Endurance VS Revenge : How Long Must We Suffer ? | Friend or Foe – Episode 22

आखिर दुखों को कब तक सहन करें?

Jain Media
By Jain Media 41 Views 13 Min Read

दुःख सहन करना चाहिए.
बात सही है,
लेकिन कब तक?

प्रस्तुत है Friend or Foe Book का Episode 22

कर्म का Concept एक दम Clear है,
यदि हमारे कर्म टेढ़े नहीं है तो इस दुनिया में किसी शहंशाह की भी ताकत नहीं कि हमारा कोई बाल भी बाँका कर सके और यदि कर्म रूठे हुए हैं तो किसी की ताकत नहीं कि हमें उसकी मार से बचा सके या रक्षण दे सके. 

कर्मसत्ता जैसे जैसे Order छोड़ती है, वैसा ही बर्ताव कर्मसत्ता के कर्मचारी यानी हमारे आस पास के जीव हमारे साथ करते हैं. अर्थात् Court की सज़ा के अनुसार जेलर कैदी को Hunter से मारता है तब यदि कोई डेढ़ होशियार कैदी सामने आ जाए कि ‘अबे, तू मुझे मारता है? चल, मैं भी तुझे मारूँगा.’ 

ऐसा कहकर यदि वह कैदी जेलर को मारता है तो वह अपराध गिना जाता है, इस अपराध को, इस अनुचित बर्ताव को देखकर Court उसी सज़ा को और भी कडक बनाती है, बढ़ाती है. ठीक उसी प्रकार, कर्मसत्ता की Court सजा फरमाती है. 

जैसे किसी अन्य जीव को Agent अथवा Jailer के रूप में कर्मसत्ता हुक्म करती है कि फलाने-फलाने व्यक्ति को गाली देकर सजा करो. वह जीव आता है दंड देने के लिए. यदि हम उसे कहे कि ‘अबे तू मुझे गाली देता है. मैं भी तुझे गाली दूंगा.’ तो इतना समझना है कि कर्मसत्ता की अदालत हमारी इस हरकत को देखकर सजा बढ़ा देती है. 

इससे Opposite, यदि कोई समझदार कैदी हो जो Court की सजा को चुपचाप सह लेता है, सज़ा देनेवाले Jailer का प्रतीकार नहीं करता है तो उसे सुंदर और समझदार कैदी माना जाता है. उसका यह सुंदर व्यवहार देखकर कभी-कभार Court वैसे कैदी की सजा घटा भी देती है. 

अनेक अपराधों की फटकारी गई अनेक सजाओं में से कितनी ही सजाएँ बिना भुगते भी Cut off कर देती है. इसी तरह, कर्मसत्ता की Court के आदेशानुसार जो जीव गालीगलौज आदि खाकर शांति से सजा भुगत लेता है उसके इस व्यवहार को अच्छा मानकर उसके अन्य अनेक अपराध की सजा कर्मसत्ता माफ भी कर देती है अर्थात् दूसरे अनेक कर्मों को वह बिना भुगते ही रद्द कर देती है. 

जितनी Basic Understanding एक कैदी में होती है, वह यदि साधक के मन में भी आ जाए तो भी बहुत कुछ आसान बन जाता है. इस मन में मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्यस्थ्य भाव जागेंगे. Jailer कैदी को कितनी ही बार हंटर से क्यों न मारे वह कैदी जेलर पर क्रोधित नहीं होता, आग नहीं उगलता, क्योंकि वह जानता है कि यह तो Court का Agent है, Order Obey करनेवाला दो रुपये का नौकर है, ये कोई मेरा शत्रु नहीं है.

मूल और माध्यम 

एक Post आया, Post में समाचार दुःखद आए तो Postman को गाली देने से क्या मतलब? हम दुःखी बन गए, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि हम Postman को ही हमारा दुश्मन मान बैठे. TV में दिखा कि लक्ष्मण को रावण ने मूर्च्छित कर दिया. 

पागल आदमी TV को फोड़ देता है, बुद्धिमान TV को कोसने की बजाय रावण को कोसता है. TV तो सिर्फ एक पर्दा है-माध्यम है-Medium है. वह न तो अपनी इच्छानुसार अच्छा बताता है न बुरा. जो जैसा होता है वही वह बता सकता है. 

भारतीय Cricket Team हार गई तो हार बताएगा और जीत गई तो जीत बताएगा. Simple! India Vs Pakistan के Match में जब Pakistan हारती है तो कुछ पाकिस्तानी TV फोड़ देते हैं और ये News देखकर पूरी दुनिया हंसती है कि भाई TV की क्या गलती थी. 

माध्यम को मात्र माध्यम ही मानो-मूल नहीं. Medium को Medium मानना है Root Cause नहीं. दुःख देनेवाला प्रत्येक इन्सान मात्र माध्यम है, मूल नहीं. 

मूल है कर्मसत्ता.
मूल है हमारे कर्म.
 

माध्यम है जीव-अजीव सब कुछ, पूरी दुनिया. अर्थात् अपमान करनेवाले ने कर्मसत्ता का हुक्म माना और मुझे तंग किया, मुझे उसे शत्रु नहीं मानना चाहिए या Tit For Tat-अपमान का बदला अपमान ही की भावना पैदा नहीं होनी चाहिए. 

तो ही सजा और दुःखों की Unending Nonstop List से बचा जा सकता है, वरना यह परंपरा उत्तरोत्तर Increasingly बढ़ती ही जाएगी, रुकने का नाम भी नहीं लेगी जैसा कि अनादिकाल से हो ही रहा है. 

By The Way, Court ने यदि Jailer को कहा हो ‘इस कैदी को रोज Hunter की 50 मार लगाना, खरोंचें आ जाए, लहूलुहान हो जाए, अनेक घाव पड़ जाए तो भी उस पर नमक छिड़कना, जिससे वह चीखता-चिल्लाता रहे. 

Jailer उसी तरह करता है और कैदी को बेबस होकर सब कुछ हर दिन सहना पड़ता है. अर्थात् कैदी को अनुकूल है या नहीं, जम रहा है या नहीं, सहने की इच्छा है या नहीं, यह कुछ भी नहीं देखा जाता. मगर, Court का Order क्या है? इसी बात को महत्त्व दिया जाता है. 

पूज्य श्री कहते हैं कि उसी तरह, कोई एकाद जीव हमें दिन-ब-दिन परेशान करता हो, छोटी-मोटी अनेक तकलीफों से पीड़ित करता हो, दुःख देने में कोई कसर नहीं रखता हो तो भी सब कुछ सह लेना, प्रतिकार करने की, Retaliate करने की इच्छा तक नहीं करनी चाहिए. 

सबसे बड़ा प्रश्न !
‘कितना सहना? और कब तक सहना?’

पूज्य श्री कहते हैं कि कितना सहना? उसकी कोई Fix Limit नहीं है. जितना आए उतना सब कुछ सहन करो. “हाय! इतना कितना सहन करना? सहन करने की भी कोई हद होती है? इसी प्रकार यदि बिलकुल प्रतीकार नहीं किया तो हमें वह ख़त्म कर देगा. 

अब तक तो चू या चा तक नहीं किया Let go कर दिया, मगर अब तो बाबा हमसे सहन नहीं होगा. हद हो गई है. पानी सर से ऊपर जा चुका है. हम कुछ भी नहीं करते हैं इसलिए वह हमारे सिर पर चढ़ता जा रहा है, और भी उग्र बनता जा रहा है. 

समझता है कि मानो हममें दम नहीं, प्रतीकार करने की ताकत ही नहीं. नहीं.. ऐसा कतई नहीं चलेगा. अब तो उसे उसकी नानी याद आ जाए वैसा करना पड़ेगा. आडे हाथ लेकर छठ्ठी का दूध याद दिलाना पड़ेगा. तो ही वह ठिकाने आएगा.” 

ऐसे कोई भी फिजूल विचार नहीं करने चाहिए और न ही ऐसा कोई बर्ताव. जब कभी एक ही व्यक्ति बार-बार हमें सताता हो और ऐसा लगने लगे कि ‘हम कुछ नहीं कर रहे हैं इसलिए वह बिना किसी डर के हमें कमज़ोर समझकर ज्यादा से ज्यादा परेशान कर रहा है, इसलिए अब तो उस पर प्रहार करके उसे शांत करना ही पड़ेगा जिससे वह तंग करने का नाम भूल जाए.’ 

ऐसा लगने लगे, तब अग्निशर्मा को याद कर सकते हैं. वह प्रहार करने गया, तो उसकी कैसी भयंकर दुर्दशा हुई, उसे याद करके Retaliate करने के Decision को Cancel कर दे तो साधनामार्ग में प्रगति है, वरना Downfall Fix है ऐसा समझकर चलना है. 

अग्निशर्मा का पूरा Episode Jailer Series में हम Cover कर चुके हैं. उसे एक बार फिर से ज़रूर देखने और समझने जैसा है. 

Story Of Agnisharama And Gunsen

पूज्य श्री कहते हैं कि अग्निशर्मा को गुणसेन की ओर से जो कष्ट मिला था वह सब Extreme था. इसलिए जब भी हम पर किसी अन्य व्यक्ति की ओर से पीड़ा मिले, जो भी मिले, जैसी भी मिले और जितनी भी मिले, उस वक्त अग्निशर्मा की पीड़ा सामने ला सकते हैं. 

ऐसा लगता है कि उस समय हमारी तकलीफों मेरु के सामने राई जैसी लगेगी. क्योंकि इतनी Extreme परेशानियों के बाद जब अग्निशर्मा ने प्रहार करने का निर्णय किया तब भी कर्मसत्ता ने उसकी हालत ख़राब कर दी. क्योंकि कर्मसत्ता को Interference बिलकुल भी पसंद नहीं. 

जब कर्मसत्ता ने अग्निशर्मा को नहीं छोड़ा जिसने इतना कुछ Face किया था तो हम ऐसा सोचे कि थोडा तो सहन किया है अब Retaliate करेंगे तो कर्मसत्ता माफ़ कर देगी तो यह हमारा भ्रम है. 

सहन करने की कैसी भी हद आ गई हो उस समय में भी यदि कोई प्रहार करने बैठता है, Retaliate करने बैठता है, और खुद कानून अपने हाथ में ले लेता है तो कर्मसत्ता उसे कभी माफ़ नहीं करती. 

इसलिए जब भी तकलीफ देनेवाले के खिलाफ Revenge लेने का मन हो तो अग्निशर्मा, खंधकसूरि आदि को मन में ला सकते हैं ताकि Revenge के विचार शांत हो जाए और सहनशक्ति बढे. तो ही शांति मिलेगी इस भव में और शांति मिलेगी परभव में. This is the National Highway to Moksh.

इसलिए मानो कर्मसत्ता संपूर्ण जीवसृष्टि को कहती है कि ‘मैंने तुझे गाली-गलौच, थप्पड़ खाने की जो भी सजा फटकारी है, तो तू स्वयं समझ ले कि पूर्वभव में तुने वैसी सज़ा के योग्य पापकर्म किया है. क्योंकि तुमने गुनाह नहीं किया होता तो मैं सज़ा देती ही नहीं.’ 

और अगर चुपचाप सहने के बजाय आनाकानी करें, भागने की बेकार कोशिश करें, Revenge का सोचे तो फिर कर्मसत्ता कहती है कि अब और मज़ा चख तेरी सजा अब Double Triple कर देती हूँ. 

अनाडी Court जिंदाबाद 

कर्मसता की कोर्ट अनाड़ी Court जैसी है. अनाड़ी Court में एक Honourable Judge महाशय बैठते हैं. Police आती है और अपराधी को लेकर मुकद्दमा दायर हो जाता है और… 

Judge पूछते हैं : नाम?
अपराधी कहता है : गोपीचंद सेठ.
Judge पूछते हैं : अपराध? 

Police कहती है : ‘No Parking Board’ के नीचे Activa गाडी खड़ी की.
Judge कहते हैं : गोपीचंद सेठ, अपराध के बदले 500 रूपए का Fine भर दो.
अपराधी कहता है : परंतु मैंने.. 

Judge कहते हैं : 1000 रूपए भरो.
अपराधी कहता है : Judge साहेब, मैंने गुनाह नहीं किया.
Judge कहते हैं : अब 1500 रूपए भरो. 

अनाड़ी Court में Logic, If But के लिए कोई जगह नहीं होती. गुनाह किया या नहीं, उसे Prove करने की झंझट वहाँ मोल नहीं ली जाती. अपनी सफाई पेश करते जाओ और Punishment बढ़ता जाएगा. 

यही उधर का System है इसलिए ऐसी Court में कभी भी जाना भी पड़े तो बुद्धिमानी इसी में है कि जितना दंड़ फटकारा गया हो, चुपचाप जेब में हाथ डालकर, नोट गिनकर पैसे-दंड भर दो-इसी में अपना हित है.

इसी तरह कर्मसत्ता की Court जो भी और जितनी भी सज़ा फरमाती है, चुपचाप सहन करनी है जल्दी छूट जाएंगे. ‘मैंने इसका कुछ नहीं बिगाड़ा. इसने मुझे हैरान-परेशान कर दिया था. मैंने इसके लिए क्या-क्या नहीं किया. इसके पीछे जीवन को बरबाद कर डाला. मैंने इसके ऊपर कैसे-कैसे उपकार किए और यह मुझे ऐसा ईनाम देता है. नहीं, नहीं.. मेरे से यह कैसे सहा जाएगा?’ 

अगर ऐसी थोड़ी सी भी फरियाद करने गए तो समझकर चलना है कि हम नई Problems को Welcome कर रहे हैं.  यह अनाड़ी Court दे धिनाधिन सज़ा बढाती ही जाएगी. मरुभूति को पशुयोनि की सजा फटकार दी जैसा कि हमने Episode 19 में देखा. ठीक वैसे ही. 

Friend or Foe – Episode 19

सामनेवाला गलती करें तो उसको देखकर Ignore कैसे कर सकते हैं.
ये क्या बात हुई? ऐसी सोच आ सकती है.
समाधान के लिए अगला Episode देखना होगा.

Share This Article
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *