सेवा की विनंती
गुजरात के डीसा संघ में 3 साध्वीजी भगवंत बिराजमान थे। उस समय श्री डीसा संघ के कुछ श्रावकों ने यह 3 साध्वीजी भगवंतों के पास जाकर विनंती की कि ‘साहेबजी! एक ख़ास कार्य के लिए आपसे विनंती करने के लिए आए हैं।
यहाँ अपने डीसा में ही, आप ही के समुदाय के जो 3 साध्वीजी भगवंत बिराजमान है। उनमें से एक साध्वीजी भगवंत की दोनों Kidneys Fail हो गई है।
उन्हें Operation के लिए उन्हें आज ही Hospital लेकर गए हैं। आप अगर इस कार्य में सहायता करेंगे तो उन साध्वीजी भगवंतों को थोड़ी राहत मिलेगी।’
यह 3 साध्वीजी भगवंत राजस्थान से पाटन की तरफ चौमासा करने के लिए जा रहे थे। रास्ते में डीसा जाने का निर्णय लिया था यह सोचकर कि बहुत समय पहले डीसा में एक बार चातुर्मास किया था।
और वहां अभी अपने ही समुदाय के साध्वीजी भगवंत बिराजमान है तो दर्शन, वंदन आदि करके आगे विहार कर लेंगे, लेकिन उनमें से एक साध्वीजी भगवंत की तबियत इतनी ख़राब चल रही है वह इन्हें खबर नहीं थी।
यह 3 साध्वीजी भगवंत उसी दिन 16 KM का उग्र विहार करके डीसा पहुंचे थे और श्रावकों ने आकर वह साध्वीजी भगवंत की सहाय करने की विनंती की।
यह 3 साध्वीजी भगवंतों में से एक साध्वीजी भगवंत जिन्हें उनकी सहायता के लिए जाना था, वे थोड़े चिंता में आ गए क्योंकि जो साध्वीजी भगवंत को हॉस्पिटल लेकर गए थे उनका स्वभाव बहुत तेज था, इसलिए उनसे इन्हें गभराहट हो रही थी।
भूतकाल में जब यह साध्वीजी उनके साथ रहे थे तब उनके तेज स्वभाव से डर गए थे और कह दिया था कि ‘मैं अन्य सभी साध्वीजी भगवंत की सेवा कर लुंगी लेकिन यह साध्वीजी के पास जाने से मुझे डर लगता है।’
आज वह घड़ी फिर से आई।
भाव में बदलाव
पता नहीं किस तरह से लेकिन यह साध्वीजी भगवंत के अचानक भाव पलट गए और डीसा में मौजूद वह 3 साध्वीजी भगवंतों से कह दिया कि ‘यह सेवा का लाभ आप मुझे दीजिएगा।’
अगले दिन सुबह में नवकारसी वगैरह करके यानी थोडा आहार ग्रहण करके यह साध्वीजी भगवंत एक डेढ़ KM दूर रही हॉस्पिटल में उन साध्वीजी भगवंतों के साथ गई।
जो साध्वीजी भगवंत साथ में गई थी उनके गुरुनी वगैरह उपाश्रय में ही रुक गए थे क्योंकि पीछे के कार्य भी संभालने थे।
यह सहाय करनेवाली साध्वीजी भगवंत के लिए गोचरी हॉस्पिटल में लानी ना पड़े इसलिए रोज़ तीनो समय यह साध्वीजी भगवंत उपाश्रय में जाकर गोचरी वापरते और फिर से हॉस्पिटल आते।
वह ग्लान साध्वीजी भगवंत यानी बीमार साध्वीजी का एक दिन Dialysis होना था।
तो डॉक्टर ने यह साध्वीजी भगवंत को पूछ लिया कि ‘महाराज जी, आप उम्र में बहुत छोटी लगती है, क्या यह पूरा Process आप देख पाएंगे?’ यह साध्वीजी भगवंत ने हाँ कहा और 2-3 घंटे तक चली यह प्रक्रिया उन्होंने अपनी आँखों से देखी।
जितने दिनों तक वह विहार करके आनेवाली 3 साध्वीजी भगवंत का डीसा में रुकना हुआ उतने दिनों तक यह साध्वीजी भगवंत ने हॉस्पिटल जा जाकर अद्भुत सेवा की, भक्ति की।
गजब की जागरूकता
यह साध्वीजी भगवंत ने उन ग्लान साध्वीजी के बारे में जो बातें बताई वह जानकर हमारे रोंगटे खड़े हो जाएंगे।
वह ग्लान साध्वीजी रोज़ खुद ही प्रतिक्रमण कर लेते थे। कभी कभी तो दोपहर में जब वे उठते तो तुरंत कहते कि ‘मुझे पहले प्रतिक्रमण करवाओं और पच्चक्खान करवाओं।’
अगर अन्य साध्वीजी नहीं कराते तो खुद से कर लेते थे। एक दिन तो चौदस का प्रतिक्रमण उन्होंने खुद से ही कर लिया। उस दिन तो अन्य साध्वीजी भगवंत ने उनका अतिचार-पक्खी सूत्र गौर से सुना।
उन्होंने एकदम Perfect बोला।
उनकी यह जागृति देखकर तो अन्य सभी साध्वीजी भगवंत हैरान थे। फिर कुछ दिनों के बाद यह सेवा देने आए साध्वीजी भगवंत ने अपनी गुरुनी के साथ विहार कर दिया।
अफ़सोस.. एक हफ्ते के बाद खबर आई कि वे साध्वीजी भगवंत नहीं रहे, उनका कालधर्म हो गया है यानी देवलोकगमन हो गया है।
समाधिभाव से समाधिमरण
यह साध्वीजी भगवंत जिन्होंने इस अंत समय में उनकी सेवा की थी उन्होंने उस सेवा में मिले आनंद के साथ परमात्मा को प्रार्थना की कि
प्रभु.. मरण के समय ऐसी बीमारी देनी हो तो भले देना, उसकी कोई फ़िक्र नहीं, कोई डर नहीं.. लेकिन एक ही शर्त है! उस बीमारी के साथ साथ यह श्रमणी भगवंत जैसी जागृति अवश्य देना।
मृत्यु जीवन का अटल नियम है और जो उस नियम को नहीं जानता वह मृत्यु को जीत नहीं पाता है। मृत्यु को जीते बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता है और आत्मा की संपूर्ण शांति मोक्ष के अलावा और कहीं भी नहीं है।
इतनी पीड़ा फिर भी मन को पीड़ा नहीं, सिर्फ और सिर्फ समाधिभाव यह कैसे Possible है?
बिना Practice के समाधि नहीं मिलती और इसलिए ही जिसने जीवन में समाधि रखी होती है, वह ही मरण के समय समाधि रख सकता है..
हाँ एक और चीज़..
किसी के जीवन में क्रोध दिखे, तो उसके साथ ही कोई ना कोई गुण भी उसके जीवन में छुपे होते ही है। सिर्फ उस क्रोध को देखने की आदत को दूर कर गुणों को देखने की आदत जीवन में आनी चाहिए।
एक साध्वीजी भगवंत के अंत समय में उनकी जागृति देखकर कहने का मन होता है..
“धन धन मुनिवरा..”


