श्री नमस्कार महामंत्र में पहला पद है नमो अरिहंताणं तो इसका अर्थ क्या है वह आज हम सरल भाषा में जानने का प्रयास करते हैं।
प्रस्तुत है Basics of Jainism का Episode 02
नमस्कार का उद्देश्य
नमो अरिहंताणं– इसका एक लाइन में अर्थ है-नमस्कार हो अरिहंत भगवंतों को।
अब थोड़ी गहराई से समझते हैं।
नमो यानी क्या?
नमो अर्थात् नमस्कार
क्या सिर्फ हाथ जोड़ना नमस्कार है? हाथ जोड़ना तो नमस्कार है ही लेकिन मन, वचन और काया से नमन करना यह Actual में नमस्कार है।
इस दुनिया में पैसा, पद, परिवार, प्रतिष्ठा के पीछे हम दौड़ते हैं कि यह सब मिलेगा तो हमें सुख मिलेगा, ख़ुशी मिलेगी.. यानी कि हमारा Ultimate Goal सुख है, सुखी होना है, Happiness..
अब Reality यह है कि राग और द्वेष यह सुख का मार्ग नहीं है, बल्कि गुणों की प्राप्ति वह सुख का मार्ग है। हमें यह सच्चा मार्ग दिखाने वाले और कोई नहीं बल्कि अरिहंत परमात्मा है।
अरिहंत परमात्मा-राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि जो बुरे दोष है, जो Actual में आत्मा के शत्रु होते हैं उन्हें नाश करके वीतरागता गुण को प्राप्त करते हैं।
इसको Detail में हम आगे जानेंगे लेकिन अभी के लिए इतना समझ लीजिए कि यह गुण हमारे अंदर अभी नहीं है या फिर ढका हुआ है, इसलिए हम दुखी है।
साथ ही सच्चा सुख और कुछ नहीं बल्कि यह वीतरागता गुण को पाना है। यह गुण अरिहंत परमात्मा अपने जीवन में प्राप्त करते हैं और हमें भी यह गुण प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं। तो वे हमसे गुणों में आगे हुए, इतना तो Clear हो जाता है।
School में एक राहुल नमक बच्चे को 50% आए और एक आयुष नामक बच्चे को 95% आए, अब अगर राहुल को भी 95% तक पहुंचना हो तो वह आयुष से दोस्ती करेगा, उससे मार्गदर्शन लेगा, उसके पीछे पीछे घूमेगा, कोई उसको पूछेगा कि आयुष के बारे में क्या सोचते हो?
तो वह यह कहेगा कि मैं तो आयुष को मेरा Idol मानता हूँ कितनी मेहनत करता है.. काश मैं भी आयुष जैसा 95% Result ला पाऊं। इधर राहुल में ईर्ष्या हो तो वह द्वेष भी कर सकता है लेकिन हम यहाँ पर Positively इस Example को देख रहे हैं।
इस Example में राहुल के दिल में आयुष के प्रति बहुत आदरभाव है, Respect है, बहुमान भाव है, क्योंकि पढ़ाई में आयुष बहुत आगे हैं।
इसी तरह से हमने अभी तक सच्चे सुख को प्राप्त नहीं किया है और अरिहंत परमात्मा ने सच्चे सुख को यानी वीतरागता गुण को प्राप्त किया है इसलिए अगर हमें वीतरागता गुण चाहिए तो हमें अरिहंत परमात्मा को हमारा Idol बनाना होगा।
यही वीतरागता गुण हमारे अंदर आए इसलिए हम नमो अरिहंताणं कहते हैं.. नमस्कार करते हैं।

गुणवान व्यक्ति के अंदर जो गुण है, वह गुण हमारे अंदर भी आए इसलिए हम उनके प्रति मन में आदर या बहुमान भाव यानी Respect वाला भाव धारण कर ‘नमो जिणाणं’ जैसे शब्दों को बोलकर दो हाथ जोड़कर मस्तक झुकाते हैं.. इस क्रिया को नमस्कार कहते हैं।
नमस्कार यह नम्रता का सूचक है। गुणवान के प्रति भक्ति व्यक्त करना वह नमस्कार है।
नमस्कार करना वह कृतज्ञता है यानी Gratitude का संकेत है, गुणवान के प्रति भक्ति की निशानी है, गुणवान के प्रति आदर-बहुमान, Respect का भाव प्रदर्शित करने का माध्यम नमस्कार है।
पूरी दुनिया में आज Gratitude की Wave चल रही है, जिसे हम मन से नमस्कार कहते हैं।
प्रश्न उठ सकता है कि हमने हमारा टारगेट बना लिया कि हमें भी वीतरागी बनना है तो फिर बात ख़त्म हो गई.. ये नमस्कार क्यों करना?
क्या सिर्फ टारगेट बनाने से काम हो जाता है? बिलकुल नहीं.. उस दिशा में आगे बढ़ना होता है। जब तक हमारे अंदर अहंकार, राग, द्वेष आदि बुरे दोष हैं, तब तक वीतरागता गुण प्रकट नहीं हो सकता।
वीतरागता अर्थात् किसी पर भी राग नहीं और किसी पर भी द्वेष नहीं, पूरी तरह से राग-द्वेष का ख़त्म होना वह वीतरागता है।
हमारी भारतीय संस्कृति में देखने जाए, तो मान लीजिए एक Scientist, Science के एक क्षेत्र में Expert है। उस क्षेत्र की पढ़ाई करनेवाला व्यक्ति इस Scientist की Value समझता है।
जब यह व्यक्ति इस Scientist से मिलेगा तो सबसे पहले हाथ जोड़कर झुककर इस भाव से पैर छूएगा कि मेरे में भी यह Scientist के जैसा ज्ञान आए।
अर्थात् यह नियम सब जगह देखने को मिलता है कि हमें अगर किसी चीज़ की Value है तो उस Value के आगे हम झुकते हैं और जो झुकता है वह पाता है। गुणवान के सामने झुकने से गुण प्राप्त होते हैं और दोषवाले व्यक्ति के आगे झुकने से दोष प्राप्त होते हैं।
तो यह नमस्कार जो हम अरिहंत परमात्मा को करते हैं यह इसके लिए करते हैं कि उनके गुण हमारे अंदर भी आए।
नमस्कार के प्रकार
नमस्कार भी दो प्रकार से हो सकते हैं
- A. द्रव्य नमस्कार
- B. भाव नमस्कार
द्रव्य नमस्कार यानी कि हाथ जोड़कर नमो अरिहंताणं बोलकर नमन करना जो बाहर से दिखता है।
भाव नमस्कार यानी कि मन में यह भाव रखना कि इस संसार में मैं कुछ भी नहीं हूँ और अरिहंत परमात्मा अनंत गुणों के भंडार है, मेरे सारे दोषों का नाश हो और मुझे भी अरिहंत परमात्मा की तरह वीतरागता गुण की प्राप्ति हो।
इसलिए गुण प्राप्ति के लिए द्रव्य एवं भाव नमस्कार दोनों ही आवश्यक है। इसलिए यह मन, वचन एवं काया की क्रिया है।
अरिहंत का अर्थ
अरिहंत यानी कि क्या?
अरि का अर्थ होता है शत्रु और हंत का अर्थ होता है नाश करनेवाले।
यहाँ पर अरि का जो अर्थ है वह अंदर के शत्रु से है यानी आत्मा के अंदर के शत्रु यानी कि राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि जो बुरे दोष हैं वह। जो इन बुरे दोषों का नाश करते हैं, वे अरिहंत।
यह हुआ सामान्य अर्थ।
हमने Learn Jainism में अरिहंत शब्द के अलग-अलग अर्थ एक Video में जाने थे, आप वह Video फिर से देख सकते हैं।
अब विशेष अर्थ जानने का प्रयास करते हैं, क्योंकि आत्मा में रहे हुए अंदर के शत्रु यानी बुरे दोषों का नाश करनेवाला यदि अरिहंत है तो क्या जो कोई भी इस तरह अपने अंतरंग शत्रुओं का नाश करें क्या वे सब अरिहंत हो जाएंगे?
नहीं..
राहुल कौन है.. सामान्य से कहने में आए राहुल लड़का है तो क्या इससे स्पष्ट हो जाएगा? नहीं क्योंकि दूसरे कई लड़के हैं जो राहुल नहीं है..
तो विशेष रूप से जानने के लिए हम कहेंगे राहुल यानी रमेश भाई शाह जो XYZ गली में तीसरे मकान में रहते हैं उनका 1st बेटा। अब इससे राहुल कौन यह स्पष्ट हो जाता है।
अब आत्मा के राग द्वेष आदि शत्रुओं का नाश करनेवाले अरिहंत यह सामान्य अर्थ।
विशेष अर्थ देखें तो 4 घाति कर्मों का यानी ज्ञानावरणीय, दर्शानावरणीय, मोहनीय और अंतराय यह 4 घाति कर्मों का नाश करने के बाद जो 8 अष्ट महाप्रातीहार्य एवं 34 चौंतीस अतिशय से युक्त तथा तीर्थंकर नामकर्म के उदय से जो तीर्थ की स्थापना करते वे अरिहंत कहलाते हैं।
कई शब्दों का अर्थ शायद समझ में नहीं भी आया हो, चिंता की कोई बात नहीं है, Tension मत लीजियेग, हम धीरे धीरे सब कुछ समझने का प्रयास करेंगे।
अनंत अरिहंतों को नमस्कार
तो फिर तीर्थंकर कौन होते हैं?
तीर्थंकर यह अरिहंत का ही पर्यायवाची शब्द है, Synonym है।
अब यहाँ पर जैन दर्शन की एक ज़बरदस्त बात हमें जानने को मिलती है।
अरिहंताणं पद में बहुवचन होने से यानी Plural होने से अनंत अरिहंतों को, Infinite अरिहंतों को एक साथ नमस्कार किया जाता है।

जब हम अरिहंत कहते हैं तो किसी एक व्यक्ति विशेष का नाम नहीं है बल्कि जो भी आत्माएं अरिहंत के गुणों को धारण करती है वे सब अरिहंत बन जाते हैं और उन सभी को इस पद के द्वारा नमस्कार किया जाता है।
जब हम अरिहंत की पूजा करते हैं तब वास्तविकता में हम किसी एक व्यक्ति को नहीं बल्कि अरिहंत के गुणों की पूजा करते हैं, उनके व्यक्तित्व की यानी Personality की पूजा करते हैं। गुण पूजा यह विशिष्टता हमें जैन दर्शन में ही देखने को मिलती है।
नमो अरिहंताणं पद में बहुवचन होने के कारण Past, Present & Future.. भूत, भविष्य और वर्तमान काल के सभी अरिहंतों को नमस्कार किया जाता है।
जब हम महावीर स्वामी की प्रतिमा के आगे नमो अरिहंताणं कहकर नमस्कार करते हैं, तो उनके गुणों को नमस्कार करते हैं।
जब हम पालिताना में शत्रुंजय तीर्थ पर आदिनाथ भगवान की प्रतिमा के आगे नमो अरिहंताणं कहकर नमस्कार करते हैं, तो उनके गुणों को नमस्कार करते हैं।
जब हम गिरनार में नेमिनाथ भगवान के आगे नमो अरिहंताणं कहकर नमस्कार करते हैं, तो उनके गुणों को नमस्कार करते हैं।
भगवान महावीर स्वामी ने 18वें भव में यानी त्रिपृष्ट वासुदेव के भव में शय्यापालक के कान में गर्म सीसे का रस डाला था, उस चीज़ को हम नमस्कार नहीं करते हैं बल्कि प्रभु महावीर स्वामी ने जो वीतरागता गुण प्राप्त किया उसको नमस्कार कर रहे हैं।
कुलमिलाकर गुण प्राप्ति वही हमारा लक्ष्य है, उसी के लिए हम नमस्कार करते हैं।
आजतक भूतकाल में अनंत अरिहंत हो चुके हैं, भविष्य में भी अनंत अरिहंत होनेवाले हैं और वर्तमान में महाविदेहक्षेत्र में 20 विहरमान तीर्थंकर विद्यमान है यानी Existing है।
हम भरतक्षेत्र में रहते हैं, इस क्षेत्र में उत्सर्पिणी काल और अवसर्पिणी काल में 24-24 तीर्थंकर होते हैं। हम अभी फिलहाल अवसर्पिणी काल के पांचवे आरे में जी रहे हैं।
इस अवसर्पिणी काल में 24 तीर्थंकर हो चुके हैं.. 1st थे आदिनाथ भगवान 24th थे महावीर स्वामी भगवान।
काल चक्र को भी हम भविष्य में समझने का प्रयास ज़रूर करेंगे कोई भी चिंता मत कीजिएगा।
फिलहाल के लिए इतना समझ लीजिए कि सभी तीर्थंकर परमात्मा को नमो अरिहंताणं में नमस्कार किया जाता है।
तीर्थंकर बनने का रहस्य
प्रश्न उठ सकता है कि आखिर यह अरिहंत कौन बनता है?
अब देखिए एक पिता ने पूरे जीवन में मेहनत संघर्ष करके एक करोड़ रुपये कमाए हो और घर में किसी Secret जगह पर छुपाये हो तो अंत समय में वह पिता क्या करेगा?
वह अपने बेटे को बुलाएगा और कहेगा कि बेटा वहां पर मैंने एक करोड़ रुपये तेरे लिए रखे थे, वह ले लेना। वो बेटे पर उपकार करते हैं.. Right..
इसी तरह से कुछ विशष्ट आत्माएं होती है, जो अपने पूर्व के तीसरे भव में सवि जीव करूँ शासनरसी की तीव्र शुभ भावना भाते हैं और इस भावना के बल से तीर्थंकर नाम कर्म निकाचित करते हैं।
इसको सरल भाषा में समझने का प्रयास करते हैं।
भव यानी जन्म।
पूर्व भव यानी पिछला जन्म।
पूर्व के तीसरे भव यानी पिछले से पिछला जन्म।
भगवान महावीर जिस भव में भगवान महावीर स्वामी बने उससे पिछले के पिछले भव में यानी कि पूर्व के तीसरे भव में वे नंदन राजकुमार थे। एक दिन संसार की असारता देखकर उन्होंने संयम लिया यानी दीक्षा स्वीकार की और कठोर तप वगैरह की साधना की।
उन्हें यह बात पता चल गई कि संसार में सुख नहीं है, पुद्गलों में सुख नहीं है, Materialistic चीज़ों में सुख नहीं है, बल्कि सुख का आभास है, सुख का Illusion है, सुख तो गुणों की प्राप्ति ही है।
गुणों की प्राप्ति के लिए ऐसे जीव दीक्षा लेते हैं। गुणों की प्राप्ति के लिए यानी सच्चे सुख के लिए जीवन में जो मार्ग अपनाया जाता है, वही मोक्ष मार्ग है और उसी को हम शासन कहते हैं।
फिर से समझ लीजिए गुणों की प्राप्ति वह लक्ष्य Target, इस Target को Achieve करने के लिए जिस रास्ते पर चलना होता है, उसे कहते हैं मोक्ष मार्ग यानी शासन।
अब जब उन्हें जीवन का यह महत्वपूर्ण रहस्य पता चला तो उन्हें ऐसे तीव्र शुभ भाव हुए कि इस सृष्टि में रहे हुए सभी जीवों को मैं इस शासन का, इस मोक्ष मार्ग का रसिक बना दूँ।
यानी सभी जीव इस मोक्ष मार्ग को चाहनेवाले बने, इस मार्ग पर चलकर सभी जीव Permanent सुख को पाए, सुखी हो जाए ऐसा कुछ करूँ यानी सभी जीव गुणवान बने, वीतराग बने ऐसा कुछ करूँ।
इन शुभ भावों के कारण वे तीर्थंकर नाम कर्म का बंध करते हैं। यानी Next to Next, अगले से अगले जन्म में वे तीर्थंकर बनेंगे ऐसा ठप्पा कुदरत उनपर लगाती है, एक तरह का Reservation समझ लीजिए।
वे उसी जन्म में कर्मों का क्षय कर मोक्ष जा सकते थे लेकिन इस भावना के कारण उनके 2 और भव होते हैं यानी 2 बार और जन्म होता है।
फिर अंतिम भव में यानी कि उस भव वाले से Next To Next भव में वे संसार को त्यागकर के दीक्षा अंगीकार करते हैं और आत्मसाधना के बल से पूरी तरह से वीतराग बनते हैं, वीतरागता गुण को प्राप्त करते हैं और केवलज्ञान प्राप्त करते हैं, जिसे English में Omniscience कहते हैं।
केवलज्ञान यानी पूर्ण ज्ञान – Past, Present और Future का Visible-Invisible Things का पूरा ज्ञान होना। उन्हें तब ना किसी पर राग होता है और ना ही किसी पर द्वेष होता है।
No Attachment No Grudge and Complete Knowledge/Infinite Knowledge.
केवलज्ञान की प्राप्ति के बाद Reserve किया हुआ तीर्थंकर नाम कर्म उदय में आता है और फिर से धर्म तीर्थ की स्थापना करते हैं, जिससे सभी जीवों के लिए मोक्ष मार्ग फिर से खुल जाता है।
यह धर्म तीर्थ यानी कि और कुछ नहीं बल्कि मोक्ष को प्राप्त करने का मार्ग।
इसे व्यवहार में हम चतुर्विध संघ कहते हैं यानी गुणों से भरपूर लोगों का एक Group।
तीर्थ की स्थापना
चतुर्विध संघ यानी साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका।
वे जब इस धर्म तीर्थ की स्थापना करते हैं तब कुछ पुरुष दीक्षा लेकर साधु बनते हैं, कुछ स्त्रीयां दीक्षा लेकर साध्वी बनते हैं और जो दीक्षा नहीं ले पाते हैं, वे अपनी शक्ति अनुसार कुछ व्रत लेकर श्रावक श्राविका बनते हैं।
इसे हमने अभी Short में देखा है भविष्य में Detail में देखेंगे, चिंता मत कीजिएगा।

ये पूरा Process जहाँ पर होता है, उसे समवसरण कहते हैं, जो देवों के द्वारा रचा जाता है।
इस समवसरण में फिर अरिहंत परमात्मा भव्य जीवों के कल्याण के लिए दो प्रहार तक यानी Approx 6 घंटे तक धर्मदेशना देते हैं यानी मोक्ष की प्राप्ति कैसे करनी, वीतरागता गुण कैसे प्राप्त करना, उसके लिए प्रवचन देते हैं, रास्ता बताते हैं।
इस धर्म देशना को सुनकर अनेक भव्यआत्माएं मोक्ष को प्राप्त करती है। मोक्ष क्या होता है यह भी भविष्य में हम जान लेंगे। अभी के लिए इतना समझ लीजिए कि जन्म, रोग, वृद्धावस्था और मरण का हमेशा-हमेशा के लिए रुक जाना वही मोक्ष है।
यह तब होता है, जब हमारे पूरे कर्म क्षय हो जाते हैं, Nil होते हैं, Zero हो जाते हैं।
इस तरह से वे रोज़ धर्म देशना देते हैं और फिर अपना आयुष्य पूर्ण कर यानी उनकी जितनी उम्र बची होती है वह पूर्ण करके अपने देह का त्याग कर वे हमेशा हमेशा के लिए सिद्ध हो जाते हैं, मोक्ष में चले जाते हैं। इसके बाद उनका कभी भी फिर से जन्म नहीं होता है।
इसे हम निर्वाण भी कहते हैं।
अभी वर्तमान में हम जो कुछ भी मोक्ष मार्ग की आराधना अथवा आत्मसाधना कर पा रहे हैं, उसमें भी चरम तीर्थंकर भगवान महावीर का ही उपकार है। इसलिए ऐसे देखने जाए तो प्रभु महावीर स्वामी के ऊपर हमें विशेष बहुमानभाव होना चाहिए, क्योंकि Direct उपकार है।
हमने आजतक Materialistic चीज़ों में ही सुख को ढूँढा है और Reality हमें पता है कि Materialistic चीज़ों में यानी पुद्गलों में हमें सिर्फ सुख का आभास हो सकता है लेकिन असली सुख नहीं मिल सकता है।
भले हम संसार में हैं लेकिन Reality को हर कोई Accept करेगा और करना ही चाहिए।
यह सत्य हम तक पहुंचाया किसने? प्रभु महावीर स्वामी ने।
इस मोक्ष मार्ग को दिखाने का काम अरिहंत परमात्मा करते हैं, इसलिए नमस्कार महामंत्र में सबसे पहले अरिहंतों को नमस्कार करने में आया है।
अरिहंत परमात्मा का जब जन्म होता है तो इंद्र का भी सिंहासन कांपने लगता है..
अगले Episode में हम जानेंगे कि अरिहंत परमात्मा का जन्म कैसे होता है और किस प्रकार मनाया जाता है।
जन्म से उनके पास क्या-क्या Extraordinary Qualities होती है वह भी जानेंगे।


