अगर हमें लगता है कि मुझे सब पता है तो यह Episode हमारे लिए सबसे ज्यादा खतरनाक होनेवाला है क्योंकि पापी से पापी व्यक्ति को गुरु एक बार बचा सकते हैं लेकिन अहंकारी को गुरु भी नहीं बचा सकते।
प्रस्तुत है, आगम ज्ञानी बनो Series के अंतर्गत उपदेशमाला ग्रंथ का Episode 18
अहंकारी आत्मा गुरु के उपदेश के भी लायक नहीं है, गुरु अहंकारी को उपदेश देने की भूल करते ही नहीं है, मान लो कि गुरु ने उपदेश दे भी दिया, तो भी अहंकारी आत्मा वो उपदेश को भावों से सुनती ही नहीं है, मानता भी नहीं है।
ऐसी आत्मा कभी भी अपनी आत्मा का हित नहीं पा सकती है। यह बात अगली गाथा में बता रहे हैं। निअगमइविगप्पिय-चिंतिएण
सच्छंदबुद्धिरइएण।
कत्तो पारत्तहियं,
कीरड़ गुरु-अणुवएसेणं।। (25)Updeshmala Granth
यह गाथा ‘गलत गुरु’ की नहीं, ‘गलत शिष्य’ की बात कर रही है।
इस गाथा का सीधा अर्थ इस प्रकार है कि गुरु के उपदेश के लिए अयोग्य, अपनी बुद्धि से स्थूल और सूक्ष्म चिंतन करनेवाले, स्वच्छंदता से आचरण करनेवाले अपात्र शिष्य के द्वारा परलोक हित कैसे किया जाएगा?
अब परम पूज्य गणिवर्य श्री गुणहंस विजयजी महाराज साहेब द्वारा दिए गए भावार्थ के आधार पर इस गाथा को देखते हैं। पहले एक उदाहरण से समझते हैं।
एक इंसान जो खुद डॉक्टर नहीं है, फिर भी अगर वो अहंकार रखें कि मुझे तो सब पता है, मैं हर एक रोगों को और उसकी दवाइयों को भी अच्छे से जानता हूँ, तो यह अहंकारी इंसान कभी भी अपनी बिमारी में डॉक्टर के पास जाएगा नहीं, उनकी राय लेगा नहीं, उनकी बात मानेगा नहीं।
वो तो अपने आप ही सब निर्णय कर लेगा कि ‘यह Symptoms है तो यह बीमारी होगी और उसकी दवाई यह होगी’ और बिचारा वो अपने ऐसे गलत निर्णय के आधार पर खुद से दवाई लेगा। सीधी बात है कि बिचारे की बीमारी मिटने वाली नहीं है और उसका रोग बढ़ने ही वाला है।
बस यही बात इस गाथा में आत्मा के लिए बताई है..
Health Expert की बात ना मानने से शरीर बिगड़ता है। Soul Expert की यानी गुरु की बात ना मानने से भव बिगड़ते हैं।
1. जो आत्मा अहंकारी है, जिसको अपनी बुद्धि का, अपने ज्ञान का गुमान है, वो भला सुगुरु की बात को सुनेगा ही क्यों? वो तो यह ही मानेगा कि ‘मुझे तो सब पता है, मेरे निर्णय Perfect होते हैं, मुझे सुगुरु की राय लेनी ही क्यों?
मुझे सुगुरु का मार्गदर्शन लेना ही क्यों? मेरे पास Experience की कहाँ कमी है? मैं खुद लोगों को राय देता हूँ, मार्गदर्शन देता हूँ, तो मैं ही दूसरों का गुरु हुआ ना।’
2. यह आत्मा कर्मों के भार से दबी हुई है, मोहग्रस्त इस आत्मा को पता भी नहीं चलता कि ‘यह मेरी गंभीर भूल है, तालाब के पानी जितने ज्ञानवाला मैं कहाँ? और महासागर जितने विराटज्ञानवाले संविग्न-गीतार्थ गुरु भगवंत कहाँ?’
तो यह आत्मा गुरु के उपदेश के लिए लायक ही नहीं है। गुरु ऐसे जीव को उपदेश देते ही नहीं है, क्योंकि वो जानते हैं कि ‘उपदेशो हि मूर्खाणां,
प्रकोपाय न शान्तये।
पयःपानं भुजङ्गानां,
केवलं विषवर्धनम्।।’
अर्थात् मूर्खों को उपदेश देने से मूर्ख को क्रोध आता है, वो शांत नहीं बनता। सांप को दूध पिलाने से सिर्फ ज़हर की बढ़ोतरी ही होती है, दूसरा कुछ नहीं। एकदम Clear संदेश है कि हर किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं है।
सामनेवाले की योग्यता ही ना हो तो गुरु की मेहनत का कोई फल नहीं आनेवाला है। यह Indirect संदेश शिष्यों के लिए है कि हमें ऐसा नहीं बनना है कि गुरु हमें उपदेश ही ना दे और गुरु हम पर मेहनत करें तो उसका कोई फल ही ना आए।
जिनागमों में कहा है ‘मा मा जंपह बहुयं,
जे बद्धा चिक्कणेहिं कम्मेहिं।
सव्वेसिं तेसिं जायइ,
हिओवएसो महादोसो।।’
अर्थात् ‘जो जीव चिकने कर्मों से बद्ध है, उनको अधिक कुछ भी मत कहो क्योंकि ऐसे सभी जीवों को तो हितोपदेश भी महादोष बन जाता है।’
जो अहंकारी है, जो गुरु की आवश्यकता ही नहीं समझता है, वह होशियार है या मूर्ख? यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है।
अगर मान लो कि कभी गुरु इस जीव की मूर्खता को पहचान ना पाए, और उपकार करने के भाव से उपदेश दे भी दे, तो भी यह जीव कहाँ सुननेवाला है, कहाँ माननेवाला है।
3. अब अगर जो जीव गुरु की कोई भी बात मानता ही नहीं है, तो अब वो कोई भी कार्यों में जो भी चिंतन करेगा, वो अपनी बुद्धि से ही करनेवाला है, गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार नहीं करनेवाला है।
उसका स्थूलचिंतन या सूक्ष्मचिंतन दोनों स्वच्छंद मति से ही होंगे यानी सामान्य चिंतन या गहरा चिंतन भी खुद की बुद्धि के आधार से ही होगा।
4. अगर उसके चिंतन अपनी ही मति, अपनी ही बुद्धि के आधार पर होंगे तो उसकी सभी प्रवृत्ति भी अपनी ही मति, अपनी ही बुद्धि के आधार पर होगी क्योंकि प्रवृत्ति आखिर तो विचारों के आधीन है।
5. ऐसी आत्मा परलोक में आत्महित हो, ऐसा कुछ भी कर ही नहीं पायेगी। कुलमिलाकर गुरु को Sideline करना यानी गुरु को नहीं बल्कि खुद के भविष्य को Sideline करने जैसा है। एक शिष्य ने कुछ ऐसी विधि सीख ली थी कि जिससे इंसान का ख़राब रूप ख़त्म करके उसे सुंदर बनाया जा सके।
पानी से भरे हुए विशाल बर्तन में कदरूप इंसान को यानी ख़राब रूपवाले इंसान को डुबाना पड़ता है, फिर वो पानी को गरम करना पड़ता है, मंत्र और विधि के प्रभाव से वो पानी ख़राब रूप को जलाकर नया सुंदर रूप बना देता है।
उसमें वो ख़राबरूप वाले इंसान को कुछ समय तक गरम पानी की गर्मी के कारण से भयंकर दर्द होता है, अगर वो उतना सहन कर ले, तो सुंदर रूपवाला बन सकता है।
ऐसी अद्भुत मंत्रसाधना एक शिष्य ने सीख ली, लेकिन उस मंत्रशक्ति का शिष्य को बहुत अहंकार आ गया। अहंकार के चलते वह शिष्य ने अपने ही गुरु की शक्ति प्रदर्शन नहीं करने की बात सिर्फ सुनी लेकिन मानी नहीं।
कुछ समय के बाद एक बहुत ही विचित्र घटना घटी।
एक राजा को एक ही संतान थी, उस राजकुमार का रूप बहुत ख़राब था, राजा अपने राजकुमार यानी पुत्र के रूप को लेकर बहुत चिंतित था, यह बात वह शिष्य को पता चल गई।
तो राजा को खुश करने के चक्कर में गुरु की बात की उपेक्षा करके यानी गुरु की बात को Ignore करके शिष्य ने राजा के पास जाकर कहा कि ‘मैं आपके बेटे को सुंदर बना देता हूँ’ यहाँ पर शिष्य का ज्ञान ज़रूर था लेकिन गुरु की अनुमति नहीं थी।
राजा तो खुश हो गया, और पुत्र को सुंदर करने की अनुमति दे दी। राजा के बेटे के ऊपर विधि शुरू की गई। मंत्रोच्चार आदि करके शिष्य दो नंबर जाने के लिए निकल गए।
और इस तरफ पानी गरम होने लगा, राजकुमार चिल्लाने लगा, राजा को लगा कि ‘वो साधु बदमाश निकला, मेरे बेटे को जलाकर भाग गया।’ तो गुस्से में आकर तुरंत सैनिकों को तुरंत Order दे दिया कि ‘जाओं और वो साधु का गला काट डालो।’
सैनिक फटाफट निकल गए और यहाँ पर राजा ने बेटे को पानी में से बाहर निकाला, लेकिन बाहर निकालते ही स्पष्ट दिखा कि शरीर का जितना भाग गरम पानी से जल गया था, उतना भाग एकदम सुंदर बन गया था।
राजा को पछतावा हुआ कि यह मैंने क्या कर दिया? मैंने जल्दबाजी में दो गलतियाँ की है। साधु को ख़त्म करने के लिए सैनिक भेज दिए और बेटे को बाहर निकालकर उसके सुंदर होने का Chance मैंने अपने ही हाथों से गँवा दिया।
राजा ने तुरंत दूसरे सैनिकों को दौड़ाया कि ‘आगे गए हुए सैनिकों को रोको, साधु को नहीं मारना है जाकर बोलो जल्दी से।’ इस तरफ वह साधु तो नगर के बाहर जा रहे थे और पीछे से उनको मारने के लिए सैनिक घोड़े पर आ रहे थे।
साधु उनको आते हुए देखकर डर गए, साथ ही उन सैनिकों के पीछे आ रहे दूसरे सैनिकों ने चिल्ला चिल्लाकर आगे के सैनिकों को रुकने को कहा लेकिन उनको सुनाई नहीं दिया।
वो तो यह सोचने लगे कि ‘अभी तक हम साधु का सर काटकर राजा के पास लेकर नहीं पहुंचे हैं, तो राजा ने गुस्से में आकर दूसरों को भेजा है फटाफट मारो इसको।’
तो ये पहले वाले यानी आगेवाले सैनिक रुकने के बजाय और ज्यादा तेज़ी से दौड़ पड़े और साधु के पास पहुंचे। साधु कुछ पूछे कुछ कहे कुछ Clarity दे उससे पहले ही इन्होंने साधु का गला काट दिया।
गहराई से सोचें तो यह हत्या तलवार से नहीं बल्कि खुद के अहंकार से हुई थी।
पीछे वाले सैनिक हताश हो गए। अब वो राजकुमार ज़िन्दगीभर के लिए आधा सुंदर और आधा कदरूप बना। गुरु की बात नहीं मानने का, अपने ज्ञान का अहंकार करने का दुष्ट परिणाम शिष्य को भुगतना पड़ा।
यह तो सिर्फ एक ही मौत आई, इस भव की मौत आई, हकीकत में तो गुरु की बात नहीं माननेवाले को लाखों-करोड़ों-असंख्या या अनंत भव भी भटकना पड़ सकता है।
शास्त्रकार भगवंत का भारपूर्वक यह कहना है कि शिष्य कितना भी ज्ञान क्यों न प्राप्त कर ले, उसे यह तो भान रखना ही है कि ‘गुरु के सामने वो अज्ञानी ही है, बालक है, गुरु की सहर्ष अनुमति के बिना उसे कुछ भी नहीं करना है।’
यह समर्पणभाव ही उसकी सफलता का मुख्या कारण बन सकता है। स्वच्छंदता आत्मा का अहित ही करेगी, समर्पण आत्मा का हित ही करेगा। ये ऐसे देखने जाए तो इतना सामान्य पदार्थ है लेकिन फिर भी अत्यंत महत्वपूर्ण पदार्थ है जो हर एक शिष्य को मन में दृढ़ करना चाहिए।
जब बात शिष्य की हो रही है तो ऐसा नहीं समझना है कि चलो भाई अपना काम नहीं है हम संसारियों का कोई लेना देना नहीं है.. नहीं! हम संसारियों के लिए भी यह इतना ही लागू होता है जितना कि गुरु भगवंतों को लागू होता है।
एक ही बात इस गाथा का सार है, शिष्य का मन, शिष्य की वाणी, शिष्य की प्रवृत्ति गुरु की सहर्ष अनुमति के साथ ही होनी चाहिए। स्वतंत्र-स्वच्छंद कोई भी हिसाब से नहीं होनी चाहिए। अगर स्वतंत्र-स्वच्छंद होगी, तो वो तीनकाल में कभी भी आत्महित नहीं ही पा सकेगा।
विडंबना देखिए आज भी हम में से ज़्यादातर लोगों के पास Law Expert यानी Lawyer होते हैं, Health Expert यानी Doctors, Nutritionists वगैरह होते हैं, News Expert, पंचायती Expert, Sports Expert और आजकल तो Social Media Expert भी होते हैं।
लेकिन Unfortunately Soul Expert यानी गुरु भगवंत नहीं होते हैं।
कुलमिलाकर ज्ञान अगर गुरु से बड़ा हो जाए तो वह ज्ञान, ज्ञान नहीं रहता। भटकाव बन जाता है और अहंकार के साथ की गई बड़ी से बड़ी साधना भी आत्मा को बचा नहीं सकती।


