Inspirational Life Story Jain Acharya Shri Meghvallabh Surishwarji Maharaja

एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने असंभव को संभव कर दिखाया.

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This Man Made Impossible – I Am Possible

एक धर्मनिष्ठ श्राविका बहन एक महात्मा के पास जाकर कहते हैं कि ‘साहेबजी, आपको एक चौंका देनेवाली घटना बताती हूँ. आज से कई साल पहले एक नास्तिक जैसे लड़के से एक धार्मिक परिवार की लड़की का रिश्ता तय हुआ. 

रिश्ते की शुरुआत मंगलमय हो, उसके लिए अगले दिन लड़की ने आयंबिल तप किया. अगले दिन वह लड़का, उस लड़की को Dinner के लिए Restaurant लेकर गया और उससे पूछा कि ‘क्या खाओगी?’ तो लड़की ने कहा कि ‘आज तो आयंबिल है.’ 

यह सुनकर लड़के को गुस्सा आ गया और उसने लड़की से साफ़ साफ़ कह दिया कि ‘अगर मेरे साथ रिश्ता करना है, तो ये धार्मिक चीजें छोडनी होगी, नहीं तो हमारा रिश्ता नहीं हो सकता.’ 

लड़की थोडा घबरा गई और उसने ना चाहते हुए भी लड़के की बात मान ली. उस दिन लड़के ने उस लड़की का आयंबिल का पच्चक्खान तुड़वाकर Restaurant में भोजन करवाया. 

What Is Ayambil In Jainism?

उस लड़की ने आगे कहा कि ‘साहेबजी कर्मों का खेल कैसा निराला है ना? जो व्यक्ति एक समय में इस तरह का अधर्मी और नास्तिक था, वे आज 181 वर्धमान तप की ओलीजी के आराधक हैं और वो लड़की और कोई नहीं बल्कि मैं ही हूँ और वो लड़का….’ 

जी हाँ! चौंक गए ना लेकिन सही सुना आपने. 

कई लोगों को ऐसा लगता है कि हमारी Lifestyle तो जैनधर्म के Principles से बिलकुल ही अलग है, Opposite है, हमारे अन्दर तो जैनधर्म के Basic Principles को Follow करने का Potential ही नहीं है. तो ऐसा सोचनेवाले सभी लोगों के लिए इस व्यक्ति की Life Story एक Inspiration है. 

“एक व्यक्ति के जीवन में इतना Drastic Change कैसे आ सकता है?”
यह कहानी हमें ऐसा सोचने पर मजबूर कर देगी. तो आखिर यह व्यक्ति कौन हैं? और इनके जीवन से जुडी कुछ Mind Blowing घटनाएं भी है, जो आज हम जानेंगे. 

बने रहिए इस Article के अंत तक. 

बचपन के कारनामे 

गुजरात के भावनगर निवासी श्रीमती प्रभाबेन कांतिलालजी के यहाँ वर्ष 1940 में बालक महेंद्र का जन्म हुआ. बचपन से ही वे बहुत ज्यादा शरारती और तूफानी थे. 

School में महेंद्र भाई ने एक बार PT Sir को Exercise करने से खुल्लम खुल्ला मना कर दिया. PT Sir ने सामने बोलने के लिए महेंद्र भाई को थप्पड़ मार दिया. कुछ देर बाद Principal Office में Collar पकड़कर लाया गया. 

आपको लग रहा होगा कि PT Sir बालक महेंद्र को Collar पकड़कर लाए होंगे, Right? लेकिन यहाँ पर Case उल्टा था. बालक महेंद्र के हाथ में PT Sir का Collar था और बालक महेंद्र ने Principal को गुस्से में कहा कि ‘इन्होंने मुझे मारा कैसे?’ 

उस School से Student महेंद्र को Dismiss कर दिया गया. 

एक बार महेंद्र भाई अपने 5-6 दोस्तों के साथ एक Public Gathering में गए थे. वहां पर Chaotic Situation बनने के बाद एक Police वाले ने महेंद्र भाई के दोस्त को डंडा मार दिया और तभी गुस्से में आकर उन सभी दोस्तों ने मिलकर Police वाले के साथ हाथापाई कर दी थी. 

अगले दिन ‘5 -6 युवानों ने एक Police वाले के साथ हाथापाई की’ यह खबर Newspaper में आ गई और उनके दादाजी ने उनसे पूछा कि ‘कहीं तू तो इन सब में Involved नहीं था ना?’ तो महेंद्र भाई ने हंसते-हंसते मना कर दिया. 

महेंद्र भाई के माताजी प्रभा बहन धार्मिक थे और महेंद्र भाई में धार्मिक संस्कारों का सिंचन हो, इसलिए वे Daily महेंद्र भाई को 5 महात्मा को घर पर गोचरी के लिए लेकर आने पर 5 रुपये इनाम देते थे. उस समय के 5 रूपए यानी आज के 5 हजार जितनी Value समझ सकते हैं. 

महेंद्र भाई Daily उपाश्रय में जाकर पूज्य गुरु भगवंत को गोचरी की विनंती करते थे और किसी भी तरह से गोचरी के लिए लेकर आते थे. भले आँखों के सामने 5 रुपए थे लेकिन संस्कार गोचरी की विनंती के पड़ रहे थे. इस तरह से शरारत करते हुए उनका बचपन बीता और 20 साल की उम्र में वे भावनगर से मुंबई, अपने चाचाजी के साथ Business करने आए. 

Lavish Life In Mumbai

महेंद्र भाई एक Well Settled परिवार से Belong करते थे. आज के ज़माने में Parents अपने बच्चों को जितनी Freedom देते हैं, उतनी Freedom महेंद्र भाई को उस ज़माने में ही दे दी गई थी. Mumbai के हर Restaurant में जाकर खाना, घूमना-फिरना आदि यह सब उनकी Lifestyle हो गई थी जिसमें धर्म का नामोनिशान नहीं था. 

मुंबई के ही एक सुसंपन्न धार्मिक परिवार की लड़की नीरूजी का रिश्ता इन महेंद्र भाई के साथ तय हुआ और Starting में हमने जिन श्राविका बहन की घटना जानी थी, वह और कोई नहीं बल्कि इन्हीं महेंद्र भाई की पत्नी श्राविका नीरूजी थे और वह लड़का यह महेंद्र भाई थे जिन्होंने सगाई के अगले दिन ही अपनी होनेवाली पत्नी का आयंबिल का पच्चक्खान तुडवा दिया था. 

नास्तिक जैसा जीवन जीनेवाले महेंद्र भाई, अपनी पत्नी नीरूजी को भी धार्मिक क्रियाओं से दूर रखने का प्रयास करते थे जैसे कि सामायिक नहीं करने देना, मंदिर 10 Minute से ज्यादा नहीं जाने देना आदि. भावनगर से मुंबई आने के बाद तो वे पर्युषण को भी Ignore करने लग गए थे.  

खाने के शौक़ीन महेंद्र भाई, मुंबई में जब भी कोई भी नया Restaurant Open होता तो वहां पर सबसे पहले चले जाते थे. कपड़ों का भी शौक ऐसा था कि घर से तैयार होकर किसी Function के लिए निकलते और रास्ते में याद आता कि जो Shirt पहना है, वो पहले पहना हुआ है Already तो उसी समय कपड़ों की दुकान पर जाकर नए कपडे खरीदकर पहनते और फिर ही उस Function में जाते थे, इतने शौक़ीन. 

उनकी Lifestyle और Business ऐसा था कि उनकी दोस्ती और Contacts मुंबई के बड़े लोगों के साथ भी थे. 

अनोखा पारणा 

महेंद्र भाई और नीरूजी के दो बेटे थे-विकास और आशीष. महेंद्र भाई अपने दोनों बेटों से बहुत प्यार करते थे. वर्ष 1980 में एक बार विकास का Cycle चलाते समय Accident हो गया. 

उस समय महेंद्र भाई Business के काम से Factory में Busy थे और जब उन्हें Accident के बारे में पता चला तब महेंद्र भाई तुरंत वहां पर आ गए. Normally ऐसी Condition में ही किसी को भी भगवान का धर्म याद आता है. ऐसा ही कुछ यहाँ भी हुआ. 

रास्ते में उन्होंने संकल्प किया कि ‘अगर मेरा बेटा विकास ठीक हो जाएगा तो मैं कल से अट्ठाई करूँगा.’

Note : अट्ठाई यानी Non-Stop 8 उपवास. 

अगले दिन से पर्युषण भी शुरू होनेवाला था और जिन्होंने अपने जीवन में 1 उपवास भी नहीं किया था ऐसे महेंद्र भाई ने अट्ठाई की, Yes अट्ठाई. पारणे वाले दिन पूज्य नेमिसुरीजी महाराज साहेब के समुदाय के प.पू. आचार्य भगवंत श्री चंद्रोदयसूरीश्वरजी म.सा. महेंद्र भाई के घर पगलिये करने पधारे थे. 

यहाँ पर एक चौंका देनेवाली घटना बनी. महेंद्र भाई को पान मसाला खाने का व्यसन यानी Addiction था. अट्ठाई के पारणे के समय महेंद्र भाई Bathroom में गए और तीन नवकार गिनकर वहीं पर पान मसाला खाकर पारणा कर दिया. 

Note : पारणा यानी जब तपस्या पूरी होती है तब अगले दिन जब खाना-पीना शुरू करते हैं उसे पारणा करना कहते हैं. 

नीरूजी के भाई को, यानी महेंद्र भाई के सालेजी को जब यह बात पता चली कि उन्होंने Bathroom में पान-मसाले से पारणा कर दिया है तो उन्होंने तुरंत Bathroom में जाकर महेंद्र भाई को ताना देते हुए कहा कि 

आपने 8 दिन पान मसाला खाए बिना निकाले थे तो थोड़ी देर और Wait कर लेते. इससे पारणा करके आपने अट्ठाई की तपस्या को एक तरह से Waste कर दिया.

यह बात महेंद्र भाई को चुभ गई और उन्होंने Ego में आकर तुरंत पान मसाला थूक दिया और वहीं Bathroom में खड़े खड़े आजीवन के लिए पान मसाले का त्याग कर दिया. 

कई लोग अपनी बुरी आदतों को तीर्थ स्थानों में-जिनालय में-उपाश्रय में-परमात्मा या गुरु भगवंत के सामने त्याग करते हैं लेकिन महेंद्र भाई एक ऐसे अनोखे व्यक्ति थे जिन्होंने Bathroom में पान मसाले की बुरी आदत का त्याग किया था. 

कई लोग त्याग करके सत्व कम पड़ने पर फिर से लेना भी शुरू कर देते हैं लेकिन महेंद्र भाई ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने एक बार ठान लिया तो फिर पीछे नहीं हटते थे. इस त्याग के बाद एक दिन भी उनके मुंह में पान-मसाला नहीं गया. इसे ही सत्व कहते हैं. 

Turning Point 

कर्मसत्ता का खेल इतना निराला है कि पाप कर्मों का उदय आने पर एक व्यक्ति नास्तिक बनकर अपने जीवन में से धर्म को गायब कर देता है, अपने करीबी लोगों को भी धर्म से दूर करने की कोशिश करता है लेकिन सही समय आने पर अथवा सही निमित्त मिलने पर वही नास्तिक जैसे व्यक्ति का Unbelievable Transformation भी हो सकता है, जो कि महेंद्र भाई के साथ भी हुआ. 

मुंबई आने के बाद तो नास्तिक जैसे हो गए थे तो महेंद्र भाई को पूज्य साधु-साध्वीजी भगवंतों को गोचरी आदि वहोराना अब इतना पसंद नहीं था. जब भी कोई साधु भगवंत उनके घर पर गोचरी के लिए आते तो वे ‘ये जैन का घर नहीं है’ ऐसा कहकर दरवाजा बंद कर देते थे. 

वर्ष 1981 में एक बार एक महात्मा उनके यहाँ गोचरी के लिए आए और महेंद्र भाई ने ‘ये जैन का घर नहीं है’ ऐसा कहकर दरवाजा बंद कर दिया. महात्मा ऊपर के Floor पर एक भाई के यहाँ गोचरी के लिए गए. उन भाई ने महात्मा को बताया कि नीचे भी जैन का घर है, तब महात्मा ने उन्हें सब घटना बताई. 

वो भाई महात्मा के साथ महेंद्र भाई के घर आए और उनसे पूछा कि ‘महात्मा से झूठ क्यों बोला? आप जैन ही तो हो.’ महेंद्र भाई ने गुस्से में महात्मा से कहा कि ‘अभी 10 Minute पहले ही खिचड़ी बनाई थी जिसमें प्याज डाल दिया है. क्या आप लेंगे? वहोरेंगे?’ महात्मा समभाव में चुपचाप ‘धर्मलाभ’ कहकर वहां से चले गए लेकिन उस दिन महेंद्र भाई को उनकी इस हरकत पर बहुत पछतावा हुआ. 

उन्हें लगा कि वे खाखरा-ममरा-घी-दूध आदि कुछ तो वहोरा सकते थे, कंदमूल वाला भोजन Offer करके बहुत गलत किया. रात को प्रतिक्रमण के समय के बाद वे उपाश्रय गए जहाँ पर वो महात्मा विराजमान थे और महात्मा की गोद में सर रखकर खूब रोए और अपनी गलती के लिए माफ़ी मांगी. 

वहां से यह महेंद्र भाई का जीवन बदल गया और वे धर्म से जुड़ते गए, उन्होंने उस समय महात्मा को कंदमूल वाला भोजन Offer किया था तो आजीवन के लिए कंदमूल-जमीकंद का त्याग किया और फिर वर्ष 1982 में महेंद्र भाई ने हमेशा के लिए रात्रीभोजन का त्याग किया. 

पिता महेंद्रजी-बेटे विकास और आशीष की Games-Toys-कपडे आदि को लेकर लगभग हर इच्छा को पूरी करते थे. माँ नीरूजी ने भी अपने दोनों बेटों को बहुत अच्छी तरह से धार्मिक संस्कार दिए थे. 

एक दिन बेटे विकास और आशीष ने अपने पिता महेंद्रजी को कहा कि उन्हें ‘न्याय विषारद परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय भुवनभानुसूरीश्वरजी महाराज साहेब के चरणों में अपना जीवन समर्पण करके जैन दीक्षा लेनी है.’ 

महेंद्र भाई ने कुछ सोचकर कहा कि ‘ठीक है, अगर आपकी यही इच्छा है तो मैं भी आपके साथ दीक्षा लूँगा.’ उस समय उनकी श्राविका यानी नीरूजी थोड़े कमज़ोर पड़ गए और उन्होंने अपने श्रावक महेंद्रजी से कहा कि ‘हम दोनों बच्चों को दीक्षा लेने देते हैं, आप संसार में ही रहिए, हम यहाँ पर ही आराधना करेंगे.’ 

यहाँ Tables Turned वाली Situation हो गई. एक समय में सामायिक छुडवाने वाले, आयंबिल तुडवानेवाले, पर्युषण को Ignore करनेवाले ऐसे महेंद्र भाई ने अपनी श्राविका नीरूजी को संयम जीवन का Importance समझाया और दीक्षा के लिए Convince किया. 

उन्होंने पूज्य भुवनभानुसूरीजी म.सा. के पास जाकर कहा कि ‘आपके पास Buy 2 Get One Free का Offer है, यानी कि मेरे दोनों बच्चों के साथ मैं भी दीक्षा लेकर आनेवाला हूँ.’  महेंद्र भाई शायद एक मात्र ऐसे दिक्षार्थी थे जो खुद की दीक्षावाले दिन Self Drive करके यानी खुद गाडी चलाकर दीक्षा मंडप में आए थे. 

वर्ष 1984 में न्याय विषारद परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय भुवनभानुसूरीश्वरजी महाराज साहेब की निश्रा में नासिक शहर के पास संगमनेर में तीनों पिता और दोनों पुत्रों की दीक्षा हुई और महेंद्र भाई बने प.पू. मुनिराज श्री मेघवल्लभ विजयजी महाराज साहेब, विकास भाई बने प.पू. मुनिराज श्री उदयवल्लभ विजयजी म.सा. और आशीष भाई बने प.पू. मुनिराज श्री ह्रदयवल्लभ विजयजी म.सा.. 

Just Imagine, एक Time के नास्तिक, शौक़ीन व्यक्ति, जैन धर्म के अभी 4 Main Pillars में से एक-साधु बन गए थे. 

Drastic Change

पूज्य मेघवल्लभविजयजी म.सा. की Life के मौज-शौकवाले एक पहलु को तो हमने जाना लेकिन There are always 2 Sides of the Coin. दीक्षा जीवन उनके जीवन का दूसरा पहलु था जिसमें उनकी Personality में Drastic Changes आ गए थे.

दीक्षा के अगले दिन गोचरी मांडली में यानी गुरु भगवंत जब आपस में बैठकर जब भोजन ग्रहण करते हैं उसे गोचरी मांडली कहते हैं, तो वहां पूज्य भुवनभानुसूरीजी म.सा. ने पूज्य मेघवल्लभविजयजी म.सा. से पूछा कि ‘क्या आपसे आयंबिल होता है?’ 

पूज्यश्री ने कहा ‘गुरुदेव, आयंबिल करना नहीं जमता है.’ पूज्य भुवनभानुसूरीजी म.सा. ने उन्हें कहा कि ‘क्या आप मेरी एक बात मानोगे? आपको कल से 108 आयंबिल करने हैं.’ 

पूज्य मेघवल्लभविजयजी म.सा. का गुरु समर्पण ऐसा था कि आयंबिल कठिनाई से होता था उस बात को भूलकर गुरु आज्ञा तहत्ति की यानी स्वीकार की, जो गुरु ने कहा वह स्वीकार और गुरु की ऐसी कृपा हुई कि उन्होंने दीक्षा जीवन के 40 Years में 100 + 81 वर्धमान तप की ओलीजी Complete की. पूज्य मेघवल्लभ म.सा.एक वर्ष में लगभग 250 जितने दिन आयंबिल ही करते थे. 

Note : 100 ओली Complete करने में 14.5 साल जितना Time लगता है. Just Imagine – 100+81 वर्धमान तप की ओली. कितना Time लगा होगा?

महेंद्र भाई यानी पूज्य मेघवल्लभविजयजी म.सा. तीव्र गुस्सेवाले थे लेकिन जब देव-गुरु-धर्म की जब कृपा होती है तब क्रोधी व्यक्ति भी शांत इंसान बन जाता है, नास्तिक से आस्तिक बन जाता है और आत्मा, महात्मा बनकर परमात्मा भी बन सकती है. ज़बरदस्त Transformation पूज्यश्री के साथ भी हुआ. 

दीक्षा के कुछ समय के बाद पूज्य मेघवल्लभविजयजी म.सा.-प.पू. मुनिराज श्री चंदनविजयजी म.सा. की वृद्धावस्था के दौरान वैयावच्च करते थे जिन्होंने एक समय में युगप्रधान आचार्यसम प.पू. पंन्यास प्रवर श्री चंद्रशेखरविजयजी म.सा. को पढाया था,. 

एक बार लोच करवाने के अगले दिन पूज्य मेघवल्लभ म.सा., पूज्य चंदनविजयजी म.सा. के लिए गोचरी लेकर आए. लोच यानी हाथों से दाढ़ी-मुछ-सर के बालों को खींचकर निकालना, जैन साधु भगवंत का यह आचार है. लोच के पीछे क्या कारण है वह हम बहुत समय पहले एक Article में देख चुके हैं.

Reason Behind Kesh Loch

उम्र होने के कारण पू. चंदनविजयजी म.सा. ने सहारा लेने के लिए पू. मेघवल्लभ म.सा. के सर पर जोर से हाथ रख दिया और लोच कराए हुए सर पर तेज हाथ पड़ने से दर्द के कारण पूज्यश्री के हाथ से पात्रे छुट गए और भोजन सामग्री गिर गई. 

लेकिन पूज्यश्री का समता भाव इतना ज़बरदस्त था कि उन्होंने पू. चंदनविजयजी म.सा. को एकदम विनयपूर्वक कहा कि ‘साहेबजी, मुझसे गलती हो गई है, गोचरी गिर गई है, मैं ये साफ़ करके, आपके लिए वापस गोचरी लेकर आता हूँ.’ 

वर्ष 2016 में तीनों पिता पुत्र यानी प.पू. मुनिराज श्री मेघवल्लभ विजयजी महाराज साहेब, प.पू. मुनिराज श्री उदयवल्लभ विजयजी म.सा. और प.पू. मुनिराज श्री ह्रदयवल्लभ विजयजी म.सा. की आचार्य पदवी साथ में हुई थी. 

परम पूज्य आचार्य श्री उदयवल्लभ सूरीश्वरजी महाराज साहेब जो PYS यानी Perfecting Youth Session के लिए बहुत प्रसिद्द है. उन्होंने अभी Recently 200 PYS के Seminars Complete किए हैं जिसके लिए उन्हें इस Presigious Milestone के लिए Asia Book of Records द्वारा नवाज़ा गया था. 

पूज्य उदयवल्लभ सूरीश्वरजी महाराज साहेब पूज्य मेघवल्लभ सूरीश्वरजी महाराज साहेब के ही पुत्र है.

समता और विनय गुण की एक अद्भुत मिसाल और जिनकी Life कई लोगों के लिए Inspiration है, ऐसे परम पूज्य मेघवल्लभसूरीश्वरजी महाराज साहेब 40 वर्ष के संयम जीवन के बाद और 84 की Age में तारीख 28 December 2024 के दिन राजस्थान के श्री पावापुरीजी तीर्थ धाम में पूज्यश्री का देवलोकगमन हुआ. 

पूज्यश्री की यह Life Journey एक Testament है Human Potential का, Transformation Power का. उनके जीवन से हमें यह सीखने को मिलता है कि Changes Are Always Possible, No Matter How Impossible It May Seem. 

पूज्यश्री की Life हम सभी के लिए एक Inspiration है, एक Beacon Of Hope है. जो ऐसा सोचते हैं कि धर्म हमारे बस की बात नहीं है भाई, गलत सोचते हैं. पूज्य मेघवल्लभ सूरीश्वरजी महाराज साहेब की Life Story उन सबके लिए ज़बरदस्त उदाहरण है.

परमात्मा पूज्यश्री की आत्मा को जल्द से जल्द मोक्ष सुख प्रदान करें यही प्रार्थना. 

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