हमारा किया हुआ धर्म कब हार जाता है?
एक व्यक्ति एक साल तक भूखा खड़ा रहा, उसके शरीर पर लताएँ चढ़ गई, गर्मी ठंडी सब कुछ सहन किया फिर भी उसे जो चाहिए था वह उसे मिला नहीं।
आखिर क्यों?
प्रस्तुत है, आगम ज्ञानी बनो Series के अंतर्गत उपदेशमाला ग्रंथ का Episode 17.
Episode 16 में हमने यह देखा कि जिस समय पर शुभभाव, उस समय पर पुण्यबंध, जिस समय पर अशुभभाव उस समय पर पापबंध। अब अगर पापबंध से बचना हो और पुण्यबंध पाना हो तो हमें हर एक समय पर शुभभाव ही रखना चाहिए और किसी भी तरीके से अशुभभाव को रोकना चाहिए।
अब प्रश्न उठता है कि हमारे भाव अहंकार आदि दोषों से दूषित हो तो? आइए अब आगे की गाथा में क्या संदेश है देखते हैं।
साथ ही हम अगर ऐसा सोचते हैं कि भाव के आधार पर ही कर्म का बंध है तो क्रिया छोड़ो सिर्फ भाव पर Focus करो तो इसकी Clarity इस प्रस्तुति के अंत तक मिल जाएगी। धम्मो मएण हुंतो,
तो नवि सीउण्हवायविज्झडिओ।
संवच्छरमणसिओ,
बाहुबली तह किलिस्संतो।। (24) Updeshmala Granth
इस गाथा का सीधा अर्थ यह है कि ‘अगर अहंकार की हाजरी में भी धर्म होता यानी Ego के Presence में धर्म होता तो ठंडी-गर्मी-हवा से व्याप्त और एक साल तक उपवास करनेवाले बाहुबली इस प्रकार कष्टों का अनुभव करने वाले नहीं बनते।’
यह गाथा धर्म पर नहीं बल्कि हमारे Ego पर हमला है। अब परम पूज्य गणिवर्य श्री गुणहंस विजयजी महाराज साहेब द्वारा दिए गए भावार्थ के आधार पर इस गाथा को देखते हैं।
हमारे प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ भगवान के 100 पुत्र थे। जब प्रभु ने दीक्षा ली तब सभी को राज्य बांटकर दे दिए थे लेकिन प्रभु के सबसे बड़े बेटे भरतजी बाद में चक्रवर्ती बनने निकले तो उन्होंने अपने 99 भाइयों को भी संदेश भेजा कि ‘आप सब मेरी शरण में आ जाओ, वरना युद्ध करो।’
अब उन 99 में से 98 भाइयों की इतनी Capacity नहीं थी कि वे भरतजी के साथ युद्ध कर सके, उनके सामने वे कमज़ोर थे तो उन्होंने प्रभु के पास जाकर फ़रियाद की, Complaint की और अपनी Situation बताई।
प्रभु ने उन्हें इस संसार की सच्चाई बताई और जीवन का सत्य बताया। प्रभु के उपदेश से उन 98 भाइयों को वैराग्य हो गया और उन्होंने प्रभु के पास उसी समय दीक्षा ले ली।
अब बचे बाहुबलीजी, वे तो बलवान थे, उन्होंने भरतजी के साथ युद्ध किया, इतिहास का सबसे भयानक युद्ध। जिसमें दुश्मन नहीं बल्कि भाई भाई लड़ रहे थे, करोड़ों लोग मारे गए।
बाद में इंद्र के कहने से सिर्फ दो भाइयों के बीच में पांच प्रकार के युद्ध तय हुए। दृष्टीयुद्ध, वाणीयुद्ध, बाहूयुद्ध, मुष्टियुद्ध और दंडयुद्ध वो पाँचों युद्ध में भरतजी अपने छोटे भाई बाहुबलीजी से हार गए।
इसके बाद बड़े भाई भरतजी ने अन्याय का सहारा लिया यानी Cheating की और बाहुबलीजी के ऊपर सुदर्शनचक्र छोड़ा लेकिन यह सुदर्शनचक्र स्वगोत्रीय पर काम नहीं करता तो बाहुबलीजी को चक्र से भी कुछ नहीं हुआ।
अब बाहुबलीजी को वैराग्य हो गया। ‘सगाभाई भी ऐसा अन्याय कर सकता है’ यह उन्होंने अनुभव कर लिया था, युद्ध की भूमि पर ही बाहुबलीजी ने दीक्षा ले ली।
अब दीक्षा के बाद प्रभु के पास जाना था लेकिन वो सोच में पड़ गए कि ‘मेरे 98 छोटे भाइयों ने Already पहले से दीक्षा ले ली है, अगर मैं वहां पर अभी जाऊँगा, तो मुझे उन सभी छोटे भाइयों को वंदन करना पड़ेगा, आजतक तो वो मुझे वंदन प्रणाम वगैरह करते थे अब मैं उनको वंदन कैसे करूँ?’
ये कोई Uncomfortable Situation नहीं थी, बल्कि यह था अहंकार-Ego.. एक चक्रवर्ती के विरुद्ध युद्ध में जीतनेवाले बाहुबली जी अपने ही Ego से नहीं जीत पाए।
इसलिए कहते हैं एक बार के लिए युद्ध जीतना फिर भी आसान है लेकिन खुद के अहंकार को, Ego को जीतना बहुत मुश्किल है।
इस अहंकार से उनका मन दूषित हो गया। इस दूषित मन के साथ वो जंगल में काउसग्ग में खड़े रह गए। एक साल तक एक चट्टान की तरह स्थिर खड़े रहे, दाढ़ी मूंछ इतनी बढ़ गई कि पक्षियों ने उसमें घोसले बना दिए।
ज़मीन में से निकली हुई वेल उनके शरीर को पेड़ की तरह लिपटती हुई ऊपर तक आ पहुंची, सर्प ने उनके पैरों के पास अपना घर बना दिया, फिर भी वो ध्यान में दृढ़ और अटल रहे।
उनको चाहिए था केवलज्ञान कि ‘भाई, एक बार केवलज्ञान हो जाए फिर प्रभु के पास चले जाएंगे। केवलज्ञान होने के बाद मुझे उन छोटे भाइयों को वंदन नहीं करना पड़ेगा।’
1 वर्ष बीता, एक साल में भयानक ठंड, भीषण गर्मी और तेज़ हवा के झोंके सब कुछ सहन किए लेकिन इतनी घोर साधना करने के बावजूद भी जो चाहिए था वो प्राप्त नहीं हो रहा था।
केवलज्ञान नहीं हो रहा था।
आखिर क्यों? सोचने जैसा है।
एक साल के बाद प्रभु के कहने से ब्राह्मी-सुंदरी, दो बहनें उनको समझाने आई और अहंकार रुपी हाथी से नीचे उतरने का उपदेश दिया। जो काम एक वर्ष की घोर साधना से नहीं हुआ वह सिर्फ ब्राह्मी सुंदरी साध्वीजी के वचनों से हो गया।
बाहुबलीजी को झटका लगा, उन्हें भान आया कि ‘अरे, मैं अहंकार रुपी हाथी पर बैठा हुआ हूँ फिर मुझे केवलज्ञान कैसे होगा?’ उन्हें पश्चाताप हुआ। वो रो पड़े और वहीं उनका अहंकार पिघल गया। 98 भाइयों को वंदन करने के लिए अब मन तैयार हो गया और प्रभु के पास जाने के लिए एक कदम बढ़ाया।
आश्चर्य यह कि पूरे एक साल की घोर साधना से जो नहीं हुआ, वह Ego टूटने के बाद सिर्फ एक कदम से हो गया।
केवलज्ञान प्रगट हुआ… जी हाँ, अभी तो एक Step ही आगे बढे थे और उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हो गई।
ये Short में हमने घटना देखी है। बहुत पहले भरहेसर की सज्झाय की Series में यह Story हम Cover कर चुके हैं आप उन Videos को देख सकते हैं।
साथ ही फोरमबहन की मधुर आवाज में बाहुबलीजी की सज्झाय भी आप सुन सकते हैं।
ग्रन्थकार श्री कहते हैं कि अगर हमारे भाव अहंकार से मलिन हो, हमने अगर अहंकार को पकड़कर रखा हो और अगर हम सोचते हैं कि इन मलिन भावों के साथ भी सच्चा धर्म हो सकता हैं तो बाहुबलीजी ने जो अतिघोर साधना की, तो वह साधना भी श्रेष्ठ धर्म ही होता ना, इस हिसाब से तो उनको 2-5-10 दिनों में ही केवलज्ञान हो जाना चाहिए था ना?
उनकी साधना चंद दिनों में ही संपूर्ण हो जानी चाहिए थी लेकिन उन्हें तो एक साल तक घोर कष्ट सहन करने पड़े उसके बाद जब उन्होंने अहंकार छोड़ा और सिर्फ एक कदम आगे रखा तो तुरंत ही उन्हें केवलज्ञान हो गया.. ये कैसे?
यह सब सोचते हैं तो पता चलता है कि 1 साल तक उनका भाव अशुभ था, अहंकार से मलिन था, तो उनके पास सच्चा धर्म नहीं था, शुद्ध धर्म नहीं था और शुद्ध धर्म ही केवलज्ञान दे सकता है, तो शुद्ध धर्म नहीं होने के कारण से उनको केवलज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पाई।
जैसे ही अहंकार का नाश हुआ, भाव शुभ बन गया, शुद्ध बन गया तो तुरंत एक पल में उनको केवलज्ञान की प्राप्ति हो गई।
- एक तरफ अहंकार+एक वर्ष की कठोर साधना
- दूसरी तरफ अहंकार ख़त्म+सिर्फ एक कदम..
जीत किसकी हुई हमने देख लिया। तो यह निश्चित हो जाता है कि अहंकार आदि मलिन भावों की Presence में सच्चा धर्म नहीं हो सकता। शुभभाव की Presence हो, सच्चे भाव हो, मलिन भाव ना हो तो ही सच्चा धर्म हो सकता है।
धर्म का दिखना और धर्म का होना दो अलग विषय है।
अब हम सभी को इस गाथा का अर्थ समझ में आ गया है तो अब दूसरों की आत्मा का, दूसरों के अहंकार का Investigation नहीं करना है बल्कि यह सब हमारे खुद के लिए हैं, हमें हमारे खुद के अंदर झांकना है।
1. ‘मेरे नाम की तख्ती आए, बड़ी Size में आए, तो ही मैं बड़ा लाभ लूँगा दान दूंगा वरना नहीं।’ अगर हमारी इस तरह की सोच है तो हमारा भाव अहंकार से मलिन है या नहीं? यह खुद से पूछना होगा।
2. ‘हमारे मंडल ने संघ के कार्य में इतना बड़ा कार्य किया, इतना Support किया, लेकिन ट्रस्टी ने या Anchor ने दूसरे मंडलों का तो नाम लिया लेकिन हमारे मंडल का नाम नहीं बोला। ऐसा तो नहीं ही चलेगा भाई। अगली बार हम काम ही नहीं करेंगे तब जाकर के इनको पता चलेगा’
अगर हमारी इस तरह की सोच है तो हमारे भाव शुद्ध है या मलिन? विचार करने जैसा है..
3. जहाँ हमारा नाम बोला जाता हो, सैंकड़ों-हजारों लोग सुनते हो, ऐसे चढ़ावा आदि में ही हमें अगर हमारा Interest है।
लेकिन अगर मान लो कि गुप्तदान देना हो, गुरु भगवंत प्रेरणा कर रहे हैं जहाँ पर हमारा नाम कहीं पर भी आगे नहीं आनेवाला है, लेकिन उधर Actual में Requirement है, शासन रक्षा का विषय हो सकता है।
ऐसी कोई भी धर्म की प्रवृत्ति हो सकती है, साधर्मिक भक्ति का कार्य हो सकता है लेकिन उधर नाम का कोई Announcement नहीं है, उधर अगर हमारा Interest ना हो तो शायद हमें समझ लेना है कि हम धर्म के लिए नहीं बल्कि खुद के अहंकार को बढाने के लिए, Ego को Boost करने के लिए दान दे रहे हैं।
अब इसमें उल्टा नहीं पकड़ना है कि जिधर नाम लिया जाता हो उधर दान नहीं ही देना। नहीं ऐसा नहीं सोचना है..
उधर दान देने के बाद नाम आए या ना आए हमें फर्क नहीं पड़ना चाहिए हमारे चेहरे की रेखा नहीं बदलनी चाहिए और हम नाम के लिए दान दे रहे हैं या धर्म के काम के लिए दान दे रहे हैं वो और कोई नहीं बल्कि हमारी आत्मा तो जानती ही है।
आत्मसाक्षी से ही हम खुद के भावों को जान पाएंगे।
4. कोई देख रहा है तब हम संघ का काम करें, कोई नहीं देख रहा है तो हम नहीं करें तो समझ जाना है यह Ego Boosting है, Ego Boosting ही हमारा Goal है।
उस समय में शायद हम धर्म नहीं कर रहे हैं बल्कि धर्म का Use Ego Boost करने के लिए कर रहे हैं। Actual में धर्म का Use हमें Ego ख़त्म करने के लिए करना था और हम धर्म का Use Ego Boost करने के लिए कर रहे हैं।
सोचने जैसा है…
‘कोई देखें या ना देखें प्रभु तो देख रहे हैं ना, मेरी आत्मा देख रही है ना।’ बस.. ये भाव हो तो समझना है कि सच्चा धर्म है। इस तरह से हर बात में समझ लेना है, ऐसी तो अनेकों बातें हैं।
लेकिन हाँ इन बातों का उपयोग किसी को Personally सुनाने के लिए, या किसी पर कटाक्ष करने के लिए भी नहीं करना है। इसका भी ध्यान रखना है।
पैसे देनेवाले करोड़ों रुपये तो दे देंगे, काम करनेवाले टाइम का भोग तो दे देंगे, पूरे Efforts भी डालेंगे, कार्यक्रम Successful भी हो गया।
लेकिन बदले में अपने नाम की, अपनी तख्ती की, अपनी तारीफ की, अपने वाह वाह की Expectations रखेंगे तो इसका हिसाब ऐसा है कि हम कचरे जैसा नाम तख्ती तारीफ पाकर रत्न जैसे शुद्ध धर्म को गँवा रहे हैं।
अब रत्न फेंककर कचरा इकट्ठा करनेवाला होशियार कहलाएगा या मूर्ख यह हमें तय करना है।
तो अब करना क्या?
महात्मा कहते हैं कि हमें हमारे मन को एकदम शुद्ध बनाना पड़ेगा।
‘मैं जो भी धर्म करूँगा, सिर्फ और सिर्फ मेरी आत्मा के लिए ही करूँगा। नामना के लिए, तख्ती के लिए, तारीफ के लिए कभी भी नहीं करूँगा।’
अगर ऐसा भाव होगा तो हम शुभभाव के मालिक बनेंगे, शुद्धधर्म के मालिक बनेंगे और हमारी आत्मा का हित कर पाएंगे। बाहुबलीजी हमारे लिए Negative और Positive दोनों तरीके से आदर्श है।
उनको जब तक अहंकार था, केवलज्ञान नहीं हुआ। हम भी जबतक अहंकार, क्रोध, माया आदि मलिनभाव रखेंगे तो हमारी आत्मा का हित नहीं पाएंगे और सच्चा धर्म नहीं कर पाएंगे।
बहुबलीजी का अहंकार गया तो केवलज्ञान आया। हमारे भाव भी अगर पवित्र होंगे, तो केवलज्ञान मिलेगा ही.. नज़दीक के भवों में ही मिल जाएगा।
हाँ कुछ लोग पिछले और इस Episode को उल्टा पकड़ सकते हैं कि ‘भाव से ही कर्म का बंध होता है और भाव बदले तभी तो बाहुबलीजी को केवलज्ञान हुआ, उनको एक साल की क्रिया क्या काम की आई?
तो इसका मतलब तो ये होता है ना कि अब से क्रिया छोड़ो और भाव रखो बस है, मौज मस्ती करो भाव अच्छा होने चाहिए हो जाएगा केवलज्ञान।’
इस तरह की सोच हमें डुबाएगी। क्रिया के प्रति अरुचि भाव, क्रिया के प्रति उपेक्षा भाव, क्रिया के प्रति आलस भाव, क्रिया के प्रति द्वेष भाव हो तो वह भी शुद्धभाव नहीं है, शुभभाव नहीं है।
बाहुबलीजी की ऐसी गलत सोच होती तो उन्हें कभी केवलज्ञान होता ही नहीं और ना ही वे मोक्ष जा पाते। क्रिया करने की Capacity ना हो, वह अलग बात है लेकिन मान्यता एकदम Clear होनी चाहिए कि क्रिया करने जैसी ही है।
भाव के नाम पर क्रिया छोड़ना, ये भी Ego का एक रूप ही है। अंत में महात्मा कहते हैं कि अगर हम कचरे से मलिन पानी नहीं पीते, अगर धुल-मिट्टी से मलिन घर में नहीं रहते, अगर पसीने आदि से मलिन कपडे नहीं पहनते।
अगर पानी, घर, कपडे हमें सब शुद्ध ही चाहिए, तो हमें क्रोध मान माया लोभ आदि मलिन भाव कैसे चल सकते हैं? ऐसे मलिन भाव को हम सहन भी कैसे कर सकते हैं?
हमारा Goal यही होना चाहिए कि हमें पवित्र होना है, एकदम पवित्र बनना है। आज नहीं है कोई बात नहीं लेकिन कल तो हमें होना ही है।
आज तो पंचम काल में हमें बाहुबलीजी जैसे केवलज्ञान नहीं होगा माना, बहुत साधना करनी पड़ेगी कितने भव लगेंगे पता नहीं, लेकिन इसी पंचम काल में हम हमारे Ego को तो पकड़कर इसी भव में ख़त्म करने में ज़रूर सफल हो ही सकते हैं।


