महापुरुष विष्णुकुमार की रोचक कथा.
जैन दर्शन में दर्शन-ज्ञान और चारित्र जिन्हें रत्नत्रयी कहा जाता है, उनकी निर्मल आराधना-साधना के फलस्वरूप आत्मा में अनेक प्रकार की लब्धियाँ / सिद्धियाँ पैदा होती हैं और यदि खुद के स्वार्थ के लिए या मान-सम्मान या प्रतिष्ठा पाने के लिए उस लब्धि का प्रयोग किया जाए तो वह आत्मा के लिए सही नहीं होता है.
लेकिन शासन के हित के लिए अगर उस लब्धि का प्रयोग किया है तो स्व-पर का कल्याण होता है, ऐसा कहा गया है.
आज हम भरहेसर सज्झाय के महापुरुष विष्णुकुमार की कथा जानेंगे जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से अपनी लब्धि का प्रयोग शासन की सेवा के लिए किया था.
बने रहिए इस Article के अंत तक.
दीक्षा स्वीकार
भरत क्षेत्र के हस्तिनापुर नगर में पद्मोत्तर राजा का राज्य था और उनकी ज्वाला नामक महारानी थी. एक बार ज्वाला महारानी ने रात के समय में सपने में केसरी सिंह देखा और वे बहुत खुश हुई और कुछ समय बीतने पर ज्वाला रानी ने एक तेजस्वी पुत्ररत्न को जन्म दिया जिसका नाम विष्णुकुमार रखा गया.
धीरे-धीरे समय व्यतीत होने लगा और एक शुभ रात में रानी ने धुंधले यानी Blur 14 महास्वप्न देखे जो कि चक्रवर्ती के जन्म का सूचन है. गर्भकाल पूर्ण होने पर रानी ने पुत्ररत्न को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया महापद्म.
उम्र के साथ साथ विष्णुकुमार और महापद्म का ज्ञान बढ़ने लगा. इधर उज्जयिनी नगरी में श्रीवर्म नाम का राजा था और नमुचि नाम का उसका मुख्य मंत्री था जो जैन धर्म का अत्यंत ही द्वेषी था यानी यह नमुचि जैन धर्म से नफरत करता था.
एक बार 20वे तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रतस्वामी प्रभु के हाथों से दीक्षा स्वीकार करनेवाले सुव्रत आचार्य अपने विशाल मुनि परिवार के साथ उज्जयिनी नगरी में पधारे. नमुचि के हृदय में जैन मुनियों के प्रति नफरत भरी हुई थी इसलिए आचार्य भगवंत को हराने के लिए वह उनके पास आया और जैसे-तैसे बकवास करने लगा.
एक बाल मुनि ने नमुचि को Debate में हरा दिया और हारने से दुःखी हुआ नमुचि रात के समय में द्वेष भाव से बालमुनि को मारने के लिए उपाश्रय में आया लेकिन शासन देवी ने उसे तुरंत स्तंभित यानी Statue कर दिया.
सुबह होने पर राजा व अन्य लोगों ने नमुचि को उस स्थिति में देखा और आखिर उसने माफ़ी मांगी कि जिसके फलस्वरूप वह बंधन से मुक्त बना. इधर सुव्रत आचार्य श्री विहार करते हुए हस्तिनापुर नगर पधारे. उनकी धर्मदेशना को सुनकर पद्मोत्तर राजा के मन में वैराग्य भावना उत्पन्न हुई और वह दीक्षा लेने के लिए तैयार हुआ.
उसने आचार्य भगवंत से विनती करते हुए कहा कि ‘मैं पुत्र को राज्य सौंप कर जल्द ही दीक्षा ग्रहण करने के लिए आपके चरणों में उपस्थित हो जाऊँगा, इसलिए कृपया आप उतने समय तक हस्तिनापुर में ही रुकें.’
आचार्य भगवंत ने राजा से कहा ‘इस कार्य में बिलकुल भी प्रमाद मत करना यानी आलस मत करना.’ राजमहल में आने के बाद पद्मोत्तर राजा ने विष्णुकुमार को बुलाया और उसे राज्य की जिम्मेदारी लेने का आदेश किया.
लेकिन उस समय विष्णुकुमार ने कहा ‘पिताजी, आपकी तरह मेरा भी मन विरक्त बन चुका है. मैं भी इस असार संसार में क्षण भर भी नहीं रहना चाहता हूँ. मैं तो आप ही के साथ मोह के बंधनों का त्याग कर चारित्र धर्म स्वीकार करना चाहता हूँ.’
राज्य ग्रहण करने से इन्कार करने पर पद्मोत्तर राजा ने अपने छोटे पुत्र महापद्म राजकुमार को अपनी राजगद्दी की जिम्मेदारी सौंपी. महापद्म राजा ने अपने पिता और बड़े भाई की दीक्षा का भव्यातिभव्य महोत्सव किया और एक शुभ दिन पिता पद्मोत्तर राजा और पुत्र विष्णुकुमार ने भागवती दीक्षा स्वीकार करली.
नमुचि को वरदान
गुरुदेव के साथ विहार करते हुए, विशुद्ध संयम धर्म के प्रभाव से पद्मोत्तर मुनि ने केवलज्ञान प्राप्त किया और आयुष्य पूर्णकर वे जल्द ही मोक्ष में चले गए. इधर विष्णुकुमार मुनि ने भी उत्कृष्ट तप किया, जिसके प्रभाव से उन्हें अनेक प्रकार की लब्धियाँ मिली.
विष्णुकुमार मुनि कभी भी खुद के स्वार्थ के लिए उन लब्धियों का उपयोग नहीं करते थे.
इधर महापद्म राजा चक्रवर्ती बने और उज्जयिनी नगरी को छोड़कर नमुचि मंत्री हस्तिनापुर में आ गया. अपनी बुद्धि से उसने महापद्म राजा को खुश कर दिया और महापद्म राजा ने उसे अपना मंत्री बना लिया.
एक बार हस्तिनापुर राज्य की सीमा पर सिंहबल नाम का राजा प्रजाजनों को बहुत परेशान कर रहा था. महापद्म राजा ने नमुचि मंत्री से पूछा ‘क्या सिंहबल को वश में करने का कोई तरीका है?’
नमुचि ने कहा ‘आप मुझे आज्ञा दीजिए, मैं खुद जाकर उसे बंदी बना लेता हूँ.’ महाराज की आज्ञा लेकर नमुचि मंत्री ने सिंहबल पर आक्रमण किया और बहुत Easily उसे बंदी बनाकर महाराजा के सामने पेश किया.
सिंहबल को बंदी बना हुआ देखकर महाराजा खुश हो गए और उन्होंने नमुचि को एक वरदान माँगने को कहा. नमुचि ने कहा ‘अभी के लिए आप मेरा वरदान याद रखिएगा, अवसर आने पर मैं वरदान माँग लूंगा.’
एक बार सुव्रत आचार्य अपने मुनि मंडल के साथ चातुर्मास करने के लिए हस्तिनापुर नगर में पधारे. उस समय अपने अपमान का बदला लेने का अवसर देखकर नमुचि ने राजा को कहा ‘राजन्, आपने जो मुझे वरदान दिया था, उस वरदान के रूप में आप मुझे सात दिन का राजा बनाएँ.’
‘प्राण जाए पर वचन ना जाए’ मानने वाले महापद्म ने नमुचि की बात स्वीकार की और उसे सात दिन का राजा बना दिया.
विष्णुकुमार मुनि का आगमन
इधर नमुचि ने नगर के बाहर एक यज्ञ शुरू किया और यज्ञ के अभिषेक प्रसंग पर सभी धर्म के आचार्य उपस्थित हुए लेकिन जैन मुनि नहीं आए.
बदला लेने का मौका मिल गया और नमुचि सुव्रताचार्य के पास आकर गुस्से में बोला ‘यज्ञ के अभिषेक प्रसंग पर सभी धर्म के आचार्य आए परन्तु तुम क्यों नहीं आए? तुम राज्य विरुद्ध चलनेवाले होने से अपराधी हो, इसलिए 7 दिन के अंदर इस नगर को छोड़कर चले जाओ, वरना तुम्हें मार दिया जाएगा.’
आचार्य भगवंत ने अपने परिवार को इकट्ठा किया और संघ-शासन के ऊपर आई हुई इस आपत्ति के निवारण के लिए सोच विचारणा शुरू की. उसी समय एक मुनि भगवंत ने कहा ‘विष्णुकुमार मुनि ने छह हजार वर्ष तक दीर्घ तप किया है. इस तप के प्रभाव से उन्हें अनेक प्रकार की लब्धियाँ प्राप्त हुई हैं.
वे महापद्म राजा के बड़े भाई भी हैं, इसलिए उनके वचन से यह नमुचि अवश्य शांत हो सकता है. इसलिए उन्हें यहाँ बुलाने के लिए किसी लब्धिधारी मुनिराज को मेरुपर्वत पर जाना चाहिए, क्योंकि वे अभी मेरुपर्वत पर ध्यान-साधना कर रहे हैं.’
इस उपाय को सुनकर एक और मुनि भगवंत ने कहा ‘मैं अपनी विद्या के बल से मेरुपर्वत तक जा सकता हूँ लेकिन वहाँ से लौटने की शक्ति मुझ में नहीं है.’ आचार्य भगवंत ने कहा ‘विष्णुकुमार मुनि तुम्हें वापस ले आएंगे, अतः तुम्हें वहाँ जाना चाहिए.’
गुरुदेव की आज्ञा होते ही वे मुनि उसी समय आकाश मार्ग से उड़ते हुए मेरुपर्वत पर आ गए. चातुर्मास के समय में अचानक मुनि के आगमन को देखकर विष्णुकुमार मुनि सोचने लगे ‘चातुर्मास में मुनिगण कहीं भी नगर छोड़कर बाहर नहीं जाते हैं लेकिन ये मुनि यहाँ आए हैं तो अवश्य ही शासन या संघ का कोई जरुरी काम होना चाहिए.’
विष्णुकुमार मुनि को वंदन आदि करने के बाद उन मुनि ने अपने आने का कारण बताया और कारण का पता चलते ही विष्णुकुमार मुनि उन मुनि को साथ लेकर तुरंत ही हस्तिनापुर आ गए.
विष्णुकुमार मुनि द्वारा लब्धि प्रयोग
विष्णुकुमार मुनि ने नमुचि राजा को समझाते हुए कहा ‘जैन मुनि चातुर्मास में कहीं भी विहार नहीं करते हैं और वे घर घर से गोचरी लाकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं, वे चातुर्मास तक यहीं रहें तो आपको क्या तकलीफ है?’
विष्णुकुमार मुनि की यह बात सुनकर गुस्से में आकर नमुचि ने कहा ‘ज्यादा बकवास मत करो, मैं तुम्हें यहाँ रहने नहीं दूंगा.’ अत्यंत समर्थ होते हुए भी विष्णुकुमार मुनि समता और धैर्य धारणकर नमुचि राजा को समझाते हुए बोले ‘यदि तुम्हारी सहमति हो तो वे नगर के बाहर रह जाएंगे.’
गुस्से में आकर नमुचि ने कहा ‘मैं उनकी गंध यानी Smell भी सहन करने के लिए तैयार नहीं हूँ, इसलिए ज्यादा बकवास मत करो. यदि तुम्हें जीवन प्रिय हो तो नगर छोड़कर चले जाओ.’
अंत में विष्णुकुमार मुनि ने कहा ‘अच्छा, तो हमें रहने के लिए तीन कदम भूमि दे दो.’ नमुचि ने कहा ‘लो, मैं तुम्हें तीन कदम भूमि देता हूँ लेकिन तीन कदम से बाहर रहे तो मैं तुम्हें मार डालूंगा.’
संघ और शासन के ऊपर आई हुई इस मुसीबत को देखकर दुष्ट को सजा देने के लिए विष्णुकुमार मुनि ने अपनी लब्धि के बल से अपना शरीर बढ़ाना शुरू किया. अपने विशाल शरीर से पृथ्वी को प्रकंपित यानी Vibrate करनेवाले विष्णुकुमार मुनि ने लब्धि के बल से एक लाख योजन ऊँचा अपना शरीर बना दिया.
उन्होंने अपना एक पैर जंबुद्वीप के पश्चिम यानी West में आए समुद्र के किनारे पर और दूसरा पैर पूर्व यानी East में आए समुद्र के किनारे पर रख दिया जिससे सम्पूर्ण भरत क्षेत्र Cover हो गया.
अब तीसरा Step कहाँ रखूं? ऐसा विष्णुकुमार मुनि ने नमुचि से पूछा और 3rd Step उसके सर पर ही रख दिया जिससे नमुचि मंत्री की मृत्यु हो गयी, जो फिलहाल राजा बना हुआ था.
इस घटना को जानकर महापद्म राजा वहाँ पर आया और अपने बड़े भाई मुनिवर को भावपूर्वक वंदना करके कहा ‘आप लोकोत्तर गुणों के स्वामी हो और मेरे मन मंदिर में बिराजमान हो. यह दुष्ट नमुचि हमेशा संघ व शासन की आशातना हीलना करता आया है लेकिन अभी तक मैं उसके अपराध को जान नहीं सका.
वह दुष्ट पापी मेरा सेवक है इसलिए आप मेरे इस अपराध को माफ़ करें. इस पापी मंत्री के अपराध से सभी डरे हुए हैं इसलिए कृपया आप क्रोध का त्याग करें.’ उस समय कई सुर-असुर तथा चतुर्विध संघ ने भी अलग अलग प्रकार से स्तुति की और विष्णुकुमार मुनि के क्रोध को शांत करने की कोशिश की.
आखिर संघ की प्रार्थना को स्वीकार करके विष्णुकुमार मुनि ने अपना विशाल रूप घटाना शुरू किया और कुछ ही समय बाद वे अपने असली रूप में आ गए.उसके बाद विविध तप की आराधना-साधना करके विष्णुकुमार महामुनि ने घाति कर्मों का क्षय करके केवलज्ञान प्राप्त किया.
अनेक भव्य जीवों को प्रतिबोध देकर अपना आयुष्य पूर्णकर सभी अघाति कर्मों को भी ख़त्म करके विष्णुकुमार महामुनि ने शाश्चत अजरामर मोक्ष पद को प्राप्त किया.
Moral Of The Story
आइए देखते हैं इस अद्भुत कथा की Learnings.
1. जब जब शासन पर आपत्तियां आती है और श्रावक जब उन आपत्तियों को दूर नहीं कर सकते तब साधुओं को भी जिनशासन की सुरक्षा के लिए मैदान में आना पड़ता है. वह अपनी कितनी भी गहरी साधना छोड़कर भी शासन के लिए पहले खड़े होते हैं और उसकी सुरक्षा के लिए किसी भी स्तर तक जाते हैं.
शासन कोई इतनी गिरी हुई चीज नहीं है कि उसके लिए कोई भी कुछ भी बक सके.
2. शासन की निंदा हिलना करनेवालों की कैसी हालत करनी? इसका यह ज्वलंत उदाहरण है. जैनधर्म के प्रति द्वेष, जैनधर्म के प्रति नहीं बल्कि खुद की आत्मा का द्वेष है और ऐसा करनेवाला बहुत ही ज्यादा भारी कर्मी जीव ही होता है. उसकी दुर्गति Fix है.
3. जब साधु भगवंत की साधना गजब की होती है, तब शासन देवी और दूसरे भी देव देवियों की सहायता उनको मिलती है और शासन द्वेषीयों को गहरा सबक सिखाने का काम वह करते हैं.
4. साधु भगवंत की गजब की मर्यादा हमें इस कथा में देखने को मिलती है. जहां धर्म आदि में हिंसा का तांडव हो वहां पर साधु भगवंत हाजरी कभी नहीं देते और वे ‘लोग क्या सोचेंगे?’ इसकी परवाह भी नहीं करते.
जब सिद्धांत VS लोग हो, तो सिद्धांत ही मुख्य होते हैं, लोग नहीं.
लोगों को छोड़कर जीना पड़ता है.