कैसे होता है अरिहंत का जन्म? और अरिहंत को जन्म से कौनसे 4 अतिशय होते हैं?
प्रभु का जन्म.. जन्म नहीं बल्कि जन्म कल्याणक होता है.. और इसलिए बहुत ही अद्भुत रूप से Celebrate किया जाता है।
यह जन्म, अजन्मा बनने के लिए होता है। यह उनका अंतिम जन्म होता है।
प्रस्तुत है Basics of Jainism का Episode 03
इस Episode में हम प्रभु के जन्म के बारे में एवं जन्म से ही जो चार अतिशय होते हैं उसकी जानकारी देखेंगे।
जैसा कि हमने Episode 02 में देखा था कि अरिहंत प्रभु अरिहंत वाले जन्म से पिछले के पिछले जन्म में यानी कि पूर्व के तीसरे भव में सवि जीव करूँ शासनरसी की तीव्र शुभ भावना के कारण तीर्थंकर नाम कर्म का बंध करते हैं।
च्यवन कल्याणक
उस जन्म में समाधिपूर्वक अपने देह का त्याग करके वे आत्माएं लगभग देवलोक में जाती है और देव बनती है। देवलोक में इतने सारे सुख होते हैं, फिर भी वे उन सुखों में थोड़े से भी आसक्त नहीं बनते हैं।
देव वाले भव में अपना आयुष्य यानी कि उम्र पूर्ण करके वे मनुष्य लोक में अपनी माता की कुक्षी में अवतरित होते हैं। इस Incident को च्यवन कल्याणक कहते हैं।
इस समय 14 राजलोक यानी पूरी सृष्टि के सभी जीवों को शाता मिलती है, शांति मिलती है।
गर्भ में ही तीर्थंकर की आत्मा को निर्मल अवधिज्ञान होता है।
अवधिज्ञान यानी कि क्या?
ऐसे तो हम Detail में भविष्य में कोई Episode में देखेंगे लेकिन अभी के लिए इतना समझ लीजिए एक Distance तक, एक Time तक के Past, Present, Future का रुपी पदार्थों का ज्ञान होना।
यानी कि सरल भाषा में कहे तो Top Technology के Power से जो दिख पाए ऐसी चीज़ों का ज्ञान होना।
For Example
हम अगर हमारे घर के Hall में बैठे हैं और अगर हमारे पास अवधिज्ञान हो तो हम Hall में बैठे बैठे ही आत्मा की शक्ति से चेन्नई या फिर मुंबई या फिर बैंगलोर के Stadium में चल रहा IPL Match Live देख सकते हैं।
समझ लो कि Inbuilt Video Camera जैसा यह ज्ञान है, जो हम हमारे आत्मा के Remote से Operate कर सकते हैं। इसके लिए आँख या फिर इन्द्रियों या फिर मन की ज़रूरत नहीं पड़ती है। यह Direct आत्मा के ज्ञान से ही पता चल जाता है।
तो प्रभु को यह ज्ञान गर्भ से ही हो जाता है।
14 महास्वप्न
जब प्रभु अपनी माता के गर्भ में आते हैं तो माता को 14 स्वप्न आते हैं।
- हाथी (गजराज)
- बैल (वृषभ)
- सिंह
- लक्ष्मी
- पुष्पमाला
- चन्द्र
- सूर्य
- ध्वजा
- कलश
- पद्मसरोवर (कमल सरोवर)
- क्षीरसागर (दूध का समुद्र)
- देवविमान (देवों का दिव्य भवन)
- रत्नराशि (रत्नों का ढेर)
- निर्धूम अग्नि (बिना धुएँ की अग्नि)
जब प्रभु अपनी माता के गर्भ में आते हैं, तब माता का पेट अन्य गर्भवती स्त्री की तरह ऊँचा या फिर मोटा नहीं होता है।
तीर्थंकर आत्मा का जब जन्म होता है तब माता को ज़रा सी भी पीड़ा नहीं होती और जन्म हमेशा अच्छे समय पर ही होता है।
जब सभी शुभ गृह, राशि आदि अपने उच्च स्थानों पर आते हैं, तब प्रभु का जन्म होता है। प्रभु के जन्म के प्रभाव से सोना, चांदी, रत्न, धन, धान्य, दूध, घी आदि में वृद्धि होती है। आपस में प्रेम, स्नेह बढ़ता है।
सबसे कम गर्भकाल श्री वासुपूज्य स्वामी भगवान का रहा 8 महीने और 20 दिन का और सबसे अधिक श्री सुपार्श्वनाथ भगवान का रहा 9 महीने और 19 दिन का।
56 दिक्कुमारिका
सबसे पहले तो अलग-अलग दिशाओं में रही हुई 56 दिक्कुमारिकाएं का आसन यानी यह देवियों का आसन कांपने लगता है। यह देवियाँ अवधिज्ञान के उपयोग से जानती है कि अरिहंत प्रभु का जन्म हुआ है।
जैसे आज से कुछ समय पहले, जन्म के समय में दाई माँ आया करती थी और सुरक्षित रूप से प्रसव यानी Delivery करवाती थीं और जैसे आज के समय में Hospitals में Nurses यह काम करती है, ठीक वैसे ही यह देवियाँ आकर सूति कर्म यानी Delivery करती है।
यह 56 दिक्कुमारिकाएं भूमि शुद्ध करती है, प्रभु का नाल काटती है, प्रभु और माता को शुद्ध कर रक्षा पोटली बांधती है और प्रभु एवं माता की भक्ति करती है। इस घटना को जन्म कल्याणक कहा जाता है।
जीवों के लिए कल्याणकारी होने से प्रभु के जन्म को कल्याणक कहते हैं।
इंद्र का सिंहासन कांपना
उस वक्त नरक के जीवों को भी कल्याण की यानी सुख की अनुभूति होती है। जब प्रभु का जन्म होता है, तब सौधर्म इंद्र का आसन कांपने लगता है। इंद्र फिर अवधिज्ञान से देखते हैं कि मेरा आसन क्यों कांप रहा है?
और जब उन्हें पता चलता है कि तीन लोक के नाथ, अनेक जीवों को तारनेवाले, मोक्ष मार्ग बताने वाले ऐसे तारक परमात्मा का जन्म हुआ है, तो उन्हें अत्यंत हर्ष महसूस होता है।
उसी समय वे अपने सिंहासन से नीचे उतरकर 7-8 कदम आगे बढ़कर शक्रस्तव के द्वारा यानी नमुत्थुणं सूत्र के द्वारा प्रभु की स्तवना करते हैं यानी कि भक्ति करते हैं।
इंद्र महाराजा की आज्ञा से हरिणगमैषी देव सुघोषा घंट बजाते हैं, उस घंट के बजने के साथ 32 लाख विमानों में रहे हुए घंट भी अपने आप बजने लगते हैं। जिससे पहले देवलोक में प्रभु के जन्म की खुशखबरी मिलती है।
जन्म महोत्सव
इंद्र.. प्रभु और प्रभु की माता को तीन प्रदक्षिणा देकर नमस्कार करके, वंदन करके कहते हैं कि ‘हे रत्नकुक्षी धारिणी! मैं शक्र नाम का देवेन्द्र प्रथम देवलोक से आया हूँ और प्रभु का मैं जन्म महोत्सव करूँगा, इसलिए आप डरे नहीं।’
सैंकड़ों देव देवियाँ इकट्ठे हो जाते हैं।
इंद्र फिर प्रभु की माता को अवस्वापिनी निद्रा यानी Induced Sleep यानी कि एक तरह की गहरी नींद में सुला देते हैं और शिशु का प्रतिबिंब यानी कि एक प्रकार का Duplicate, माता के पास रखकर प्रभु का जन्म महोत्सव मानाने के लिए इंद्र अपने 5 रूप करते हैं।
उसके बाद प्रभु को गोद में उठाकर मेरु पर्वत के शिखर पर पाण्डुकवन में ले जाते हैं। वहाँ एक दिव्य सिंहासन पर प्रभु को विराजमान किया जाता है।
इंद्र महाराजा मेरु पर्वत के ऊपर जो कलश बनाते हैं, वह 8 प्रकार के कलश होते हैं। उसमें
सोना, चांदी, रत्न, सोना-चांदी, चांदी-रत्न, सोना-चांदी-रत्न, सोना-रत्न और मिट्टी इस प्रकार 8 जातिवाले कुल 8000 कलश बनाते हैं।
8 जाति के कुल 8000 कलशों से 8-8 बार अभिषेक होने पर 64,000 कलश हुए।
ऐसे 64 इंद्र, इंद्राणी एवं अन्य कई देव देवियाँ मिलकर 250 बार अभिषेक करते हैं यानी 250 X 64000 अर्थात् कुल 1 करोड़ 60 लाख कलशों से प्रभु का अभिषेक होता है। अभिषेक के लिए भिन्न भिन्न पवित्र नदियों का जल देवों द्वारा लाया जाता है।
मेरु पर्वत पर प्रभु का भव्य जन्म महोत्सव मनाया जाता है।
कुछ इस तरह से मेरुपर्वत पर 64 इंद्र एवं असंख्य देवी- देवताओं द्वारा जन्म कल्याणक का महोत्सव मनाया जाता है। अंत में इन्द्र प्रभु को पुनः माता के पास सुरक्षित पहुँचा देते हैं।
4 अतिशय
अरिहंत परमात्मा के ऐसे कुल 34 अतिशय होते हैं।
अतिशय यानी कि विशेषताएं, Extraordinary Qualities या फिर Extraordinary Attributes कह सकते हैं..
अरिहंत परमात्मा के देह की यानी कि शरीर की कुछ रोचक बातें होती है जो आज हम जानेंगे।
पहला अतिशय
अद्भुत रूप
अरिहंत परमात्मा का रूप लोक में सबसे Best, सर्वश्रेष्ठ होता है। उनके जैसा रूप दूसरे किसी का भी नहीं होता है।
करोड़ों देवता मिलकर भी अपने Divine Powers से एक रूप बनाए और उसके सामने प्रभु के पैर के अंगूठे के रूप की तुलना करें तो ऐसा लगेगा कहाँ हाथी और कहाँ चींटी।
ऐसा अद्भुत रूप अरिहंत परमात्मा का होता है।
हमें तो हमारे शरीर को पानी आदि से बार-बार साफ़ करना पड़ता है, जबकि अरिहंत परमात्मा का शरीर तो किसी भी प्रकार के स्नान के बिना ही अत्यंत निर्मल ही होता है।
इस दुनिया में जितनी भी सुगंधित चीज़ें हैं, उससे भी अनंतगुना सुगंध अरिहंत परमात्मा के देह में होती है। पहले के समय में लोग अपने शरीर को सुगंधित बनाने के लिए केसर चंदन आदि उपयोग करते थे, आज भी कुछ लोग करते होंगे।
लेकिन आज कल तो ज़्यादातर लोग Artificial Perfumes वगैरह Use करते हैं, जिससे शरीर से गंदी Smell आती है वह ना आए, वह ढक जाए।
जबकि अरिहंत परमात्मा का शरीर Anytime Naturally सुगंधित होता है।
अरिहंत परमात्मा का शरीर पूरी तरह से रोगमुक्त होता है। च्यवन से निर्वाण तक प्रभु के शरीर में किसी प्रकार का रोग पैदा नहीं होता है।
प्रभु महावीर के ऊपर गोशाला द्वारा तेजोलेश्या वाला जो उपसर्ग हुआ था वह एक Rarest of Rare Case था, वह इस काल के 10 आश्चर्य में से एक था, एक अच्छेरा था।
Normally तो मानव शरीर में सैंकड़ों रोग होते हैं लेकिन अरिहंत परमात्मा का जो मानव देह होता है उसमें कभी भी रोग पैदा नहीं होते हैं, उनका DNA ही अलग होता है।
प्रभु के शरीर में पसीना और मैल नहीं होता है। हमें तो गर्मी में या फिर थोड़ी देर कसरत वगैरह करने में आए तो पसीना निकलने लगता है और उस पसीने से बदबू भी आती है लेकिन प्रभु को भयानक से भयानक गर्मी में भी पसीना नहीं होता है।
साथ ही अगर हम कुछ दिनों तक स्नान ना करें तो Skin पर मैल जमने लगता है लेकिन प्रभु का शरीर एकदम Clean ही रहता है।
दूसरा अतिशय
सुगंधित श्वासोच्छ्वास
अरिहंत परमात्मा का श्वास और निःश्वास यानी Inhale Exhale कमल के समान सुगंधित होता है।
हमें तो Brush करना पड़ता है बाकी कोई हमारी Breathing सुंग ले तो बेहोश हो जाए और प्रभु के Case में Totally Opposite होता है।
प्रभु को ना Brush करने की ज़रूरत पड़ती है और ना ही Mouth Freshner की ज़रूरत पड़ती है।
तीसरा अतिशय
दूध के जैसे सफ़ेद और बिना Smell वाला मांस और रक्त।
हमें यह जानकर शायद आश्चर्य होगा लेकिन अरिहंत प्रभु के शरीर में रहा हुआ मांस और खून, गाय के दूध की धारा के समान एक दम White सफ़ेद और बिना दुर्गंध वाला होता है।
हमारे शरीर में जो खून होता है, वह लाल रंग का होता है और हमारा मांस भी कोई देख ले तो उसे उलटी करने जैसा हो जाता है, हमारे मांस में दुर्गंध भी होती है लेकिन प्रभु के मांस में किसी भी प्रकार की गंदी Smell नहीं होती है।
चौथा अतिशय
अदृश्य आहार-निहार
तीर्थंकर परमात्मा की आहार-निहार की क्रिया यानी Food Intake और Bathroom Toilet की क्रिया होती है वह आँखों से नहीं देखी जा सकती।
हाँ अवधिज्ञानी मनुष्य एवं देव उसे देख सकते हैं। अवधिज्ञान क्या होता है वह हमने सरल भाषा में देख लिया है Detail में भविष्य के Episode में देख लेंगे।
तो यह थे प्रभु के जन्म से 4 अतिशय।
हमें जानकर शायद आश्चर्य होगा लेकिन प्रभु जन्म के बाद स्तनपान नहीं करते हैं। इंद्र प्रभु के अंगूठे में अमृत का संचार करते हैं।
ज्ञानावरणीय, दर्शानावरणीय, मोहनीय और अंतराय यह 4 घातिकर्मों के क्षय से यानी Nil होने से तीर्थंकर परमात्मा के अलग 11 अतिशय पैदा होते हैं।
यह जो हमने 4 अतिशय देखे यह तो जन्म से, 11 अतिशय इस Time में पैदा होते हैं।
यह 11 अतिशय जानने से पहले हम कर्म के बारे में थोडा संक्षेप में जानने का प्रयास करेंगे, जिससे आगे की बातें Easily समझ में आएगी तो अगले Episode का इंतज़ार कीजिएगा।


