगी। 

अब फैसला हमें करना है – “धर्म देखना है या धर्म महसूस करना है..?”

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