600-700 साल पहले की बात है..
मालवा के जंगल में तेज धूप थी। ग्यासुद्दीन बादशाह अपने परिवार के साथ जा रहा था। धूप इतनी तेज थी कि वे जल्दी से एक बड़े आम के पेड़ के नीचे जाकर खड़े हो गए। परिवार ने तुरंत रोक दिया।
सबने कहा कि ‘इस पेड़ के नीचे मत खड़े होइए, क्योंकि यह वन्ध्य आम का पेड़ है। इस पर कभी फल नहीं लगते।’ बादशाह ने पेड़ को देखा, सच में एक भी फल नहीं था। गुस्से में उन्होंने कहा कि ‘ऐसे निकम्मे पेड़ का क्या काम? इसे उखाड़ दो।’
उसी समय संग्रामसोनी वहाँ पर मौजूद थे। वे बादशाह के महामंत्री और महासेनापति थे और एक दृढ़ जैन श्रावक भी थे। पेड़ को कटता देख उनकी दया जागी। वे आगे बढ़े और बोले कि ‘बादशाह, मैं इस पेड़ से पूछकर आता हूँ कि यह फलेगा या नहीं।’
बादशाह हँसे और बोले कि ‘हाँ, जाओ पूछ लो।’ संग्रामसोनी पेड़ के पास गए, उन्होंने पेड़ को हाथ से स्पर्श किया और कहा कि ‘अगर मेरा शील और सम्यक्त्व सच्चा है, तो यह पेड़ अगले साल फल देगा।’
यह कहकर वे वापस आए और बादशाह से बोले कि पेड़ का कहना है कि ‘अगर वह अगले साल फल नहीं देगा तो बादशाह उसके साथ जो चाहे वह कर सकते हैं।’ बादशाह को यह बात मजाक लगी, लेकिन उसने कहा कि ठीक है, देखते हैं क्या होता है।
अगले दिन संग्रामसोनी अकेले पेड़ के पास वापस गए..
उन्होंने उसके क्यारे को यानी चारों ओर की मिट्टी को दूध से भर दिया और बोले कि ‘मैंने तेरी रक्षा की है, अब तू मेरे वचन की रक्षा करना।’ पास में खड़े माली से उन्होंने कहा कि ‘अगर फल लगें तो मुझे तुरंत सूचना देना।’
एक साल बीत गया..
माली भागता हुआ संग्रामसोनी के पास आया और बोला कि ‘मंत्रिश्वर! मंत्रिश्वर.. पेड़ भरभर कर फल दे रहा है।’ संग्रामसोनी तुरंत वहाँ पर पहुँचे। उन्होंने थाल भरकर आम तोड़े और बादशाह के दरबार में पहुँच गए।
उन्होंने थाल बादशाह के सामने रखा और कहा कि ‘यह उसी पेड़ के आम हैं जिसे आप उखाड़ने का आदेश देने वाले थे।’ बादशाह दंग रह गया। उसने पूरी बात की जाँच करवाई और जांच में सब कुछ सही निकला कि पेड़ सचमुच फल दे रहा था।
पूरा दरबार चकित था..
बादशाह के मन में संग्रामसोनी के लिए सम्मान कई गुना बढ़ गया। संग्रामसोनी एक राजनीतिज्ञ थे। सत्ता, पद, जिम्मेदारियाँ-सब उन पर थीं। फिर भी उन्होंने अपना चरित्र नहीं छोड़ा, ब्रह्मचर्य नहीं छोड़ा, अपनी जैन मान्यताएँ नहीं छोड़ीं।
यही चरित्र और यही सम्यक्त्व आगे जाकर ऐसी संकल्पशक्ति बना कि जिसे लोग असंभव कहते थे, वह संभव हो गया।
आज हम क्या करते हैं?
Status के लिए Character बेच देते हैं और Society के लिए Belief छोड़ देते हैं। ‘सबको अच्छा लगना चाहिए’ इसलिए हम हमारे आचार छोड़ देते हैं और फिर हम बोलते हैं कि ‘जमाना ही ऐसा है।’
सच यह है कि जमाना खराब नहीं, हम कमजोर हो गए हैं।
सवाल एक ही है-हम किसके पुजारी हैं?
Celibacy के या Status के?
ब्रह्मचर्य के या दिखावे के?
सम्यक्त्व के या Show-off के?
सोचने जैसा है…


