The Beggar’s Mistake That Led Him To The 7th Narak (Hell) | Friend or Foe – Episode 23

दूसरों को दोष देने की भयानक सजा.

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सामनेवाला गलती करें तो उसको देखकर Ignore कैसे कर सकते हैं?

‘नहीं देखने जैसी चीज़-दूसरों की भूल.’

प्रस्तुत है Friend or Foe Book का Episode 23

Class में हर दिन Late आनेवाले Student के घर पर Class Teacher की चिट्ठी आई. पिता ने पुत्र को फटकार लगाईं कि  ‘क्यों रे? हर दिन Class में Late पहुँचता है?’ पुत्र ने कहा कि ‘नहीं पापा, मैं कभी भी Late नहीं पहुँचता हूँ.’ 

पिता ने कहा कि ‘तो क्या, तुम्हारे Teacher जो लिखते हैं कि हर दिन Bell बजने के 5 Minutes बाद तू पहुँचता है यह Remark गलत है?’ पुत्र कहता है कि ‘पापा, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है. प्यून की गलती है क्योंकि मैं हर दिन Class में पहुँचू, उससे 5 Minutes पहले ही वह Bell बजा देता है.’ 

एक मनोविश्लेषण Psycho Analysis 

इस दुनिया में लगभग सभी प्राणियों का एक Mindset है-भूल करते रहना और स्वीकार नहीं करना, अपराध दूसरों पर ढोलना और खुद का बचाव करना. यह स्वभाव बहुत खतरनाक है.

क्योंकि जब एक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को अपराधी मानता है तब वह कोशिश यह करता है कि सामनेवाला व्यक्ति भूल को स्वीकार करे. इस Process में मैत्री तो ख़त्म हो जाती है और वैरभाव के, द्वेष की शुरुआत हो जाती है. 

इसलिए पिछले सारे Episodes में जो बातें पूज्य श्री द्वारा बताई गई है उन बातों को, उन विचारों के माध्यम से मैत्री भावना को अखंडित रखना है. 

गिरेर्दाही दृश्यो न च पदतलेऽनिनिकरः. 

संस्कृत का यह सुभाषित है. ‘पहाड जल रहा है’ यह जल्दी दिखता है, लेकिन अपने पाँव के नीचे जल रही आग नहीं दिखती. छलनी को सूई पर चमकने वाला छेद जिस आसानी से दिखता है उतनी ही आसानी से उसे अपनी छाती में पड़े अनगिनत छेद नहीं दिखते हैं. 

अर्थात् अनादिकाल से जीव का यह सामान्य स्वभाव हो चुका है कि स्वयं का हिमालय सा दोष-अवगुण-बुरी Qualities नहीं दिखती और सामनेवाले व्यक्ति की एक राई-जितनी छोटी भूल-दोष-बुरी Quality-अवगुण पहाड़ जितनी बड़ी दिखने लगती है. 

इसीको कहते है ‘राई को पहाड़ और तिल को ताड़ करना.’ स्वयं की भूलों का निरीक्षण करना हो तब आँखों के आगे Blindfold बंध जाता है और दूसरों की भूलों को देखने के लिए मानो Microscope हाथ आ जाता है. 

Episode 03 और 04 में कहा जा चुका है कि ‘अवर अनादिनी चाल नित-नित तजिये जी.’ यानी अपनी भूल दिखती नहीं है और दूसरों की दिखे बिना रहती नहीं यह अनादि काल से हमारा Routine है. Ep 03 और 04 अगर आपने Miss किया है तो ज़रूर देखिएगा.

पूज्य श्री कहते हैं कि अगर आत्मकल्याण करना है तो इस Routine को छोड़ना ही पड़ेगा. दूसरों की भूल देखनी यह हमारे लिए बहुत Easy हो गया है.

एक कथा प्रसिद्ध है. एक निःस्पृह संन्यासी के पास एक युवक आया और सेवा करने लगा. संन्यासी कुछ भी बोलते नहीं हैं, वे अपनी साधना में मस्त हैं. परछाई की तरह साथ में रहते हुए उस युवक तो पता चला कि बाबाजी के पास एक ऐसी जादूई लकड़ी है जिसे Continuously देखने पर व्यक्ति के दिमाग में क्या चल रहा है वह देखा जा सकता है. 

उसने मन में यह निर्णय कर लिया कि किसी भी हालत में यह जादूई लकड़ी लेनी है. 

महीने बीत गए. बाबाजी कुछ भी बोले नहीं फिर भी युवक सेवा करता रहा. यह देख बाबाजी खुश हो गए और बोले कि ‘बता वत्स. तुझे क्या चाहिए?’ युवक को इसी क्षण का इंतज़ार था वह बोला कि ‘बाबाजी मुझे तो आपकी वह जादूई लकड़ी चाहिए.’ 

बाबाजी बोले कि ‘मुझे देने कोई भी Problem नहीं है लेकिन उस लकड़ी से तेरा कोई फायदा नहीं होगा, लेकिन नुकसान ज़रूर होगा इसलिए जिससे तेरा फायदा हो ऐसा कुछ मांग ले.’ लेकिन नादाँ युवक बाबाजी की बात को समझ नहीं पाया और जिद्द करने लगा कि ‘आप अपना वचनपालन करना हो तो मुझे वह दीजिये, वरना जैसी आपकी मर्ज़ी.’ 

बाबाजी ने आखिरकार वह जादूई लकड़ी दे दी और खुद फिर से समाधि में लीन बन गए. 

शिष्य ने तुरंत ही उस लकड़ी का उपयोग बाबाजी के मन में क्या चल रहा है वह देखने के लिए किया और वह चौंक उठा कि अरे बाबाजी के दिल के एक कोने में तो धीरे-धीरे क्रोध की आग भड़क रही है, दुसरे कोने में अभिमान का एक छोटासा पहाड़ दिख रहा है, बीच-बीच में माया की सामग्री भरी पड़ी थी और कही लोभ की खाई तो कहीं छोटी बड़ी इच्छाओं के खड्डे नज़र आ रहे थे. 

शिष्य के मन में हुआ कि ‘बाप रे, गुरुजी के दिल में तो अभी भी क्रोधादि कषाय भड़क रहे हैं. इनसे मेरा क्या उद्धार होगा?’ और फिर वह कुछ भी कहे बिना रवाना हो गया. गंगाजी के तट पर आकर रहने लगा. लोगों के मनोभावों को कह-कह कर धन इकट्ठा करने लगा और लोगों को भक्त बनाने लगा. 

देखते ही देखते उसने एक बड़ा-सा आश्रम खड़ा कर दिया. 

बहुत समय व्यतीत हो गया. एक बार वे ही संन्यासी यात्रा करते हुए वहाँ आए. लोगों के मुँह से जादूई लकड़ी की बात सुनकर उस आश्रम में आए. दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया. गुरु ने पूछा ‘क्या करते हो?’ शिष्य ने A to Z सब बताया. 

तब गुरु ने कहा ‘सभी के दिल तू देखता है, कभी अपना भी देखा है? अपने दिल में रहे हुए दोषों का प्रत्यक्ष निरीक्षण किया है या नहीं, खुद की बुरी Qualities देखी है या नहीं?’ शिष्य ने कहा ‘नहीं, यह प्रयोग तो मैंने नहीं किया.’ गुरुजी ने कहा ‘अच्छा.. तो अब कर.’ शिष्य ने अपने दिल को देखने के लिए जादूई लकड़ी का उपयोग किया. 

क्रोधाग्नि की असंख्य भीषण ज्वालाएँ आकाश को छू रही थी, अभिमान का पर्वत तो इतना ऊँचा था कि उसका शिखर ही दिख नहीं रहा था. माया की भयंकर बांस की झाड़ियाँ परस्पर उलझी हुई थी और लोभसमुद्र किल्लोल कर रहा था. 

यह सब देख शिष्य गुरुचरणों मे पड़ा और पश्चात्ताप से गिड़गिड़ाने लगा ‘गुरुदेव, मुझे माफ करो, मैंने अपने ही दोष नहीं देखे.’ 

जैसे को तैसा की घातकता  

यह एक वास्तविकता है. मनुष्य अपनी खुद में रहे हुए दोषों को, बुरी Qualities को देख नहीं सकता है और दूसरों में जो बुरी Qualities, बुरे दोष नहीं है उनकी भी कल्पना कर सकता है. आँख खुद में रही हुई मिट्टी के कण को नहीं देख सकती लेकिन दूसरों की आँख में हो तो खूब आसानी से देख पाती है. यही हमार Routine रहा है और इसे ही हमें छोड़ना है. 

क्योंकि दूसरों की भूल-दोष देखने में अधिकतर संक्लेश ही है. किसी दुसरे का दोष देखा और हमारे मन में उसके प्रति ख़राब भाव-तिरस्कार उत्पन्न हुआ ही समझो.

For Example-‘मुझे यह परेशान करता है’ ऐसी बुद्धि आई अर्थात् क्रोध को आने के लिए National Highway तैयार हो गया और फिर ‘वह ऐसा करता है, तो मैं कहाँ कमजोर हूँ? मैं भी उसे बता दूंगा?’ इस प्रकार बदला लेने की भावना जगने लगती है और बार-बार ऐसा होने पर वैर की गाँठ बंध जाती है. 

राजगृही का भिखारी 

तीन दिन तक यह भिखारी पूरे नगर में भटका, दर-दर की ठोकरें खाई, यह नगरी बहुत Rich और धर्मश्रद्धा संपन्न नगरी थी लेकिन कर्मों का ऐसा उदय हुआ कि ऐसी नगरी में भी उसे खाने को रोटी का एक टुकडा भी नहीं मिला. कुछ समय बाद एक Festival आया. 

नगरवासी लोग नगरी के बाहर गए और पर्वत की तलहटी में रहे हुए उद्यान में इकट्ठे होकर महोत्सव मनाने लगे. 

भिखारी को लगा कि ‘ऐसे Festival के अवसर पर मुझे ज़रूर कुछ तो मिल ही जाएगा’ और वह भी भारी Expectations के साथ नगरी के बाहर गया. मगर अफसोस. कुछ भी नहीं मिला क्योंकि उसके कर्म ही ऐसे थे. 

उसे नागरिकों पर भयंकर गुस्सा आया कि ‘ये सभी लोग पेट भरकर मिठाई आदि खा रहे हैं और मुझे रोटी का एक टुकडा भी नहीं देते. ठीक है. मैं भी इन्हे बता दूँगा.’ और वह भयंकर क्रोध में पर्वत पर चढ़ा. 

पहाड़ पर उसने एक बड़ा पत्थर देखा और वह सोचने लगा कि ‘इस पत्थर को धक्का मारकर नीचे लुढ़का देता हूँ जिससे नगरवासियों का काम तमाम हो जाए. एक नहीं हजारों लोगों का कचूमर निकल जाए.’

क्रोध में अँधा भिखारी यह भी सोच नहीं पा रहा था कि इतना बड़ा पत्थर जब उससे हिलेगा ही नहीं तो नीचे कैसे गिराएगा लेकिन फिर भी उस पत्थर के पीछे गया और जोर से धक्का मारने लगा. Already तीन दिन से भूखा तो था ही, Balance खोना पैर फिसल गया और पत्थर तो नहीं लेकिन वो खुद खाई में लुढ़क गया. 

इतना सारे लोग एक साथ मर जाए यह रौद्रध्यान में खाई में ही नहीं बल्कि सातवीं नरक में लुढ़क गया. 

भिखारी ने यहाँ पर क्या Mistake की?

भिखारी ने लोगों की भूल देखी, लोगों के दोष देखें कि लोग तो कंजूस है, ख़राब है, खुद दबा दबाकर खा रहे हैं, मुझे एक टुकड़ा भी नहीं देते, कितने घटिया और Cruel है ये लोग’ और इस तरह से भूल देखने का क्या परिणाम आया?

लोगों पर भयंकर द्वेष आया, लोगों पर ख़राब भाव आ गए और जैसा पूज्य श्री ने बताया ठीक उसी प्रकार Extreme क्रोध आया क्योंकि दोष देखें और फिर 7th नरक. यह आया दूसरों की भूल देखने का परिणाम. 

शायद हमें लगेगा कि लोगों की भूल है तो दिखेगी ही इसमें क्या गलत है. लेकिन इससे Completely Opposite ढंढणऋषि ने किया तो उनको क्या परिणाम आया देखते हैं. 

ढंढणऋषि 

ढंढण मुनि की कथा हम Already एक Video में देख चुके हैं.

Dhandhan Muni’s Life Story

ढंढणकुमार ने नेमिनाथ प्रभु की देशना सुनकर दीक्षा ली थी. अभिग्रह किया कि मुझे अपनी ही लब्धि से जो आहार मिले, उसी को ग्रहण करना. द्वारिका नगरी समृद्ध थी, ढंढण मुनि नगरी में गोचरी के लिए, भिक्षा के लिए घूमते हैं. 

एक दिन, दो दिन, एक हफ्ते, दो हफ्ता, एक महिना, दो महिना.. ऐसे करते करते 6 महीनों तक आहार नहीं मिला. 6 महीने के उपवास हो गए लेकिन फिर भी उन्होंने नगरवासियों के बारे में गलत नहीं सोचा, उनका दोष नहीं देखा और इसलिए उन पर क्रोध भी नहीं आया. 

ढंढण मुनि सोचते हैं कि अपराध-दोष मेरा ही है, लोग तो बहुत धार्मिक है, श्रद्धालु है, दान में Interest रखते हो ऐसे लोग है लेकिन मेरे ही ऐसे कर्म है इसलिए मुझे भिक्षा नहीं मिल रही है.

दूसरों की भूल न देखकर खुद की भूल देखी और किसी अन्य को अपराधी ठहराने की बजाय खुद को अपराधी ठहराया. परिणाम बहुत ही सुंदर आया. द्वेष-असमाधि-संक्लेश-क्रोध आदि से तो बचे ही और साथ ही ऐसी सुंदर स्वस्थता और परम समाधि में चढ़े कि क्षपणश्रेणि पर आरूढ होकर मात्र लाभांतराय या अंतरायकर्म का ही नहीं बल्कि चारों घाति कर्मों का संपूर्ण क्षयकर केवलज्ञान को पाए. 

पूज्य श्री कहते हैं कि अन्य को गुनेहगार देखने में इतना भयंकर नुकसान है और खुद को गुनेहगार मानने में ऐसा ज़बरदस्त लाभ है-Profit है. इस तथ्य को जानकर बुद्धिमानी व्यक्ति को योग्य रस्ता अपनाना चाहिए. 

हमें लगेगा कि यह बात Spiritual Angle से तो सही है लेकिन भौतिक Angle से संसार में इससे कहा फायदा होगा? 

सांसारिक Angle से भी अनेकों फायदें हैं.
जानेंगे अगले Episode में. 

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