Goshalak : The Most Dangerous Shishya in Jain History | Updeshmala Granth – Episode 19

गोशालक : जैन इतिहास का सबसे खतरनाक शिष्य

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By Jain Media 10 Min Read

ऐसा शिष्य जिसे गुरु भी पसंद नहीं करते, साधु भी पसंद नहीं करते और सामान्य लोग भी नहीं… शास्त्र कहते हैं-वह शिष्य खुद ही अपने पतन की तैयारी कर रहा होता है। 

आज एक ऐसे ही शिष्य की भी बात करेंगे जिसे प्रभु भी नहीं बचा सके। 

प्रस्तुत है, आगम ज्ञानी बनो Series के अंतर्गत उपदेशमाला ग्रंथ का Episode 19.. 

पिछली गाथा में हमने देखा कि जो अहंकारी होता है, स्वतंत्र-स्वच्छंद होता है, जो गुरु को Ignore करके, उनकी बातों को Ignore करके खुद की बुद्धि लगाता है उसका आत्महित संभव नहीं है। 

आगे की गाथा में बता रहे हैं कि कैसा शिष्य लोगों में निंदा-टीका को प्राप्त करता है। 

बद्धो निरुवयारी अविणिओ,
गव्विओ निरवणामो।
साहुजणस्स गरहिओ,
जणे वि वयणिज्जयं लहइ।। (27)Updeshmala Granth

इस गाथा का सीधा अर्थ इस प्रकार है कि जो शिष्य स्तब्ध है, निरुपकारी, अविनीत, गर्वित, निरवनाम है ऐसा शिष्य साधुओं में और लोगों में भी निंदा पाता है। अब परम पूज्य गणिवर्य श्री गुणहंस विजयजी महाराज साहेब द्वारा दिए गए भावार्थ के आधार पर इस गाथा को देखते हैं।

शिष्य में अगर पांच अवगुण है, तो वो साधुओं में भी और सामान्य लोगों में भी निंदा ही पाता है, तारीफ नहीं। यह पांच आत्मा के लिए बहुत खतरनाक है।

स्तब्ध

जो कभी किसी के भी सामने झुकता नहीं, अक्कड़ ही रहता है, मन की बात तो छोड़ो, लेकिन शरीर में भी वो नम्र नहीं बनता है, ताड़ का पेड़ ही समझो, कटेगा, लेकिन झुकेगा नहीं, इसे कहते हैं स्तब्ध शिष्य। 

जो झुकना नहीं जानता, उसका टूटना तय है।

निरुपकारी

गुरु ने संसार का राग ख़त्म करवाकर दीक्षा दी, पढ़ा लिखाकर सक्षम बनाया, आगे लाया। ऐसे गुरु का उपकार भूलकर गुरु को दुःख हो, त्रास हो, दर्द हो.. ऐसी विचित्र प्रवृत्ति जो करें, वो है निरुपकारी। 

जिसे कृतघ्न भी कहते हैं। शिष्य को कृतघ्न नहीं बल्कि कृतज्ञ होना चाहिए यानी गुरु ने जो उपकार किए हैं, वो हर एक उपकार को जाननेवाला, माननेवाला और उस उपकार के निमित्त से बहुमान रखनेवाला होना चाहिए। 

लेकिन यह शिष्य तो उपकारों को भूलनेवाला, तोड़नेवाला, ख़त्म करनेवाला है। उपकार भूलना अज्ञान नहीं, यह अहंकार की चरम अवस्था है।

अविनीत

गुरु को बैठने के लिए आसन देना, प्यास लगे तो तुरंत पानी देना, भूख लगे तो तुरंत गोचरी देना, ठंड लगे तो गर्मी के उचित उपाय करना, गर्मी लगे तो ठंडक के उचित उपाय करना, वो सोते हो तो बिलकुल भी आवाज़ नहीं करना, दूसरे आवाज़ करनेवालों को प्रेम से रोकना। 

गुरु को छोटी सी भी बीमारी या रोग आए तो उनकी सच्चे मन से सेवा करना, इस तरह से अनेक प्रकार के विनय है, यह सब जो नहीं करें वह अविनीत है। गुरु का विनय गुरु के लिए नहीं बल्कि खुद के अहंकार को तोड़ने के लिए करना है, नम्रता गुण पाने के लिए करना होता है।

गर्वित

जिसको अपनी प्रवचनशक्ति का, लेखनशक्ति का, कवित्व का, मधुर कंठ का, वैयावच्च करने की चतुराई का, श्रुतज्ञान का, पुण्य का.. इस तरह से अनेक चीज़ों का या कोई भी एक चीज़ का भी घमंड हो, अहंकार हो, उसे गर्वित कहते हैं।

जो यह गर्व के कारण से बार-बार अपनी खुद की ही प्रशंसा करता रहे, उसे भी गर्वित कहते हैं।

निरवनाम

जो गुरु के भी सामने झुकने को, प्रणाम करने को तैयार नहीं है, वो है निरवनाम। ऐसे साधु, साधुओं के बीच में भी निंदा को पाता है और सामान्य लोग भी उसकी निंदा करते हैं कि यह तो दुष्टस्वभाववाला है।

जैन शासन के इतिहास में ऐसा कोई अधम शिष्य अगर हुआ हो तो वो एक ही है-गोशाला। इस गोशालक में एक नहीं बल्कि यह पाँचों के पाँचों दूषण थे।

त्रिकालज्ञानी गोशाला?

महावीर प्रभु जब साढ़े 12 वर्ष के साधना काल में थे, उस वक्त पर गोशालक प्रभु की महिमा देखकर प्रभु के साथ घूमने लगा, ‘मान ना मान मैं तेरा मेहमान’ इस तरह प्रभु का शिष्य अपने आप बन बैठा। 

लेकिन अंदर से प्रभु के प्रति कोई बहुमान नहीं और शक्ति बढ़ जाने के बाद तो गोशालक को इतना अहंकार आ चुका था कि किसी को भी प्रणाम तक भी नहीं करता था, खुद को भगवान मानने लगा और मनवाने लगा। 

उसकी शक्तियों से प्रभावित होकर नादान लोग, भोले लोग उसके भक्त भी बन बैठे और वो अहंकारी अक्कड़ ही रहा, अक्कड़ ही बनता गया।

प्रभु ने उसके ऊपर बहुत उपकार किए, जब कोई एक संन्यासी ने गोशालक की हरकतों से परेशान होकर उसे जलाने के लिए तेजोलेश्या छोड़ी, तब वो घबरा गया था, जलकर राख होने ही वाला था, उस वक्त पर प्रभु ने शीतलेश्या छोड़कर उसकी जान बचाई। 

उसके बाद ऐसी तेजोलेश्या कैसे प्राप्त करनी यह भी प्रभु ने ही बताया, इसके बाद अष्टांगनिमित्तों का ज्ञान पाकर वह तीन काल के कुछ पदार्थों को जानने लगा और लोग उसे त्रिकालज्ञानी सर्वज्ञ मानने लगे। 

बस सबको जलाने की शक्ति और तीनकाल के कुछ ज्ञान की शक्ति के वश होकर वो इतना अहंकारी बन गया कि प्रभु के सभी उपकारों को भूल गया और जीवन का दान देनेवाले ऐसे प्रभु के दो शिष्यों के जीवन का नाश किया। 

प्रभु के द्वारा ही पाई हुई तेजोलेश्या शक्ति के माध्यम से प्रभु के ही जीवन का नाश करने की अत्यंत निंदनीय मेहनत की, यह तो प्रभु का आयुष्य निकाचित था, वरना यह अधमाधम शिष्य जीवनदाता के जीवन को ही ख़त्म कर देता। 

कृतघ्न में अगर शिरमोर कोई उदाहरण हो, तो गोशालक जैसा शायद दूसरा कोई नहीं होगा। 

अहंकारी का पतन

गोशालक ने प्रभु के साथ रहते वक्त और प्रभु से अलग हो जाने के बाद कभी भी प्रभु का कोई भी प्रकार का विनय नहीं किया। उल्टा अविनय का ढेर खड़ा कर दिया, प्रभु के सामने अपशब्द बोले, प्रभु को बहुत कुछ सुनाया।

अहंकार तो गोशालक के अंदर फूटफूटकर भरा हुआ था, प्रभु ने जब सबके सामने सत्य बात बता दी कि ‘गोशालक सर्वज्ञ नहीं है, वह पहले मेरा शिष्य था, वह मंखलिपुत्र है।’ तो उससे यह बात सहन नहीं हो पाई। 

क्योंकि वह अहंकारी था और अहंकारी कभी भी अपने सही दोषों का भी स्वीकार नहीं करता। 

उसने प्रभु के सामने भी झूठ बोला कि ‘तेरा शिष्य गोशालक तो कब का मर चुका है, लेकिन उसका शरीर हष्टपुष्ट था, तो मैंने उसके शरीर में प्रवेश किया है, ताकि मैं अच्छे से तप-साधना कर पाऊं, मैं सर्वज्ञ हूँ, मैं मंखलिपुत्र नहीं हूँ।’ 

अहंकारी इंसान अपने आप को महान साबित करने के लिए कोई भी झूठ का सहारा ले सकता है, जो गोशालक ने लिया। प्रभु के सामने जब गोशालक आया, तब न हाथ जोड़े, न सर झुकाया, आग बबूला होकर तूफ़ान की तरह आया और आग बरसाकर चला गया।

इससे स्पष्ट पता चलता है कि गोशालक में यह पाँचों अवगुण थे और उसे इन सबका भयानक फल मिला। 

खुद ने ही छोड़ी हुई तेजोलेश्या नाम की आग खुद के ही शरीर में प्रविष्ट होकर खुद को ही जलाने लगी, उसकी शक्ति का नाश हुआ, चलने की ताकत नहीं रही, धरती पर गिर पड़ा।

गौतमस्वामी आदि ने पास जाकर उसको सख्ती से ठपका दिया कि ‘तू साधुओं का हत्यारा है, तू गुरुद्रोही है, तू महापापी है’ इस प्रकार उसे बहुत कुछ सुनाया। उसके पीछे गौतमस्वामीजी की करुणा थी कि ‘वो सुधर जाए’ इस तरह से वो प्रभु के हजारों साधुओं के बीच में निंदापात्र बना। 

अभी तो सभी को पता चल गया कि प्रभु को जलाने निकला हुआ गोशालक खुद ही जला है, मरने की हालत में हैं, तो सबने उसकी निंदा की, हिलना की, तिरस्कार किया। 

यह गाथा का हर एक शब्द गोशालक पर 100% लागू होता है। 

अहंकार का सबसे बड़ा दंड यही है कि वह अंत में खुद को ही जला देता है और सभी के बीच निंदा का पात्र भी बनता है।

किसी भी शिष्य को यह ध्यान रखना है कि यह पांच दोषों में से एक भी दोष का सेवन खुद से ना हो जाए, अगर हो जाए तो तुरंत ही मानकर स्वीकारकर, आलोचना-प्रायश्चित्त करके उसकी शुद्धि कर ही लेनी। 

अगर मोक्ष पाना हो, सद्गति पानी हो, तो यह अवश्य करना ही होगा क्योंकि गोशालक जैन इतिहास की सिर्फ कथा नहीं बल्कि एक चेतावनी है।

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