The Truth Behind Mahasati Rishidatta’s Death Was A Lie! Episode 03

महासती ऋषिदत्ता की वापसी ने सबको हिला कर रख दिया!

Jain Media
By Jain Media 19 Min Read

महासती के खिलाफ षड़यंत्र पड़ गया भारी।

जिस स्त्री को सबने राक्षसी कहकर मौत के घाट उतार दिया… वो ज़िंदा है! और जिस स्त्री ने उसे मरवाया… वो आज शादी का सपना देख रही है। कर्म का खेल शुरू हो चुका है…

लेकिन अभी किसी को पता नहीं है… कि महासती की असली वापसी होने वाली है।

प्रस्तुत है महासती ऋषिदत्ता की अद्भुत कथा का Episode 03..

ऋषिदत्ता निर्दोष होते हुए भी दोषित साबित की गई और फिर उसे मौत की सजा सुनाई गई, उसे जंगल ले जाया गया जहाँ पर वह बेहोश हो गई तो अधिकारी उसे मृत समझकर निकल गए।

होश में आने के बाद वह अपने पिता की झोपडी में रहने लगी और औषधि की मदद से शील की रक्षा के लिए उसने अपने आप को पुरुष के रूप में परिवर्तित कर दिया।

इतना हमने Ep 02 में देखा।

विवाह का प्रस्ताव

कोबेरी की राजकुमारी रुक्मिणी ने इस योगिनी को कहा था कि ऋषिदत्ता को ठिकाने लगाना है।

ऋषिदत्ता को रास्ते से साफ़ करने के बाद वह योगिनी रुक्मिणी के पास पहुँच गई और समाचार दिए ‘मैंने ऋषिदत्ता को नरभक्षिणी के रूप में कलंकित किया है, खुद राजा ने यानी खुद उसके ससुर ने उसे अपमानित कर नगर से बाहर निकालकर उसे मृत्यु दंड दिया है, इसलिए मेरा कार्य अब पूरा हो गया है।’

रुक्मिणी ख़ुशी से नाच उठी और योगिनी को मुंह माँगा धन देकर विदा दिया। फिर जाकर अपने पिता से उसने कह दिया कि अगर विवाह करुँगी तो कनकरथ के साथ ही करुँगी, वरना किसी के साथ नहीं करुँगी।

इस बार कोबेरी के राजा ने यानी कि रुक्मिणी के पिता ने अपनी पुत्री के लिए यानी कि रुक्मिणी के लिए फिर से एक दूत तैयार किया, Messenger तैयार किया और अच्छी तरह से समझाकर फिर एक बार कनकरथ के नगर यानी रथमर्दन की ओर रवाना किया।

उसने जाकर हेमरथ राजा को Gifts वगैरह दिए और Impress किया।

राजा ने आने का कारण पूछा तो उसने कहा कि हमारे महाराजा ने कहलाया है कि राजकुमारी रुक्मिणी ने कनकरथ के साथ ही विवाह करने का संकल्प किया है, इसलिए आप अपने राजकुमार को परिवार के साथ रुक्मिणी से विवाह करने के लिए जल्द से जल्द रवाना करें।

राजा हेमरथ ने अपने पुत्र कनकरथ को समझाया कि बेटा, मन से दुःख को दूर करो, ऋषिदत्ता को भूल जाओ, कोबेरी की राजकुमारी रुक्मिणी तुमसे विवाह करना चाहती है इसलिए तुम अपने मित्र-परिवार के साथ कोबेरी के लिए प्रयाण करो।

कनकरथ को फिर से शादी करने की कोई भी इच्छा नहीं थी लेकिन पिता की आज्ञा को ठुकरा नहीं पाया और इच्छा नहीं होने पर भी एक दिन अपने मित्र-परिवार एवं सेना के साथ कोबेरी की ओर प्रयाण किया। 

रहस्यमयी मुलाकात

कनकरथ जंगल के रास्ते से आगे बढ़ता हुआ एक दिन उसी आश्रम में पहुंचा जहाँ पर उसने ऋषिदत्ता को देखा था। विशाल जिनमंदिर को देखकर उसकी सब यादें ताज़ा हो गई।

वहीँ पर उसने पड़ाव डाला और पुष्प आदि सामग्री लेकर जिनमंदिर में प्रवेश किया और उसकी Right आँख Blink होने लगी। उसने सोचा कि Right आँख Blink हो रही है यानी प्रिया से मिलने का सूचक है, लेकिन जिस प्रिया की मृत्यु हो चुकी है, उसके साथ वापस मिलना कैसे हो सकता है?

और तभी अचानक ऋषिकुमार यानी पुरुष के रूप में बदली हुई ऋषिदत्ता हाथ में पुष्प वगैरह लेकर वहां आई। अब आगे ऋषिकुमार यानी पुरुष के रूप में ऋषिदत्ता समझना है।

कनकरथ ने जैसे ही ऋषिकुमार को देखा, उसी समय उसे एक अलग आनंद की अनुभूति होने लगी जैसे कोई अपने Life Partner से मिलता हो ठीक वैसी ही Feeling उसे आने लगी।

उसी समय ऋषिकुमार ने सोचा कि क्या मेरे स्वामी रुक्मिणी के साथ विवाह करने के लिए जा रहे हैं?

ऋषिकुमार से मित्रता

परमात्मा की पूजा भक्ति वगैरह करने के बाद ऋषिकुमार ने बड़े ही आदर सम्मान के साथ कनकरथ को योग्य आसन पर बिठाया और आदर पूर्वक भोजन कराया।

कनकरथ ने कहा कि आप कौन हो और यहाँ आपका आगमन कैसे हुआ?

ऋषिकुमार ने हकीकत को छुपाते हुए कहा कि इस आश्रम में पहले हरिषेण संन्यासी थे, मैं उनका पालित पुत्र हूँ, उनकी ऋषिदत्ता नामक पुत्री थी, कुछ वर्षों पहले किसी राजकुमार के साथ उसका विवाह हुआ।

फिर वह राजकुमार उस कन्या को लेकर अपने नगर में चला गया था, उस समय मैं यहाँ पर नहीं था, कुछ समय के बाद मैं यहाँ पर आया। 

कनकरथ ने सोचा कि अगर मैं इस ऋषिकुमार को अपनी सत्य घटना बता दूंगा तो ऋषिदत्ता पर आए कलंक एवं उसकी मृत्यु की सजा सुनकर इसे भी आघात लग सकता है इसलिए बहुत कम शब्दों में कनकरथ ने अपना परिचय दिया।

बाद में कनकरथ ने कहा कि ऋषि! आपको देखकर मेरी आँखें तृप्त नहीं हो रही है, दिल चाहता है कि मैं सदा तुम्हे देखता ही रहूँ। ऋषिकुमार ने कहा कि संभव है कि पूर्वभव में अपना कोई संबंध रहा हुआ हो। 

कोबेरी में आगमन

कनकरथ ने कहा कि हाँ! बात कुछ ऐसी ही लगती है, मेरी इच्छा है कि तुम मेरे साथ चलो।

ऋषिकुमार ने कहा कि अरे ऐसा मत बोलिए राजकुमार, संन्यासी जीवन स्वीकार करने के बाद गृहस्थ के विवाह जैसे प्रसंगों में संन्यासी का रहना उचित नहीं है।

कनकरथ ने जिद्द की कि आपकी बात सही है, लेकिन मैं नहीं चाहता हूँ कि आपका वियोग हो, पता नहीं क्यों लेकिन मैं आपका हमेशा समागम चाहता हूँ, विवाह प्रसंग में भले आप उपस्थित ना रहे लेकिन कोबेरी तक तो आप मेरे साथ चल सकते हैं ना, वहां से वापस लौटने के बाद आप इस आश्रम में रह लेना।

इस तरह से कनकरथ ऋषिकुमार को यानी Actual में ऋषिदत्ता को लेकर अपने मित्र आदि परिवार के साथ कोबेरी पहुंचे और वहां पर धूमधाम से उनका प्रवेश करवाया गया।

शुभमुहूर्त में कनकरथ और रुक्मिणी का विवाह संपन्न हुआ। रुक्मिणी की इच्छा पूरी हुई और उसकी ख़ुशी का पार नहीं था।

बातों बातों में रुक्मिणी ने कनकरथ को पूछ लिया कि स्वामिन्! आपने पहले जिससे विवाह किया था, वह ऋषिदत्ता कैसी थी? मैंने सुना था कि उसने आपका चित्त हर लिया था।

ऋषिदत्ता का नाम सुनते ही कनकरथ की आँखें आंसुओं से भर गई। उसने कहा कि प्रिये, रूप एवं गुणों में ऋषिदत्ता के जैसी आजतक एक भी कन्या मैंने नहीं देखी, उसके गुणों की मैं क्या तारीफ करूँ.. साक्षात स्वर्ग की अप्सरा थी.. उसके विरह में मैंने सब कुछ खो दिया है। 

षड़यंत्र का खुलासा

यह बात सुनते ही नाराज़गी जताते हुए रुक्मिणी ने कहा कि हाँ, उसके प्रेम में पागल बनने के कारण ही आप मुझे भूल गए थे, उसने मेरा सुख लूट लिया था।

इसी कारण से मैंने योगिनी द्वारा उसे कलंकित करवाया था और अपने सुख के मार्ग में से उस कांटे को दूर किया था। 

कनकरथ को झटका लगा, उसने पूछा कि वह काम तूने किसकी मदद से किया था? तो रुक्मिणी ने सारी घटना सुना दी।

ऋषिदत्ता के साथ हुए अन्याय की सब बातें जानकर कनकरथ एकदम गुस्से में आ गया और धिक्कार करते हुए उसने कहा कि अरे दुष्टा पापिनी! इस प्रकार पाप का आचरण कर तूने अपने आपको नरक के गर्त में डुबो दिया है और मुझे भी खड्डे में उतार दिया है।

अरे वह कितनी गुणवान थी, महासती थी ऋषिदत्ता! उसके जीवन का अंत लानेवाली तुझे धिक्कार हो। उसे ख़त्म कर तूने अपना कौनसा आत्महित किया है?

कडवे शब्दों से उसकी Class लगाकर कनकरथ ने रुक्मिणी को अपने Room से बाहर निकाल दिया।

आत्मदाह का निर्णय

सुबह होते ही कनकरथ ने चिता में प्रवेश कर आत्मदाह करने की घोषणा कर दी यानी खुद को आग के हवाले करने की घोषणा कर दी।

महाराजा को यानी रुक्मिणी के पिता को जैसे ही इस बात का पता चला वैसे ही वह दौड़ता हुआ आया और कुमार को समझाने लगा। अपनी पुत्री की पाप-लीला को जानकर राजा ने भी अपनी पुत्री का तिरस्कार किया।

बहुत समझाने पर भी कनकरथ मानने को तैयार नहीं था, तभी राजा ने उस ऋषिकुमार को यानी कि Actual में ऋषिदत्ता को बुलाकर राजकुमार को समझाने के लिए विनंती की। 

ऋषिकुमार ने कहा कि कुमार एक प्रिय स्त्री के लिए आत्म दहन करना कहाँ तक उचित है और वन में आपने तो मुझे विश्वास दिया था कि हम दोनों साथ में कोबेरी चलेंगे और वहां से वापस लौटते समय तुम आश्रम में ठहर जाना, क्या आप अपने वचन को भूल गए राजकुमार?

और इस प्रकार अग्निस्नान करके मर जाने से क्या अगले जन्म में उसी प्रिया के साथ मिलना हो पाएगा? यह संसार कर्मों से चलता है इसलिए हर जीव अपने अपने कर्म के अनुसार जन्म धारण करता है।

इसलिए कहाँ जन्म लेना वह सब अपने वश की बात नहीं है इसलिए कुमार मरने का आग्रह छोड़ दीजिये और हाँ मरे हुए के साथ फिर से मिलन बहुत मुश्किल है लेकिन जो जीवित है उसके साथ मिलन हो सकता है।

पुनःमिलन?

कनकरथ थोडा शांत हुआ और पूछा कि बात तो ठीक है लेकिन क्या मरे हुए का कभी पुनः मिलन हो सकता है?

ऋषिकुमार ने कहा कि मरा हुआ व्यक्ति वापस नहीं लौटता है लेकिन क्या आपने अपनी प्रिया को यानी ऋषिदत्ता को मृत अवस्था में देखा था?

कनकरथ ने कहा कि नहीं मैंने खुद तो उसे मृत स्थिति में नहीं देखा है, लेकिन हाँ दंड देनेवाले अधिकारी ने कहा था कि वह मार दी गई है। 

ऋषिकुमार ने मुस्कुराकर कहा कि मुझे तो अपने ज्ञान से आपकी पत्नी जीवित नज़र आ रही है, वह दक्षिण दिशा में हैं।

कनकरथ यह बात सुनकर चौंक उठा और आश्चर्यचकित होकर उसने पूछा कि क्या.. क्या ऋषिदत्ता जीवित है.. क्या मेरा फिर से उसके साथ मिलन हो सकेगा.. अगर हाँ तो कैसे? 

ऋषिकुमार ने कहा कि मैं अपनी मंत्रशक्ति से उसके पास जाकर उसे आपके सामने प्रकट कर सकता हूँ.. कनकरथ ने कहा कि अगर ऐसा है तो मैं जीवनभर आपका उपकार नहीं भूलूंगा और फिर मंत्र साधना के लिए धूप-दीप वगैरह सामग्री मंगवाकर एक बड़ा पर्दा लगा दिया गया।

ऋषिदत्ता की वापसी

ऋषिकुमार ने परदे में प्रवेश किया और दिखावे के लिए अपनी मंत्र साधना शुरू की और कुछ ही देर में उसने रूप परिवर्तन करने की औषधि खाई।

अब ऋषिकुमार वापस ऋषिदत्ता के रूप में यानी अपने Actual स्वरुप में, स्त्री रूप में आ गई और फिर पर्दा हटा दिया गया।

ऋषिदत्ता को साक्षात देखकर कनकरथ के आश्चर्य का पार नहीं रहा, ख़ुशी के आंसुओं से उसकी आँखें भर गई। राजकुमार के परिवारजनों ने एवं कोबेरी के राजा ने भी उस ऋषिदत्ता के अद्भुत रूप एवं लावण्य को देखा सब खुश हो गए।

सोने के सामने पीतल की जो दशा होती है वैसी ही स्थिति ऋषिदत्ता के सामने रुक्मिणी की हो गई। 

राजा ने और लोगों ने उस योगिनी को नगर-त्याग की कड़ी सजा दी और सभी ने उसका तिरस्कार किया, उसको नगर से बाहर निकाल दिया गया।

कोबेरी के राजा ने यानी रुक्मिणी के पिता ने खुद कनकरथ और ऋषिदत्ता को हाथी के ऊपर बिठाकर फिर से भव्य नगर प्रवेश कराया और अपनी पुत्री को डांट फटकार लगाईं। 

ऋषिकुमार का सच

एक दिन उसने अपनी पत्नी ऋषिदत्ता से पूछा कि तेरे मिलन से मुझे बहुत ख़ुशी हुई है लेकिन मेरा मित्र ऋषिकुमार कहीं पर भी नज़र नहीं आ रहा है, उसका वियोग अब मुझे सता रहा है, पता नहीं तुम्हे प्रकट करके वह कहाँ अदृश्य हो गया।

ऋषिदत्ता अपने पति के इस वियोग को देखकर हंस पड़ी और औषधि वाली जो हकीकत थी वह बता दी।

कनकरथ को भी सुनकर हंसी आ गई लेकिन फिर कनकरथ ने पूछा कि तो फिर जो अधिकारी तुम्हे जंगल में ले गए थे वहां से तुम कैसे बची?

और फिर ऋषिदत्ता ने सरलता से बेहोश होने से लेकर आश्रम तक की पूरी बात बताई और शील रक्षा के लिए पुरुष का रूप धारण करने की बात भी बता दी। 

पश्चाताप और महानता

ऋषिदत्ता अब कलंक से मुक्त हो गई थी तो कनकरथ ने ऋषिदत्ता को वरदान देते हुए कहा कि प्रिये तुम्हे जो चाहिए वह मांग लो।

ऋषिदत्ता ने कहा कि स्वामिन् अगर आप वरदान देना चाहते हैं तो मेरी एक ही इच्छा है कि आप मुझ में और रुक्मिणी में किसी भी प्रकार का भेद ना देखें, उसे भी मेरे तुल्य मानें।

कनकरथ स्तब्ध रह गया कि ये ऋषिदत्ता कोई मनुष्य नहीं बल्कि देवी लगती है, कितनी महान है.. उसका बुरा करनेवाली पर भी कितनी उदारता रख रही है। इसकी महानता को धन्य है।

आखिरकार कनकरथ ने ऋषिदत्ता के वचन का स्वीकार किया और रुक्मिणी को भी ह्रदय से स्वीकार किया। रुक्मिणी को अपनी भूल का बहुत पश्चाताप हुआ और भविष्य में कभी भी ऐसी भूल नहीं करने का उसने संकल्प किया।

कुछ दिनों तक कोबेरी में रहने के बाद एक शुभ दिन कनकरथ ने अपनी दोनों पत्नियों के साथ अपने नगर की ओर यानी कि रथमर्दन प्रस्थान किया।

Moral Of The Story

यहाँ पर जानने जैसी बात यह है कि

1. जब समय बदलता है तब परिस्थितियां भी बदलती है। जब पापोदय होता है, तब सब टूट गया हो ऐसा Feel होता है, पर जब पुण्योदय होता है, तब टूटा हुआ, छूटा हुआ भी जुड़ जाता है। ऋषिदत्ता और आज हम जो भी Life जी रहे हैं, वह भी ऐसा ही पाप-पुण्य का Game है। 

2. पाप का घड़ा फूटकर ही रहता है। रुक्मिणी अपनी होशियारी बताने गई और उस होशियारी ने उसकी बैंड बजा दी। सत्कार की जगह तिरस्कार मिला। गंदी नियत वाला Game ज्यादा नहीं चलता है। 

3. तंत्र-मंत्र की दुनिया ऐसी है कि जिससे हम जितने दूर रहे उतना हमारा फायदा है। क्योंकि जब तंत्र-मंत्र का Reaction सामने आता है, तो उसे दूर करने की कितना भी Action कर लो, वह अपना Reaction बताकर ही रहता है।

4. जब प्यार गहरा होता है, तब उस व्यक्ति की Presence का हमें पता लगे ना लगे, पर उसके लिए Emotions तो पैदा हो ही जाते हैं। उसकी चीज़ें उसकी स्मृति, उसकी Memories ताज़ा कर ही देती है। 

5. राजकुमार ने Suicide करने का सोचा पर उसका सच्चा साथी ऋषिकुमार ने उसको कर्म का गणित समझाकर Suicide करने से रोका, ऐसे हमारे सच्चे साथी कितने? और हम कितनों के सच्चे साथी? पूछने जैसा है.. खुद से।

6. अच्छे के साथ अच्छा व्यवहार और बुरे के साथ बुरा.. ये हमारा Attitude हो सकता है लेकिन बुरे के साथ भी अच्छा करना यह हमारी महासती ऋषिदत्ता का Attitude है.. अब कौनसा Attitude अपनाना वह हमें सोचना होगा। 

रुक्मिणी को कनकरथ मिल गया और कनकरथ को ऋषिदत्ता मिल गई।

हम सोचेंगे कि Wow क्या मस्त Beautiful Ending है.. लेकिन नहीं.. अभी तक एक गुत्थी सुलझी नहीं है।

और वह यह है कि आखिरकार महासती ऋषिदत्ता ने ऐसा क्या पाप किया था कि उसे इस तरह से कलंकित होना पड़ा था। आखिरकार ऋषिदत्ता के प्रति रुक्मिणी को जो ईर्ष्या उत्पन्न हुई थी उसके Base में क्या था?

उसके Base में एक ऐसी हकीकत है जो हमें हिलाकर रख देगी..
जानेंगे अंतिम Episode में..

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