Who Has The Right To Correct A Misguided Sadhu? : Jainism’s Bold & Eye Opening Forgotten Truth!

साधु भगवंत भटक जाए तो हमारी क्या जिम्मेदारी है?

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By Jain Media 49 Views 29 Min Read

भटके हुए साधु भगवंतों को सुधारने का अधिकार किसका?

यह पंचम काल बहुत ख़राब है, इसलिए संसारियों की हालत तो ख़राब है ही लेकिन कुछ Jain और Non-Jain साधु-संतों के जीवन में भी कुछ गड़बड़, कुछ गंदगी देखने को, सुनने को अथवा जानने को मिलती है। 

‘साधु होकर ऐसा कर दिया’ इस Shock के कारण कुछ धर्म प्रेमी लोगों को बहुत बड़ा धक्का लगता है, आस्था को चोट पहुँचती है, कुछ साधुओं की गड़बड़ के कारण सभी महात्माओं के प्रति दुर्भाव अथवा द्वेष भाव खड़ा हो जाता है। 

समझदार, शासनप्रेमी, सज्जन लोगों को अत्यंत पीड़ा होती है। सज्जन श्रावक वर्ग कुछ करने का प्रयास भी करते हैं लेकिन जब उन्हें Result नहीं मिलता तब उनका दुःख और भी ज्यादा बढ़ जाता है। ऐसे में हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं? 

क्या हमें ऐसे साधुओं को सुधारने का अधिकार है? क्या ऐसे विषयों में पड़ना चाहिए भी या नहीं? सुधारेंगे नहीं तो इनके कारण दूसरे लोग भी भ्रष्ट होंगे? ऐसे भटके हुए साधुओं को सुधारने का अधिकार किसका है? 

ऐसे अनेकों प्रश्नों के उत्तर इस Article में हमें एक दम स्पष्ट रूप से मिल जाएंगे। आज सभी लोगों को इस गंभीर विषय में Guidance की आवश्यकता है ऐसा हमें लगता है। 

इसलिए हमने Jain Media की तरफ से एक ज्ञानी महात्मा को प्रश्नों की List भेजी थी और उन्होंने लगभग 400 वर्ष पुराने उपदेश रहस्य ग्रंथ की कुछ गाथाओं के आधार पर बहुत ही सुंदर रूप से इन संवेदनशील प्रश्नों का समाधान दिया है। 

आगे बढ़ने से पहले इतना Clearly कह देते हैं कि इस Article को अंत तक आपको पढना होगा, क्योंकि Half Knowledge is Dangerous…  

महोपाध्याय श्री यशोविजयजी महाराज साहेब ने यह ग्रंथ बनाया था और वह महापुरुष जैनों में, खासकर जैन साधु-साध्वीजी भगवंतों में अत्यंत बहुमान्य-आदरणीय है। 

तो आज उनके ही वचनों के आधार पर हम Real Time Examples के साथ इस Topic को समझने का प्रयास करेंगे। आप देख रहे हैं Jain Media, बने रहिए इस Article के अंत तक। 

यह कलिकाल है यानी बहुत खराब काल है। तो इस काल के खराब असर के कारण आज के समय में बहुत साधु-संत हमें खराब अथवा भटके हुए मिलेंगे। सभी को सुधारना नामुमकिन होगा। हम अगर उनके साथ Contact में रहेंगे तो हमारी आत्मा भी बिगड़ सकती है। 

इसलिए उनसे दूर रहना है और जो अच्छे साधु मिले उन पर बहुमान करना, उनके साथ Contact में रहना है। उससे हमारा कल्याण होगा। 

प्रश्न : खराब साधुओं को देखकर गुस्सा आता है, उनको गालियां देने का मन होता है, चारों ओर उनको Expose करने का मन होता है। उनके कपड़े खींचकर वापस संसारी बना देने का मन होता है। 

कभी-कभी तो ऐसा गुस्सा आता है कि क्या कहना। यह जो द्वेष मन में आ रहा है, वह क्या सही है? हमें क्या करना चाहिए?

उत्तर : देखिए कोई भी जीव कितना भी पापी क्यों ना हो, कितना भी!! उसके ऊपर गुस्सा करने का, उसकी निंदा करने का हमें कोई अधिकार नहीं है। गुस्सा करने का या निंदा करने का अधिकार प्रभु का शासन हमें बिलकुल नहीं देता। 

उनसे दूर जरूर रहना है लेकिन द्वेष तो नहीं ही करना है। इस बात को हम एक दृष्टांत से समझते हैं।

जब कोरोना काल था तब लाखों लोगों को वह Contagious रोग हुआ था। Contagious रोग यानी संपर्क या स्‍पर्श द्वारा फैलने वाला रोग। उस समय हम क्या करते थे? कोरोना जिसको भी हुआ हो उनसे Distance बनाकर रखते थे।

उन्हें Touch नहीं करते थे, Infact उनके पास भी नहीं जाते थे। चाहे वे हमारे परिवार के सदस्य ही क्यों ना हो जैसे मां-बाप-पति-पत्नी-भाई-बहन-बेटा-बेटी कोई भी हो लेकिन हम उनसे दूर ही रहते थे। 

अब यहां पर हमें सोचना है कि

1. जो मां-बाप या किसी भी सदस्य को कोरोना हुआ उसमें क्या उनकी गलती है? नहीं। वह कोरोना काल का भयानक प्रभाव ही ऐसा था कि मां-बाप को या किसी भी सदस्य को कोरोना हुआ। 

2. हम उनसे दूर रहते थे तो क्या हमको उनके ऊपर द्वेष था? क्रोध था? नहीं। सिर्फ और सिर्फ अपनी Safety का भाव था। 

3. हमको उनके ऊपर प्रेम था? था.. बहुत था। इसलिए उनकी Treatment अच्छे से करवाने प्रयास भी किया होगा। 

4. जब हम उनका कोरोना रोग मिटा नहीं पाए, जब वे कोरोना के कारण बहुत परेशान थे तब हमको उनके लिए करुणा जागी या क्रोध आया? उनकी परेशानी देखकर हमें दुख ही होता था, आंसू बहते थे लेकिन उनके ऊपर तो करुणा ही थी, प्रेम ही था ना? 

तो यह बात यहां पर भी समझनी है। 

A. यह खराब काल के प्रभाव से वह साधुओं में खराब आचार खड़े हुए हैं। उसमें उनकी गलती है या खराब काल की? खराब काल की ही गलती है। 

B. हम उनसे दूर रहेंगे, उन्हें Contact या परिचय नहीं करेंगे। उनके पास जाएंगे ही नहीं लेकिन हमको उनके ऊपर द्वेष या क्रोध भाव नहीं होना चाहिए। सिर्फ और सिर्फ अपनी आत्मा की Safety का ही भाव होना चाहिए। 

‘उनके Contact में रहने से मेरे जीवन में ऐसे दोषों का प्रवेश न हो जाए।’ यह भाव से ही उनसे Distance रखना है। 

C. हमको उनके ऊपर प्रेम है? होना ही चाहिए। आखिर हर एक जीव के प्रति प्रेम रखना ही है। तो यह तो सिर्फ जीव नहीं है, साधु है। काल के प्रभाव से भले भटक गए हैं लेकिन आखिर वह हमारे परिवार के सदस्य जैसे ही है। 

वह सुधरे उसकी मेहनत अंदर के प्रेम भाव से, स्नेह भाव से करनी चाहिए। द्वेष से या क्रोध से नहीं। याद रहे एक जीव के प्रति भी यदि द्वेष हैं तो हमारा मोक्ष नहीं होनेवाला है।

D. मेहनत करने के बाद भी अगर हम उनको सुधार ना पाए, वह अपनी गलतियों में ही डूबे रहे, तब हमको ज्यादा करुणा ही आनी चाहिए। क्रोध बिल्कुल भी नहीं। हमें यही भाव रखने हैं कि ‘यह जीव का भविष्य में क्या होगा?’

अगर कोरोना काल के Example के साथ हम इस चीज को सोचेंगे तो यह स्पष्ट हो ही जाएगा कि उनसे दूर रहना और उन पर द्वेष नहीं करना यह Possible है। 

“द्वेष नहीं करना।” यह कहना बहुत आसान है लेकिन Apply करना बहुत मुश्किल। इसलिए पहले द्वेष का मतलब समझ लेते हैं ताकि हमें पता चले कि हमारे अंदर द्वेष के भाव है या नहीं। 

द्वेष के अनेक स्वरूप है। जैसे कि 

1. वह भटके हुए साधु को देखकर या उनका Photo देखते ही हमारा मन बिगड़े, हम सहन नहीं कर पाएं, Face बिगड़े-मन बिगड़े, उनके लिए ख़राब भाव आए-यह है द्वेष। 

2. उनका पक्ष लेनेवाले लोग जब उनके Support में बातें करें या कोई नादान लोग उनकी तारीफ करें या Normally उनकी कोई भी बात होती हो और हम उसे सहन नहीं कर पाए, खून खौलने लगे-यह है द्वेष। 

3. हम उनकी निंदा करें, दूसरों को उनके दोष बोले, चारों ओर अनावश्यक बिना कोई प्रयोजन के उनके दोषों का प्रचार करें, तो यह है द्वेष। ऐसा द्वेष हमें नहीं करना है। 

जैसे हम कोरोना वाले इंसान को देखते हैं, वैसे हमें खराब साधु को देखने में आए तो Face नहीं बिगाड़ना है, मन नहीं बिगाड़ना है। जैसे कोरोना वाले की बात कोई करते हो तो हम शांति से सुनते हैं, वैसे खराब साधु की बातें कोई करें तो हम शांति से सुनें, ना कि मन या Face बिगाड़ें। 

जैसे हम कोरोनावाले की निंदा नहीं करते, वैसे हम उनकी निंदा नहीं करें, चारों ओर उनकी गलतियों का प्रचार ना करें। एक बात बहुत ही Clear हो जानी चाहिए कि द्वेष करके किसी को सुधारने की आज्ञा या अनुमति भगवान किसी को भी नहीं देते हैं। 

प्रश्न : हमें तो ऐसे भटके हुए साधुओं पर अनेक प्रकार के द्वेष आ ही जाते हैं। वह ना आए उसके लिए क्या करना चाहिए? 

उत्तर : Solution है। चिंतन करके द्वेष दूर करना है। वह चिंतन इस प्रकार हो सकता है : 

1. आज हम जिन प्रभु महावीर को पूजते हैं, जिन्हें प्रभु मानते हैं, वही प्रभु महावीर का जीव 18वें भव में कितना ख़राब और क्रूर था। जैसे कोई व्यक्ति कपडे के दो टुकड़े करता है, वैसे प्रभु के जीव ने उस 18वें भव में शेर का मुंह पकड़कर उसके दो टुकड़े करके मार डाला था। 

18वें भव में वही प्रभु माहवीर का जीव जो त्रिपृष्ट वासुदेव के रूप में था, उस जीव ने, सिर्फ अपनी नींद बिगड़ी तो निर्दोष नौकर के कान में गरम-गरम सीसे का रस डलवाया था। वही जीव आगे चलकर हमारे 24वें तीर्थंकर करुणा के सागर प्रभु महावीर बने।

2. जो स्थूलभद्र को हम रोज याद करते हैं, वंदन करते हैं, वह ही स्थूलभद्र, उसी Same भव में 12 वर्ष तक एक वेश्या के साथ मैथुन सेवन करते रहे थे। वही स्थूलभद्रजी का नाम ब्रह्मचर्य के कारण 84 चौबीसी तक अमर रहेगा।

ऐसे तो हजारों Examples हमें मिल जाएंगे जिनमें आत्मा पहले महापापी थी लेकिन बाद में वही आत्मा सभी के लिए वंदनीय और पूजनीय बनी। 

तो आज यह जो भी साधु-संत भटके हुए हैं अथवा खराब काम कर रहे हैं, वह इसलिए कि आज उनके पाप कर्म बहुत भारी है। हम कितनी भी मेहनत करें तो भी हम उनको सुधार नहीं पा रहे हैं लेकिन एक Time उनका भी आएगा ही कि वे भी प्रभु महावीर या स्थूलभद्रजी बनेंगे। 

मान लो वे नहीं भी सुधरे तो भी हम उन पर द्वेष करके अपनी आत्मा में द्वेष का ख़राब गुण क्यों पैदा करें? कुदरत उनके कर्मों के लिए उन्हें माफ़ नहीं करने वाली तो हमारे द्वेष के लिए क्या हमें माफ़ कर देगी? बिलकुल नहीं। 

अगर हमको कोई विशिष्ट ज्ञानी बोल दे कि ‘आज यह जो साधु भटका हुआ हैं अथवा खराब दिख रहा है, वह 8-10 भवों के बाद तीर्थंकर या गणधर बनकर मोक्ष में जानेवाला है। तो क्या हमें उनके ऊपर द्वेष आएगा? नहीं ना। 

तो आज भले हमें कोई ऐसा बतानेवाले विशिष्ट ज्ञानी नहीं मिले लेकिन यह Possible तो है ही और यह बात तो Fix है कि वह साधु कितने भी खराब क्यों ना हो लेकिन उन सभी ने शत्रुंजय के दर्शन किए हैं, यात्रा की है। 

शायद नव्वाणु और छठ करके 7 यात्रा भी की होगी तो वे अवश्य कभी ना कभी मोक्ष में तो जाने ही वाले हैं। सिद्ध भगवान तो बनने ही वाले हैं तो भविष्य में सिद्ध भगवंत बननेवाली उस आत्मा पर द्वेष क्यों करना? बस एक बात Fix है कि हमें हमारी Safety के लिए उनसे दूर रहना है। 

प्रश्न : जैसे हम कोरोना वाले से दूर रहते हैं और कोई उसके पास जाता हो तो मना भी करते हैं कि ‘देखो यह कोरोनावाला है, उनके पास मत जाना। नहीं तो आपको भी कोरोना हो सकता है। 

वैसे ही यहां पर भी हम लोगों को बता तो सकते हैं ना कि यह साधु भटके हुए हैं अथवा ख़राब है, इसलिए उनसे दूर रहना। वरना आपको नुकसान होगा। तो उसके लिए हमें चारों ओर उनकी गलतियों का प्रचार करना ही पड़ेगा। 

प्रश्न बहुत ही Logical है, अब उत्तर देख लेते हैं।

1. जो लोग उस खराब साधुओं के पास जाते हो या जानेवाले हो उनको जरूर हम यह चीज विवेकपूर्वक बिना द्वेष किए बता सकते हैं लेकिन बाकी के लोगों को बताने की जरूरत नहीं है। 

2. हम अगर उनकी गलतियों का प्रचार करते हैं तो क्या हमारे मन में द्वेष तो नहीं है ना? प्रेम भाव-स्नेह भाव ही है ना? वह पहले अवश्य Check करना होगा। 

3. प्रचार करना भी हो तो उसी तरह करना जिससे दूसरे लोग उनसे दूर रहे बस। लेकिन उनके ऊपर द्वेष करे ऐसा नहीं होना चाहिए। यह बात का पूरा ध्यान रखना बहुत ही जरूरी है। 

4. सबसे बड़ी बात यह है कि जब हम किसी दो-पांच कोरोनावालों के लिए सबको ऐसा कहते हैं कि ‘इससे दूर रहो’ तब लोग उन 2-5 लोगों से ही दूर रहते हैं, बाकी सब से नहीं और द्वेष नहीं करते हैं। 

यहां पर गलत यह हो जाने की संभावना है कि हम दो-पांच भटके हुए साधुओं के लिए जब ऐसा प्रचार करते हैं कि ‘यह खराब है, उनसे दूर रहो’ तो बाकी के सब लोग शायद यह सोचते हैं कि ‘सभी साधु ऐसे ही होंगे’ और वह लोग सभी साधुओं से दूर भागना शुरू कर देते हैं। 

दो-पांच साधु की गलतियों के कारण लाखों लोग अगर सब साधुओं से दूर भागते जाएंगे तो नुकसान किसका? अच्छे साधुओं के Contact को छोड़ने से वह लाखों लोगों को ही नुकसान होने वाला है। 

उससे धर्म को-शासन को नुकसान होगा। लोग अच्छे साधुओं के साथ जुड़कर ही धार्मिक बनते हैं। अगर नहीं जुड़ेंगे तो दुनिया में अधर्मी ही बढ़नेवाले हैं-धर्मी नहीं। 

इसके लिए हमें अगर किसी को बताना भी हो कि यह साधु भटके हुए हैं अथवा खराब है तो बहुत सोच समझकर बताना होता है, बहुत सावधानी रखनी होती है। कोई संविग्न गीतार्थ गुरु भगवंत की राय लेकर बताना होता है। 

अगर गुरु भगवंत मना करें तो चुप बैठना होता है। अगर वे मना करें तो खुद की आत्मा की Safety कर ले, बस इतना काफी है। 

प्रश्न : वैसे तो हम भटके हुए साधुओं से दूर रहेंगे लेकिन कभी कारणवश उनके पास जाना पड़े, उनके साथ रहना पड़े, उनके साथ बात करनी पड़े, ऐसी अनेक विचित्र परिस्थितियों का निर्माण हो तो तब क्या करना? 

उस समय उन्हें वंदन करना या नहीं? उनकी तारीफ करना या नहीं? उनके साथ मीठा व्यवहार करना या नहीं? अगर साथ मिलकर भी, साथ रहकर भी हम उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करेंगे तो उनको हमारे ऊपर गुस्सा आने ही वाला है और वे भटके हुए तो है ही तो गुस्से में आकर किसी न किसी तरीके से हमको बदनाम करेंगे। 

हमारे में कोई बड़ा दोष नहीं होगा तो भी वे तो झूठ बोलकर हमें दुष्ट साबित कर देंगे और हमारे अंदर भी छोटे-छोटे दोष तो होते ही है तो उसको पकड़कर वे चारों ओर हमारी धज्जियां उड़ाएंगे। यह तो ‘चोर कोतवाल को डांटे’ ऐसी हालत हो जाएगी, तो ऐसे में क्या करना? 

इस सब से बचने के लिए हमें तो यह लगता है कि अगर कारणवश खराब साधुओं को मिलना भी पड़े तो उनको वंदन करना, Basic व्यवहार करना ही ठीक है, ताकि वह हमारे दुश्मन ना बने। 

आज का जमाना विचित्र है, आज सज्जनों से ज्यादा दुर्जनों की ताकत भारी होती है और उनसे लड़ना हमारे बस की बात नहीं है तो क्या हम उनके साथ Basic व्यवहार करें? क्या यह चलेगा? या हमें पाप लगेगा?

इस प्रश्न के उत्तर को बहुत ही Focus के साथ समझना होगा। पहले तो एक दम क्लियर है कि कुछ भी हो जाए, हो सके तब तक दूर ही रहना है, अब अगर कारणवश मिलना पड़ जाए तो वंदन कर सकते हैं, बाहर से Basic व्यवहार कर सकते हैं लेकिन सिर्फ अपनी Safety के लिए करना है। अंदर के भाव से नहीं। 

इतनी Clarity होनी ही चाहिए। ये अंदर बाहर वाला समझना थोडा Challenging है इसलिए इस पदार्थ को समझने के लिए एक छोटी सी Story जाननी होगी। 

एक ज्योतिषी ने राजा को कहा कि ‘आनेवाली बारिश का पानी ऐसा होगा कि जो भी वह पानी पीएगा वह पागल बनेगा। इसलिए आप पुराना पानी इकट्ठा कर लो, Store कर लो।’ राजा ने और बाकी सभी ने भी, पुराने पानी का Storage कर लिया। 

Time बीतता गया और कुछ समय के बाद सबका पुराना पानी खाली हो गया तो सब ने नया पानी पीया जो कि बारिश का पानी था और सब पागल बन गए। नाचना-कूदना-हंसना-चिल्लाना-कपड़े निकालना ऐसा सब करने लगे। 

राजा और मंत्री के पास पुराने पानी का Stock था तो वे तो पागल नहीं बने। अब हुआ यह कि बाकी सब पागल बन चुके थे तो उन पागलों को ऐसा लग रहा था कि हम सब तो Normal है और यह राजा और मंत्री हम से थोड़े अलग है और विचित्र है इसलिए अब उनको राजा के पद से उतार देते हैं।’ 

मंत्री चतुर था, उसने लोगों की बात जानकर राजा को सलाह दी कि ‘राजन् हमें अगर शांति से जीना हैं तो जब हम इन लोगों के साथ होते हैं तब उनकी तरह पागल जैसा व्यवहार करना पड़ेगा।’ 

अब राजा और मंत्री खुद Smart होने के बावजूद भी, शांति से जीने के लिए-बाहर से तो पागलों के साथ पागलों जैसा व्यवहार करने लगे। तो उन पागलों ने अब राजा और मंत्री को हटाने का निर्णय Cancel कर दिया। 

दूसरे साल अलग बारिश हुई। वह पानी पीने से सबका पागलपन चला गया और सब वापस पहले जैसे हो गए। राजा मंत्री तो पहले से ही अच्छे थे, पागल नहीं थे, फिर सब कुछ Normal हो गया। 

राजा यानी हम सब, मंत्री यानी हमारी सद्बुद्धि। नया पानी पीकर पागल बने हुए लोग यानी कलिकाल के प्रभाव से भटके हुए अथवा ख़राब बने हुए साधु वगैरह। 

In short, The Moral Of This Story is: 

1. भटके हुए अथवा खराब साधु संतों के साथ किसी भी प्रकार का Contact रखना ही नहीं। दूर ही रहना। अच्छे साधु संतों के साथ ही हमेशा संपर्क में रहना। 

2. अगर कोई कारणवश, कभी उनके साथ Contact हो भी जाए, साथ में कुछ समय के लिए रहना भी पड़े तो फिर देख लेना है कि अगर उनके साथ Basic व्यवहार ना करें तो भी वह हमारा कुछ भी बिगाड़ पाएं, इतनी शक्ति ही ना हो तो Basic व्यवहार करने की भी जरूरत नहीं है एवं जल्द ही उस स्थान से निकलने का प्रयास करना है।

3. लेकिन वह अगर कुछ भी बिगाड़ने की शक्ति रखते हो तो फिर उनके साथ बाहर से Basic व्यवहार करके उनको शांत कर देना है। उनके मन में दुश्मनी-द्वेष खड़ा हो ऐसा बिल्कुल नहीं करना है। 

प्रश्न : ऐसे कैसे चल सकता है? शास्त्रों में तो श्रावक-श्राविकाओं को साधुओं के माता पिता की उपमा दी गई है तो क्या यह ज़िम्मेदारी नहीं कि हम उन्हें सुधारे।

4. अगर परिपक्वता हो, अगर शक्ति हो, तो प्रेम से-वात्सल्य से-मैत्री भाव से उन्हें सुधारने की मेहनत करनी है। अगर लगे कि यहां पर कुछ भी फल मिलनेवाला नहीं है तो फिर मौन हो जाना है। हमारी सबसे पहली जिम्मेदारी अपनी आत्मा बिगड़े ना, उसकी है। 

उसके बाद दूसरी कोई भी जिम्मेदारी आती है। ‘मेरी आत्मा का क्या होगा?’ वह सोचने के बाद, अपनी Safety करने के बाद, दूसरों का क्या होगा? शासन का क्या होगा? वह सोचना है, उससे पहले नहीं। 

और यह Fix है कि पापी से पापी जीव के प्रति भी द्वेष-क्रोध-तिरस्कार-धिक्कार या निंदा करने से कभी भी अपनी आत्मा का कल्याण होने वाला नहीं ही है। 

प्रश्न : शासन के लिए हम नहीं लड़ेंगे तो कौन लडेगा? सैंकड़ों गुरु भगवान पाट पर से उपदेश देते ही तो हैं कि शासन के लिए बलिदान देने की हमारी तैयारी होनी चाहिए।

उत्तर : देखिए इसके लिए पहले खुद की परिपक्वता, खुद की शक्ति एवं खुद का पुण्य Check करना चाहिए। ‘बाहरी दुश्मन से लड़ना’ वह अलग विषय है और ‘कोई साधु अपने मार्ग से भटके तो उन्हें सुधारना’ वह अलग विषय है। दोनों के लिए एक समान Step नहीं लिए जा सकते। 

इसलिए पहले खुद में विवेक की जागृति लाना बहुत महत्वपूर्ण है। भारत की रक्षा के लिए सरहद पर सेना लड़ती है, प्रजा नहीं। प्रजा अपने-अपने घर पर रहकर अपनी सुरक्षा करती है और प्रार्थना करती है कि ‘सेना को विजय मिले।’ 

वैसे ही जो समर्थ है-सक्षम है, शक्तिमान और पुण्यवां है वह अपनी आत्मा का कुछ भी बिगाड़े बिना, खराब साधुओं को सुधारने की मेहनत करे तो उनका Support करना है, लेकिन अगर उन्हें भी लगता हो कि इसमें कुछ फल मिलनेवाला नहीं है तो फिर निष्फल प्रयासों को छोड़कर दूसरे अनेक Positive कार्यों में अपनी शक्ति का सदुपयोग करना है। 

यह शास्त्रों की आज्ञा है। विवेकी व्यक्ति इस विषय को समझ पाएगा और उस अनुसार कार्य करेगा, जो अविवेकी होगा, हो सकता है वो पहले थोडा नाराज़ हो कि ये क्या बात हुई ऐसे थोड़े ही जिनशासन चलेगा लेकिन शांति से चिंतन करने पर उसे भी लगने लगेगा कि नहीं पहले मैं खुद विवेकी बन जाऊं, फिर इस तरह के कार्य हाथ में लूँ तो ही शासन के हित में होगा।

श्री कुलकसंग्रह में कहा है कि ‘आज के काल में जो भी भटके हुए अथवा खराब साधु है, उनकी निंदा मत करना। सभा में तारीफ भी मत करना। उनके ऊपर करुणा करना। 

अगर Possible हो तो सुधारना और अगर हमारी सुधारने की प्रवृत्ति से, हमारे समझाने से उन्हें गुस्सा आता हो तो चुप हो जाना। फिर उनके दोष नहीं बोलना।’ 

प्रश्न : ऐसे तो फिर कोई भी सुधरने से रहा, और कोई सुधारने की कोशिश भी नहीं करेगा।

उत्तर : देखिए सुधारने का निषेध नहीं किया है, लेकिन परिस्थिति क्या है उसे देखकर उसके अनुसार कार्य करना होता है। एक व्यापारी भी जहाँ पर Loss हो वहां पर Invest नहीं करता। 

मान लेते हैं कि उसने एक जगह पर Invest किया और Risk था लेकिन कोई कारण से Loss हुआ, अब अगर वो सुलझा हुआ व्यापारी है तो जहाँ पर Profit की संभावना नहीं हो या फिर बहुत कम हो वहां पर फिर से Invest नहीं करेगा। 

उल्टा वो ऐसे स्थान पर Focus करेगा जहाँ पर Profit ज्यादा हो। तो इसी तरह परिपक्व, पुण्यवान, शक्तिमान श्रावकों को, भटके हुए साधुओं को सुधारने की कोशिश करनी ही है, लेकिन करने के बाद भी सामने फायदा नहीं दिख रहा है, Solution नहीं दिख रहा है, तो शासन के दूसरे बहुत से कार्य है जिसमें शासन को बहुत फायदा हो सकता है, उन पर Focus करना है और उनमें समय Invest करना है। 

अंत में एक श्लोक लेकर यह Topic पूर्ण करते हैं। 

आज से 2500 साल पहले प्रभु महावीर के हाथों से दीक्षा लेनेवाले श्री धर्मदासगणि ने अपने उपदेशमाला ग्रंथ में कहा है कि ‘आज बहुत सारे भटके हुए अथवा खराब साधु हैं।’ 

यह जानकर जो जीव मध्यस्थ नहीं बनता है और उन साधुओं के ऊपर तिरस्कार-धिक्कार-द्वेष-निंदा के भाववाला बनता है, वह अपनी आत्मा का हित नहीं कर पाएगा और जैसे कौआ विष्ठा में यानी Potty में चोंच मारता रहता है, वैसे इन जीवों का स्वभाव भी धीरे-धीरे उस कौए जैसा बन जाएगा। 

वह भी खराब साधुओं के छोटे-मोटे दोष रूपी विष्ठा में अपनी मन रूपी चोंच को लगाता रहेगा यानी उसका स्वभाव ही ऐसा बन जाएगा कि वह खराब साधुओं के छोटे-मोटे दोष को ही देखता रहेगा। 

सोचिए खराब साधु तो खराब है, लेकिन जो उनको देखकर क्रोध-द्वेष-निंदा करे, वो खुद कौआ बन जाता है-विष्ठा में चोंच मारनेवाला कौआ। यह बात हम हमारे मन से नहीं कह रहे हैं, उपदेशमाला ग्रंथ की यह बातें हैं।

प्रश्न : ऐसे जीव के प्रति मध्यस्थ बनना यानी कि क्या?

उत्तर : मध्यस्थ बनना यानी जो जीव अज्ञान में डूबे हुए हों, भटके हुए हो, उनके प्रति गुस्सा नहीं, तिरस्कार नहीं, धिक्कार नहीं, द्वेष नहीं, निंदा नहीं, बस उपेक्षा। उपेक्षा यानी Ignore करना। उनके प्रति ख़राब भाव हमें नहीं लाने है यही हमारी आत्मा के लिए हितकर है।

तो श्री उपदेश रहस्य ग्रंथ की गाथा नंबर 146 से 149 का आधार लेकर यह Topic हमनें ज्ञानी गुरु भगवंत के माध्यम से विस्तार से समझने का प्रयास किया है। अगर आपको यह Article उपयोगी लगा तो ज़रूर दूसरों तक पहुँचा सकते हैं। 

इस विषय में अगर आपको कोई भी Doubts हों, Questions हों तो Comments में हमें बता सकते हैं एवं ज्ञानी गुरु भगवंत के पास जाकर उसका Solution पा सकते हैं। 

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