गिरनार की अधिष्ठायिका श्री अंबिका देवी की अद्भुत कथा
एक साधारण गृहिणी यानी Housewife आखिर कैसे बनी नेमिनाथ भगवान की अधिष्ठायिका देवी अंबिका?
उसका इतिहास आज हम जानेंगे। प्रस्तुत है Girnar History का Episode 04. बने रहिए इस Article के अंत तक।
अंबिका द्वारा सुपात्रदान
सौराष्ट्र देश के रैवताचल पर्वत के दक्षिण में एक सुंदर नगर था-कुबेरनगर। यह नगर बहुत समृद्ध था, जहाँ हर तरफ सुख समृद्धि, ऊँचे किले, Lotus आदि सुंदर फूलों के Gardens और जैन मंदिरों का वैभव फैला हुआ था।
जिनालयों में अरिहंत प्रभु की भव्य मूर्तियों की पूजा होती थी, अद्बुत वातावरण था। उस समय कुबेरनगर में शत्रुओं को जीतने में शेर जैसे, बिना किसी प्रयास के दान देनेवाले और धर्मनिष्ठ यादववंश के राजा श्री कृष्ण का शासन था।
उसी नगर में देवभट्ट नामक एक ब्राह्मण रहते थे। वे जैन धर्म की भक्ति में हमेशा लीन रहते थे। उनकी पत्नी का नाम था देवल और उनका पुत्र था सोमभट्ट। सोमभट्ट के Young होने पर उसका विवाह सुंदर, शीलवान और जैन धर्म का पालन करनेवाली अंबिका नामक एक कन्या से हुआ।
विवाह के बाद कुछ समय में देवभट्ट ब्राह्मण का निधन हो जाने से उनके घर में जैनधर्म की जगह जैन धर्म से विपरीत परंपराएँ आने लगीं। जैनधर्म में दृढ़ अंबिका भले उस परिवार में रहती थी लेकिन फिर भी वह जैन धर्म में Strong बनी रही।
एक दिन देवभट्ट की Death Anniversary का दिन था। तो उसकी आत्मा की शांति के लिए पूजा पाठ वगैरह रखा गया। उस समय में घर में खीर आदि Special Dishes बन रहे थे। दोपहर के समय में अंबिका के घर मासक्षमण के दो तपस्वी साधु भगवंत गोचरी के लिए आए।
Please Note : मासक्षमण यानी 30 दिन तक Continuous उपवास
वे साधु भगवंत तप और क्षमा से भरे हुए थे। उनके शांत और तेजस्वी चेहरे को देखकर अंबिका बहुत खुश हुई। उसने मन में सोचा
आज के इस पुण्य अवसर पर ऐसे पवित्र मुनियों का मेरे घर आना मेरे बड़े पुण्य का फल है। सासुजी भी पडोसी के घर गई हुई हैं और भोजन भी शुद्ध बना हुआ है, तो क्यों न मैं इन साधु भगवंत को गोचरी वहोराकर सुपात्रदान का अद्भुत लाभ लेकर अपना जीवन धन्य बनाऊं?
अंबिका ने बहुत ही आदर और भावपूर्वक साधु भगवंतों को गोचरी के लिए विनंती की और अत्यंत आनंद के साथ तपस्वी महात्माओं को गोचरी वहोराई। साधु भगवंत अंबिका को ‘धर्मलाभ’ कहकर वहां से चले गए।
अंबिका का दिल खुशी से भर गया और वह बार-बार सोचती रही कि ‘आज मैंने जो पुण्य कमाया है, वह अमूल्य यानी Priceless है।’
अंबिका का अपमान
यह पूरी घटना अंबिका की पड़ोसन ने देख ली। Jealousy और क्रोध में उसने अंबिका को सबके सामने ताने देना शुरू कर दिया ‘अरे। तुम्हें शर्म नहीं आई? आज Death Anniversary का दिन है और पहले अलग अलग स्थान में भोजन देना होता है और तुमने तो उससे पहले ही मुनियों को दान दे दिया? वह भी सर मुंडे साधुओं को?
सास घर पर नहीं है, इसीलिए मनमानी कर रही हो? तुम्हारी इन हरकतों से तो कुल का नाम ही डूब जाएगा।’ पड़ोसन ने सारी बातों में मिर्च-मसाला डालकर उसकी सासुजी को बताया और उसे अंबिका के खिलाफ खूब भड़काया।
सासुजी अंबिका को जोर से डाँटते हुए बोली ‘अरे। मैं अभी जिंदा हूँ और तुमने मुझसे पूछे बिना ही दान दे दिया? तुझे किसने यह अधिकार दिया? तू तो कुल का नाम डुबोने वाली है।’
सास के इन कठोर वचनों को सुनकर अंबिका कांपने लगी लेकिन फिर भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते हुए कुछ नहीं बोली। इसी बीच उसका पति सोमभट्ट घर आया और उसने माँ और पड़ोसन की बातें सुनीं और बिना सच्चाई जाने ही वह भी अंबिका को बुरी तरह डाँटने लगा।
अब तक अंबिका के ऊपर चारों तरफ से कठोर वचन बरस चुके थे। उसका कोई कसूर नहीं होते हुए भी उसकी जमकर Insult की जा रही थी।
आखिरकार उसे Tough Decision लेना पड़ा और उसने अपने दोनों बच्चों को लिया, एक को गोद में उठाया और एक का हाथ पकड़कर अंबिका घर छोड़कर चली गई।
अंबिका का निर्णय
अंबिका का मन बहुत दुखी था।
वह सोच रही थी कि ‘मैंने सास-ससुर को कभी कोई दुःख नहीं दिया, पति की हमेशा सेवा की, कोई भी ऐसा काम नहीं किया जिससे कुल की बदनामी हो फिर भी आज मुझ पर इतना अन्याय क्यों?
Death Anniversary के दिन तपस्वी महात्माओं को शुद्ध भोजन दान देना क्या पाप है? अरे, मैं तो इस पुण्य से स्वयं का कल्याण ही करना चाहती थी और उन्होंने मुझे ही दोषी ठहरा दिया। अब मैं इस मोह के संसार को छोड़कर, जिनशासन की शरण में जाउंगी।
मैं रैवतगिरि पर्वत यानी गिरनारजी महातीर्थ जाऊँगी और वहीं ध्यान और तपस्या करूँगी।’
दोनों बच्चों के साथ अंबिका आगे बढ़ती रही। थोड़े समय बाद गर्मी के कारण और भूख-प्यास से बच्चों की हालत बिगड़ने लगी। उसका छोटा बेटा विभंकर बार-बार ‘पानी-पानी’ कहकर रोने लगा और बड़ा पुत्र शुभंकर, भूख और थकान से बोलने लगा ‘माँ। मुझे बहुत भूख लगी है।’
अपने दोनों बच्चों की यह हालत देखकर अंबिका का दिल बहुत दुखी हो गया और वह सोचने लगी ‘हे परमात्मा। मैं अपने बच्चों की भूख-प्यास भी नहीं मिटा पा रही हूँ। मेरे जीवन में बस दुःख ही दुःख क्यों हैं? शायद मैंने पिछले जन्मों में कुछ भारी पाप किए होंगे जिनके परिणाम में आज ये सब देखना पड़ रहा है लेकिन अब मैं हार नहीं मानूँगी और जिनेश्वर परमात्मा की शरण में ही रहूँगी।’
दोनों बच्चों के साथ अंबिका एक पेड़ के नीचे बैठी। कुछ समय बाद उसे सामने एक ठंडे जल से भरा हुआ तालाब दिखा और एक आम के पेड़ की पकी डाल उसकी ओर झुक गई।
अंबिका ने तुरंत बच्चों को पानी पिलाया और आम खिलाए और सोचा कि ‘इस कठिन समय में भी मुझे यह फल और पानी मिला, यह मेरे सुपात्रदान का ही फल है।’
अंबिका का अंतिम समय
इस तरफ, अंबिका की सास देवल ने मुनिदान को अपवित्र मानकर भोजन के सारे बर्तन दोबारा देखने शुरू किए ताकि नया भोजन बनवाया जाए और जैसे ही उसने बर्तनों के ढक्कन खोले तो वह हैरान रह गई।
क्योंकि जिस तरह पारस के छूने से लोहा सोना बन जाता है, उसी तरह सुपात्रदान के प्रभाव से वे बर्तन सोने जैसे चमक उठे थे और भोजन अब भी पूरी तरह भरा हुआ था।
देवल को विश्वास नहीं हुआ और उसने सोचा ‘अरे। मैंने कितनी बड़ी गलती कर दी। जिस बहू को लक्ष्मी की तरह घर में रखना चाहिए था, उसे मैंने बिना कसूर के घर से निकाल दिया।’
उसी समय आकाशवाणी हुई ‘अरे अभागिन। अभी तो तूने अंबिका के सुपात्रदान का बस एक छोटासा परिणाम देखा है। सुपात्रदान के फल से अंबिका, इन्द्र महाराजा के लिए भी पूजनीय बनेगी।’
यह सुनते ही देवल ने तुरंत अपने बेटे सोमभट्ट को कहा ‘बेटा। अंबिका को ढूंढ ला, हमने उसके साथ अन्याय किया है। वह देवी के जैसी स्त्री है।’
अब सोमभट्ट को अपनी गलती का गहरा अहसास हुआ और वह पश्चाताप से भर गया और वो तुरंत अंबिका को ढूंढने के लिए नगर से बाहर जंगल की ओर चल पड़ा। कुछ दूर चलने के बाद, उसने देखा कि अंबिका दोनों बच्चों के साथ एक रास्ते पर जा रही है।
वह दौड़ता हुआ ज़ोर से बोला ‘अंबिका। रुक जाओ, मैं आ रहा हूँ।’ लेकिन अंबिका को उसकी आवाज़ साफ़-साफ़ सुनाई नहीं दी। उसे बस इतना महसूस हुआ कि कोई पीछे से तेज़ी से उसकी तरफ़ आ रहा है।
वह डर गई और सोचने लगी ‘यह जरुर मुझे मारने आया है। इस सुनसान जंगल में मेरी रक्षा कौन करेगा? पता नहीं यह मुझ पर कैसा अत्याचार करे? इससे बचने का अब एक ही रास्ता है, मौत।’
अंबिका जहाँ खड़ी थी उसके पास ही एक कुआँ था और वह उस कुए के पास पहुँची। अंबिका ने मन में प्रभु की शरण ली ‘श्री अरिहंत भगवंत की मुझे शरण हो, श्री सिद्ध भगवंत की मुझे शरण हो, श्री साधु भगवंत की मुझे शरण हो, श्री जिनधर्म की मुझे शरण हो।’
फिर उसने भावपूर्वक प्रार्थना की ‘मुझे फिर कभी पापी कुल, अधर्मी स्थान या मिथ्यात्व के प्रभाव में जन्म न मिले, न कभी मूर्खता, दरिद्रता, पाप का व्यापार, या जीव हिंसा में पड़ूँ।
मेरे अगला जन्म जैनधर्म का पालन करनेवाले, दानी, ज्ञानी, विवेकी और पुण्यात्मा कुल में हो। इन उत्तम भावों से भरी अंतिम प्रार्थना करते हुए अंबिका दोनों बच्चों के साथ कुएँ में कूद गई।
सोमभट्ट भागता हुआ कुएँ के किनारे पहुँचा लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। वह फूट-फूटकर रोने लगा और उसने सोचा ‘मैं कैसा पापी हूँ। जिस पत्नी में देवी का तेज था, जिस पुत्रों में भविष्य का सपना था, उन्हें मैंने अपने ही हाथों खो दिया।’
उसने भी अंबिका को याद करते हुए कुएँ में छलांग लगा दी। सुपात्रदान का प्रभाव कैसा होता है, वह अब जानेंगे।
अधिष्ठायिका अंबिका देवी
अंबिका अपने दोनों बच्चों के साथ सुपात्रदान के अद्भुत प्रभाव से व्यंतर देवी के रूप में जन्मी और वहीं सोमभट्ट यानी अंबिका के पति का जन्म शेर के रूप में हुआ, जो अंबिका देवी का वाहन बना।
अंबिका देवी का रूप अद्भुत था सोने की तरह चमकता हुआ शरीर, रत्नों के गहनों से सजी हुई, एक बच्चा गोद में था और दूसरा पास खड़ा था और अंबिका देवी वनकेसरी सिंह पर विराजमान थीं, वही सिंह यानी शेर जो अब उनके पति सोमभट्ट का रूप था।
अंबिका देवी ने जैनधर्म के अनंत उपकारों को स्मरण किया और वे देवों द्वारा बनाए गए दिव्य विमान में बैठकर चारों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई रैवतगिरि पर्वत यानी गिरनार महातीर्थ पहुँची।
आसोज वदि अमावस्या का दिन था, ‘सहसावन’ नामक सुंदर वन में श्री नेमिनाथ प्रभु को केवलज्ञान प्राप्त हुआ था और देवों ने करोड़ों की संख्या में आकर समवसरण की रचना की। सभी जीव देव, मनुष्य, तिर्यंच वहाँ आकर प्रभु को वंदन करके देशना सुनने के लिए बैठे।
श्री नेमिनाथ प्रभु ने पहली देशना दी कि ‘धर्मो जगद्बन्धुरकारणेन,
धर्मो जगद्वत्सल आतिहर्ता।
क्षेमंकरोऽस्मिन् भुवनेऽपि धर्मो,
धर्मस्ततो भक्तिभरेण सेव्यः।।’
यानी धर्म ही संसार का सबसे बड़ा हित करने वाला है यानी धर्म ही सभी का सबसे बड़ा Well Wisher है। धर्म दुखों को दूर करता है इसलिए श्रद्धा और भक्ति से धर्म को अपनाना चाहिए।
प्रभु ने आगे समझाया कि ‘धर्म एक कल्पवृक्ष है जिसका बीज है सम्यक्त्व, शाखाएँ है-दान, शील, तप और भाव, पत्ते हैं करुणा, विनम्रता और आस्तिक्य।
पुष्पांकुर यानी फूल के Buds है सिद्धाचल, गिरनार आदि तीर्थसेवा, तीर्थंकर परमात्मा की पूजा, सद्गुरु भगवंतों का सत्संग और पंचपरमेष्ठि मंत्र यानी नवकार मंत्र, फूल है-स्वर्ग सुख और फल है मोक्ष सुख।’
श्री नेमिनाथ प्रभु की देशना सुनकर सभी धर्म में दृढ़ बने। प्रभु की देशना सुनकर वैराग्य को पाए हुए राजा पुण्यसार ने अपने हजारों सेवकों के साथ दीक्षा ली और वे नेमिनाथ प्रभु के प्रथम गणधर बने।
यक्षिणी नामक राजकुमारी, दीक्षा लेकर प्रभु के शासन की प्रथम साध्वीजी बनी। श्री नेमिनाथ प्रभु के चचेरे भाई यानी श्रीकृष्ण महाराजा, बलभद्र जैसे महापुरुष और उनकी पत्नियाँ भी श्रावक और श्राविकाएं बने।
उस समय इन्द्र महाराज ने परमात्मा की आज्ञा लेकर अंबिका देवी को श्री नेमिनाथ परमात्मा के शासन की विघ्ननाशिनी अधिष्ठायिका देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया और जो गोमेध यक्ष पहले श्री नेमिनाथ प्रभु की वाणी से प्रभावित होकर धर्म में जागा था, उन्हें शासन का अधिष्ठायक देव बनाया गया।
तो इस तरह अंबिका एक Housewife, जिसके मन में सुपात्रदान के लिए गहरी श्रद्धा और जैनधर्म के प्रति अटूट समर्पण था, वही अडिगता और समर्पण ने एक आम गृहणी को श्री नेमिनाथ परमात्मा के शासन की अधिष्ठायिका श्री अंबिका देवी बना दिया।
Moral Of The Story
यह कथा हमें दो बहुत Important चीजें सीखाती है कि
1. संसार हमें गिरा सकता है, लेकिन धर्म हमें ऊपर उठाने की ताकत रखता है। यह कहानी इसका जीता-जागता उदाहरण है।
2. कभी-कभी देवी बनने के लिए तलवार नहीं, श्रद्धा चाहिए होती है।
क्या आज हमारे अन्दर हमरे धर्म के प्रति, शासन के प्रति उतनी ही अडिग श्रद्धा है? वह खुद से पूछने जैसा है।
अगले Episode में हम गोमेध यक्ष की कथा जानेंगे।


